मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 ब्रेकिंग
DA Hike 2026: सरकारी कर्मचारियों को बड़ी खुशखबरी, महंगाई भत्ता 35% से बढ़कर हुआ 37%, जानें कब से मिलेगा लाभ​ | रणजी ट्रॉफी में ऋतुराज गायकवाड़ ने मचाया तहलका, बल्ले से फिर निकला शतक; घरेलू क्रिकेट में दिखाया दम​ | मुजफ्फरनगर में MBBS की छात्रा ने किया सुसाइड, कमरे में फंदे से लटका मिला शव, फाइनल ईयर की स्टूडेंट थी​
दिल्ली 32°C ☀️ |
728 x 90 Advertisement
विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
Viral

रावण को ब्रह्मराक्षस क्यों कहा गया, दशानन के लिए कहां मनाते हैं शोक?​

विजयादशमी का नाम आते ही रावण का पुतला और उसका दहन याद आता है. देश के अनेक हिस्सों में लोग इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाते हैं. यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. लेकिन भारत में रावण को लेकर केवल एक ही तरह की मान्यता नहीं है. […]

विजयादशमी का नाम आते ही रावण का पुतला और उसका दहन याद आता है. देश के अनेक हिस्सों में लोग इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाते हैं. यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. लेकिन भारत में रावण को लेकर केवल एक ही तरह की मान्यता नहीं है.

कुछ जगहों पर लोग उसकी पूजा करते हैं. कहीं उसे विद्वान और परम शिवभक्त माना जाता है. कहीं उसकी मृत्यु पर शोक मनाने की परंपरा भी है. रावण से जुड़ी ये परंपराएं और मान्यताएं भारत की विविध संस्कृति को दिखाती हैं. आइए, इस विजयादशमी रावण से जुड़ी कुछ रोचक कहानियाँ जानते हैं.

रावण को ब्रह्मराक्षस क्यों कहा जाता है?

रावण को कई लोककथाओं और धार्मिक परंपराओं में ब्रह्मराक्षस कहा गया है. इस शब्द में ब्रह्म का संबंध ब्राह्मण या विद्वान से और राक्षस का संबंध राक्षस कुल से जोड़ा जाता है. रावण के पिता ऋषि विश्रवा थे. उनकी माता कैकसी राक्षस कुल से थीं. इस तरह रावण को ब्राह्मण पिता और राक्षसी माता का पुत्र बताया गया है. रावण वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता था. उसे संगीत, ज्योतिष और आयुर्वेद का भी जानकार माना जाता है. वह शिव का बड़ा भक्त था.

रावण को कई लोककथाओं और धार्मिक परंपराओं में ब्रह्मराक्षस कहा गया है. फोटो: PTI

धार्मिक कथाओं में उसे शक्तिशाली और विद्वान राजा के रूप में भी दिखाया गया है. लेकिन उसके ज्ञान और शक्ति के साथ उसका अहंकार भी जुड़ा था. इसी कारण ब्रह्मराक्षस शब्द को कुछ परंपराएं उसके विद्वान होने और राक्षस कुल से संबंध, दोनों के मेल के रूप में देखती हैं.

रावण का मंदिर और कानपुर की परंपरा

उत्तर प्रदेश के कानपुर में रावण का एक प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे लेकर यह मान्यता लोकप्रिय है कि वह साल में केवल एक दिन खुलता है. यह दिन विजयादशमी का होता है. इस अवसर पर मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और श्रद्धालु रावण की पूजा करते हैं. यहां रावण को केवल राम का शत्रु नहीं, बल्कि विद्वान और शिव भक्त के रूप में भी याद किया जाता है.

विजयादशमी के दिन मंदिर खुलने की परंपरा को लेकर स्थानीय लोगों में अलगअलग मान्यताएं हैं. कुछ लोग इसे रावण के ज्ञान और भक्ति को सम्मान देने का अवसर मानते हैं. मंदिर की परंपरा और पूजा का तरीका समय और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकता है. कानपुर का यह मंदिर इस बात की याद दिलाता है कि रावण को लेकर भारत में कई दृष्टिकोण मौजूद हैं. एक ओर पुतला दहन की परंपरा है, तो दूसरी ओर उसकी विद्वता को याद करने की परंपरा भी है.

कानपुर के शिवाला में स्थित दशानन का मंदिर.

रावण के लिए भारत में भी मनाया जाता है शोक

भारत के कुछ समुदायों और क्षेत्रों में रावण की मृत्यु को शोक के रूप में याद करने की परंपरा है. इन मान्यताओं में रावण को अपने पूर्वज, राजा या समुदाय से जुड़े सम्मानित पात्र के रूप में देखा जा सकता है. कुछ जगहों पर लोग विजयादशमी पर उत्सव के बजाय शांतिपूर्वक दिन बिताते हैं. ऐसी परंपराओं को पूरे क्षेत्र या समुदाय पर लागू नहीं किया जा सकता. एक ही जगह के अलगअलग परिवारों और समूहों में रावण को लेकर सोच अलग हो सकती है. इसलिए किसी परंपरा का उल्लेख करते समय स्थानीय लोगों की मान्यता और उसके संदर्भ को समझना जरूरी है.

रावण के लिए शोक मनाने की बात यह दिखाती है कि रामायण की कथाओं को अलगअलग समाजों ने अपने अनुभवों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अपनाया है. एक कथा के पात्र को कहीं खलनायक माना जाता है, तो कहीं उसे वीर, विद्वान या स्थानीय नायक के रूप में याद किया जाता है. रावण की मृत्यु पर शोक मनाने की परंपरा की चर्चा मुख्य रूप से निम्न जगहों के संदर्भ में होती है. पर, परंपराओं का पालन सभी निवासी नहीं करते. यह व्यक्तिगत मामला है.

पश्चिमी ग्रेटर नोएडा का बिसरख गांव का मंदिर जिसे बिसरख धाम कहा जाता है.

  • बिसरख, उत्तर प्रदेश: आज के ग्रेटर नोएडा स्थित इस गांव में अभी भी कुछ लोग रावण को अपना पूर्वज मानते हैं. इसी वजह से कुछ ग्रामीण दशहरे पर शोक और प्रार्थना करते हैं.
  • जोधपुर, राजस्थान: रावण से वंश जोड़ने वाले कुछ ब्राह्मण परिवारों के बारे में दशहरे पर शोक मनाने और श्राद्ध करने की खबरें आती रहती हैं.
  • मंदसौर, मध्य प्रदेश: कुछ स्थानीय समुदाय रावण को मंदोदरी का पति और अपना दामाद मानकर सम्मान देते हैं. यहां पूजा की परंपरा का उल्लेख मिलता है.

रावण के दस सिर के क्या हैं मायने?

रावण को दस सिर वाला कहा जाता है. यह चित्रण रामायण की सबसे पहचानी जाने वाली छवियों में से एक है. दस सिरों को लेकर अलगअलग व्याख्याएं मिलती हैं. कुछ लोग इन्हें उसकी असाधारण शक्ति का प्रतीक मानते हैं. कुछ व्याख्याओं में दस सिर उसके ज्ञान और अनेक विषयों पर पकड़ को दर्शाते हैं. एक दूसरी लोकप्रिय व्याख्या यह भी कहती है कि दस सिर मनुष्य के अलगअलग गुणों और कमजोरियों की ओर संकेत करते हैं. इनमें काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे भावों का उल्लेख किया जाता है. यह व्याख्या प्रतीकात्मक है. रावण का दस सिर वाला रूप विजयादशमी के पुतलों और रामलीला में खास जगह रखता है.

रावण के दस सिरों को लेकर अलगअलग व्याख्याएं मिलती हैं. फोटो: PTI

परम शिवभक्ति और विद्वता रावण की पूंजी

रावण को शिव का परम भक्त माना जाता है. धार्मिक कथाओं में उसके शिव के प्रति समर्पण का वर्णन मिलता है. उससे जुड़े कई भजन और स्तोत्र लोकपरंपरा में लोकप्रिय हैं. रावण को संगीत का ज्ञाता भी बताया जाता है. कुछ कथाओं में उसे वीणा बजाने वाला कलाकार दिखाया गया है. उसकी विद्वता का उल्लेख भी अनेक कथाओं में मिलता है. वह वेदों और शास्त्रों का जानकार था. लेकिन कथा में केवल उसका ज्ञान नहीं, उसके आचरण और फैसलों का भी महत्व है. रावण का अहंकार और सीता का हरण उसके चरित्र के निर्णायक पक्ष माने जाते हैं. यही कारण है कि उसे कई परंपराओं में शक्तिशाली होने के बावजूद अधर्म के मार्ग पर चलने वाला राजा बताया गया है.

रावण दहन लोगों को यह संदेश देता है कि अहंकार, क्रोध और अन्याय का अंत हो सकता है. फोटो: PTI

विजयादशमी पर ही रावण दहन की परंपरा क्यों?

विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा रामायण की उस कथा से जुड़ी है, जिसमें राम रावण पर विजय प्राप्त करते हैं. यह दिन बुराई पर अच्छाई और अन्याय पर न्याय की जीत का प्रतीक माना जाता है. पुतला दहन लोगों को यह संदेश देता है कि अहंकार, क्रोध और अन्याय का अंत हो सकता है. रावण से जुड़ी विविध परंपराएं हमें एक और बात समझाती हैं. किसी व्यक्ति या पात्र को केवल एक गुण या एक घटना से नहीं समझा जा सकता. रावण विद्वान और शिवभक्त था, लेकिन उसकी गलतियों और अहंकार को भी कथाएं महत्व देती हैं.

इस विजयादशमी पर रावण से जुड़ी परंपराओं को जानना भारतीय संस्कृति की विविधता को समझने का एक तरीका है. किसी जगह उसे जलाया जाता है, कहीं उसकी पूजा होती है और कहीं उसकी मृत्यु को शोक के साथ याद किया जाता है. इन सभी परंपराओं के पीछे स्थानीय इतिहास, आस्था और लोककथाओं की अपनी भूमिका है. यही विविधता रामायण और उससे जुड़ी कथाओं को पीढ़ियों तक जीवित रखे हुए है.

विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
शेयर करें:
Author Bio Pic

संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

🐒 KHABAR MONKEY