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रंगभेद के खिलाफ लड़ी जंग… कौन हैं शांति का नोबेल पुरस्कार पाने वाली नावनेथम नावी पिल्लई?​

शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता का ऐलान कर दिया गया है. नॉर्वे की नोबेल समिति ने 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार भारतवंशी नावनेथम नावी पिल्लई को देने का ऐलान किया है. इसकी घोषणा नॉर्वे राजधानी ओस्लो में की गई. 287 उम्मीदवार और संगठनों की रेस के बीच नावनेथम को नोबेल पुरस्कार यूं ही नहीं मिला […]

शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता का ऐलान कर दिया गया है. नॉर्वे की नोबेल समिति ने 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार भारतवंशी नावनेथम नावी पिल्लई को देने का ऐलान किया है. इसकी घोषणा नॉर्वे राजधानी ओस्लो में की गई. 287 उम्मीदवार और संगठनों की रेस के बीच नावनेथम को नोबेल पुरस्कार यूं ही नहीं मिला है. इसके पीछे कई वजह रही हैं. नावनेथम दक्षिण अफ्रीका की जानीमानी न्यायविद हैं. उन्होंने रंगभेद के दौर में आंदोलनकारियों के मुकदमे लड़ने से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालतों में जज बनने और संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख बनने तक न्याय और अधिकारों की लम्बी लड़ाई लड़ी.

23 सितंबर 1941 को डरबन के क्लेयरवुड में जन्मीं नावी पिल्लई ने नेटाल यूनिवर्सिटी से 1963 में बीए किया. 1965 में कानून की डिग्री हासिल की. पढ़ाई के दौरान ही वे नॉनयूरोपियन यूनिटी मूवमेंट से जुड़ गईं, जो रंगभेद के खिलाफ मुहिम चलाने वाला सक्रिय संगठन था.नावी पिल्लई का कनेक्शन तमिल मूल के भारतीय परिवार से रहा है. उनके दादादादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे. वहां वे गन्ने के खेतों में काम करने वाले अनुबंधित मजदूरों के रूप में पहुंचे थे.

रंगभेद के खिलाफ बुलंद आवाज

1967 में पिल्लई नेटाल में अपना लॉ प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं. यह उस दौर की बात है जब रंगभेदी सरकार विरोधियों को जेल में डाल रही थी. उन्होंने अलगअलग राजनीतिक संगठनों के हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं को कानूनी मदद दी. उनके लिए कानूनी लड़ाई लड़ी.

भारतवंशी नावी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को डरबन के क्लेयरवुड में हुआ.

उनका पहला मुकदमा फिलिस पाइडू का था, जिन पर प्रतिबंधित व्यक्ति होने के बावजूद पुलिस थाने में हाजिरी न देने का आरोप था. 1971 में उन्होंने टेररिज्म एक्ट के तहत आरोपित NEUM के 10 सदस्यों का केस लड़ा. अपने पति गैबी पिल्लई के लिए अदालत में पैरवी की, जिन्हें सिक्योरिटी पुलिस ने टेररिज्म एक्ट के तहत हिरासत में लिया था. इन मामलों की पैरवी करते नावनेथम ने पुलिस हिरासत में यातना और एकांत कारावास के सच को करीब से देखा.

1973 में उन्होंने राजनीतिक कैदियों को वकील से मिलने का अधिकार दिलाने की लड़ाई जीती. 1970 के दशक के मध्य में उन्होंने ब्लैक कॉन्शियसनेस मूवमेंट के सदस्यों, जैसे सैथ्स कूपर और स्ट्रिनी मूडली का बचाव किया.

हार्वर्ड से पढ़ाई, फिर टीचिंग

पिल्लई ने 1982 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ लॉ और 1988 में डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की डिग्री ली. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ नेटाल में पढ़ाया और डरबनवेस्टविल यूनिवर्सिटी की काउंसिल की उपाध्यक्ष भी रहीं.

नावी पिल्लई यूएन की मानवाधिकार उच्चायुक्त रह चुकी हैं.

रवांडा ट्रिब्यूनल और वो ऐतिहासिक फैसला

रंगभेद खत्म होने के बाद 1995 में वे दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में कार्यवाहक जज बनीं. उसी साल संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उन्हें रवांडा के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल का जज चुना. वहां उन्होंने कुल आठ साल सेवा दी और 1999 से 2003 तक अध्यक्ष रहीं. शुरुआती चार साल वे ट्रिब्यूनल की अकेली महिला जज थीं.

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल में उनका सबसे चर्चित काम जांपॉल अकायेसु का मुकदमा रहा. इस फैसले में माना गया कि बलात्कार और यौन हिंसा नरसंहार के कृत्य हो सकते हैं. उन्होंने कहा था कि बलात्कार को सदियों से युद्ध की लूट माना जाता रहा, अब इसे युद्ध अपराध माना जाएगा.

नोबेल प्राइज.

ICC से UN तक सफर

फरवरी 2003 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के पहले जजों के पैनल में चुना गया. उन्हें अपील डिवीजन में तैनाती मिली. छह साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्होंने अगस्त 2008 में इस्तीफा दे दिया ताकि संयुक्त राष्ट्र में नई जिम्मेदारी संभाल सकें.

24 जुलाई 2008 को तत्कालीन UN महासचिव बान कीमून ने उन्हें लुई आर्बर की जगह मानवाधिकार उच्चायुक्त के लिए नामित किया. 28 जुलाई 2008 को महासभा ने मंजूरी दी और उन्होंने 1 सितंबर 2008 को पदभार संभाला. वे इस पद पर नियुक्त होने वाली पांचवीं शख्सियत थीं. बताया जाता है कि अमेरिका ने शुरुआत में गर्भपात जैसे मुद्दों पर उनके विचारों के कारण विरोध किया था, पर बाद में वह पीछे हट गया. 2012 में उनका कार्यकाल दो साल के लिए बढ़ाया गया.

मई 2009 में श्रीलंका के गृहयुद्ध के खात्मे के बाद उन्होंने दोनों पक्षों द्वारा कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच की मांग की. श्रीलंका सरकार ने इसे बातचीत में बाधा बताया था.

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— The Nobel Prize October 9, 2026

महिला अधिकारों की पैरोकार

दक्षिण अफ्रीका में वीमेंस नेशनल कोएलिशन की सदस्य के रूप में उन्होंने संविधान में समानता की धारा शामिल कराने में योगदान दिया. यह धारा नस्ल, लिंग, धर्म और यौन रुझान के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाती है. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला अधिकार संगठन इक्वालिटी नाउ की सहस्थापना भी की. बच्चों, कैदियों, यातना और घरेलू हिंसा के पीड़ितों से जुड़े मुद्दों पर भी वे सक्रिय रही हैं.

कौनकौन से सम्मान मिले?

2003 में उन्हें पहला ग्रुबर महिला अधिकार पुरस्कार मिला. डरहम यूनिवर्सिटी, सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क स्कूल ऑफ लॉ, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और रोड्स यूनिवर्सिटी से उन्हें मानद उपाधियां मिलीं. 2009 में फोर्ब्स ने उन्हें दुनिया की 64वीं सबसे शक्तिशाली महिला बताया. 2017 में डरबन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने भी मानद डॉक्टरेट दी.

रंगभेद के खिलाफ अदालतों में लड़ाई से लेकर यौन हिंसा को नरसंहार का हिस्सा मानने वाले फैसले और वैश्विक मंच पर मानवाधिकारों की पैरवी तक, नवी पिल्लई का करियर पांच दशकों से ज्यादा का है. यही वजह है कि वे दुनियाभर में न्याय और मानवाधिकार की मजबूत आवाज मानी जाती हैं.

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संपादकीय टीम

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