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भगवान की, इंसान की या शैतान की रसोई! आपकी थाली में क्या परोसा जा रहा?​

रात के दो बजे भूख लगे तो फोन उठाकर चिप्स, बर्गर या इंस्टेंट नूडल्स मंगाना आज आसान है. लेकिन स्वाद और सुविधा के नाम पर खाया जा रहा यही पैकेज्ड फूड धीरेधीरे सेहत के लिए खतरा बन सकता है. कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अंशुमान कुमार इसे तीन रसोई के जरिए समझाते हैं—भगवान की रसोई, इंसान की […]

रात के दो बजे भूख लगे तो फोन उठाकर चिप्स, बर्गर या इंस्टेंट नूडल्स मंगाना आज आसान है. लेकिन स्वाद और सुविधा के नाम पर खाया जा रहा यही पैकेज्ड फूड धीरेधीरे सेहत के लिए खतरा बन सकता है. कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अंशुमान कुमार इसे तीन रसोई के जरिए समझाते हैं—भगवान की रसोई, इंसान की रसोई और शैतान की रसोई. वो कहते हैं हम तेजी से तीसरी रसोई के जाल में फंसते जा रहे हैं.

सुपरमार्केट की शेल्फ हो या इंस्टेंट डिलीवरी ऐप, पैकेज्ड फूड हर जगह मौजूद है. चिप्स, बिस्किट, इंस्टेंट नूडल्स, पैकेट वाले स्नैक्स, एनर्जी ड्रिंक्स और मीठे पेय हमारी रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बनते जा रहे हैं. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि हम क्या खा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि इस खाने को तैयार करने में क्याक्या मिलाया और हटाया जा रहा है.

NOVA क्लासिफिकेशन से समझें खाने का गणित

खाद्य पदार्थों की प्रोसेसिंग को समझने के लिए ब्राजील में विकसित NOVA क्लासिफिकेशन का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें खाने को चार श्रेणियों में बांटा गया है. पहली श्रेणी में फल, सब्जियां, अनाज और दूध जैसे प्राकृतिक या कम प्रोसेस किए गए खाद्य पदार्थ हैं. दूसरी में तेल, नमक और चीनी जैसे खाना बनाने वाले तत्व. तीसरी श्रेणी में प्रोसेस्ड फूड आते हैं, जैसे नमक डालकर सुरक्षित रखी गई सब्जियां या पारंपरिक तरीके से बनाया गया पनीर. चौथी श्रेणी अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड की है, जिसमें कई तरह के औद्योगिक तत्व, फ्लेवर, रंग, स्वीटनर और एडिटिव मिलाए जाते हैं.

डॉ. अंशुमान कुमार कहते हैं फूड इंडस्ट्री का मकसद ऐसे उत्पाद तैयार करना है जो लंबे समय तक खराब न हों, स्वादिष्ट लगे और ग्राहक उन्हें बारबार खरीदें. इसलिए खाने के नेचुरल स्ट्रक्चर में बदलाव किया जाता है.

प्रोडक्ट की शेल्फ लाइफ बढ़ी, खाने वाले की सेल्फ लाइफ घटी

डॉ. अंशुमान कुमार बताते हैं कि खाने को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए कई उत्पादों में फाइबर कम कर दिया जाता है. फाइबर आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया यानी गट माइक्रोबायोम के लिए जरूरी होता है. ये बैक्टीरिया पाचन और शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में मदद करते हैं.

‘फूड इंडस्ट्री खाने की शेल्फ लाइफ बढ़ा रही है, लेकिन मजाक में कहूं तो जो इसे खा रहा है, उसकी लाइफ कम हो सकती है.” फाइबर कम हुआ तो आंतों के अच्छे बैक्टीरिया के पोषण पर असर पड़ेगा.

खाने को ज्यादा स्वादिष्ट बनाने के लिए उसमें फ्रक्टोज जैसी शुगर भी मिलाई जाती है. फ्रक्टोज दिमाग के रिवॉर्ड सेंटर को एक्टिव करता है और डोपामाइन रिलीज करता है. जिससे इंसान को उसी तरह का खाना बारबार खाने की इच्छा हो सकती है.भूख से ज्यादा क्रेविंग ईटिंग हैबिट कंट्रोल करने लगती है.

फैट, शुगर और नमक का ट्रैप

डॉ. अंशुमान कुमार अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड पहचानने के लिए एक आसान फॉर्मूला बताते हैं—HSS यानी हाई फैट, शुगर और सॉल्ट. इन खाद्य पदार्थों में ओमेगा6 फैटी एसिड वाले फैट, ज्यादा नमक और अतिरिक्त चीनी का इस्तेमाल किया जाता है.

ज्यादा नमक हाइपरटेंशन का खतरा बढ़ाता है, एक्स्ट्रा चीनी और फैट मोटापे और फैटी लिवर जैसी परेशानियां बढ़ाती है.ओमेगा6 फैटी एसिड ज्यादा हुआ तो शरीर में सूजन और दूसरे हेल्थ रिस्क बढ़ाता है.स्वाद बढ़ाने के लिए तैयार किया गया खाना धीरेधीरे शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर डाल सकता है.

तीन रसोई, तीन तरह का खाना

डॉ. अंशुमान कुमार भारतीय खानपान को तीन रसोई के उदाहरण से समझाते हैं.

भगवान की रसोई यानी प्रकृति से मिलने वाला भोजन. फल, हरी सब्जियां, दालें, अनाज और दूसरे प्राकृतिक खाद्य पदार्थ. इनमें फाइबर, विटामिन और मिनरल जैसे जरूरी पोषक तत्व होते हैं.

इंसान की रसोई यानी घर में बना ताजा भारतीय खाना. दाल, रोटी, सब्जी, चावल और घर में तैयार दूसरे व्यंजन. बैलेंस पोर्शन में खाया गया ऐसा भोजन हेल्थ के लिए अच्छा है. .

शैतान की रसोई यानी अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड. डॉ. कुमार कहते हैं कि इसमें टेस्ट कलर और लंबे समय तक सुरक्षित रखने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है. ज्यादा फैट, शुगर और नमक के कारण यह खाने की आदत को प्रभावित करता है और सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

बच्चों के लिए क्यों बढ़ रही चिंता?

डॉ. अंशुमान कुमार कहते हैं अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड में ज्यादा कैलोरी, फैट और शुगर होने के कारण बच्चे जरूरत से ज्यादा खाने लगते हैं. जिससे मोटापा बढ़ता है.आगे चलकर इंसुलिन रेजिस्टेंस, टाइप2 डायबिटीज और फैटी लिवर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.

बच्चों में ऐसी फूड हैबिट्स केवल वेट गेन तक सीमित नहीं है. फोकस और कॉन्संट्रेशन के साथ साथ हाइपरएक्टिविटी की चिंता भी पैदा करते हैं. लंबे समय तक ज्यादा फैट और शुगर वाला खानपान शरीर में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकता है, जिससे सेल्स के डीएनए को नुकसान पहुंचाने और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है.

थाली पर कंट्रोल वापस लीजिए

डॉ. अंशुमान कुमार सलाह देते हैं फूड सिलेक्शन अट्रैक्टिव एड पर नहीं उसके इनग्रेडिएंट्स देखकर कीजिए. पैकेट पर दिए गए न्यूट्रिशन लेबल में शुगर, नमक और फैट की मात्रा जरूर देखें. रोज के खाने में फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज शामिल करें. पैकेज्ड स्नैक्स, शुगरी ड्रिंक और इंस्टेंट फूड को नियमित आदत न बनाएं.

रात दो बजे भूख लगे तो एप से खाना मंगवाना आसान तो है लेकिन घर में फल, भुना चना या दूसरे हेल्दी ऑप्शन रखना भी एक रास्ता हो सकता है. क्योंकि सवाल गंभीर है आपकी थाली में प्रकृति का खाना है, घर की रसोई का भोजन या फिर शैतान की रसोई का पैकेट?

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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