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UP: 2024 की हार से सबक, 2027 के लिए BJP का नया दांव; पासी समाज को साधने की तैयारी​

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीजेपी ने अपने सामाजिक और जातीय समीकरणों को दुरुस्त करने की कवायद तेज कर दी है. खास तौर पर पासी समाज को लेकर पार्टी की सक्रियता बढ़ी है. लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लगे झटके और कई आरक्षित सीटों पर समाजवादी […]

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीजेपी ने अपने सामाजिक और जातीय समीकरणों को दुरुस्त करने की कवायद तेज कर दी है. खास तौर पर पासी समाज को लेकर पार्टी की सक्रियता बढ़ी है. लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लगे झटके और कई आरक्षित सीटों पर समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की जीत ने पार्टी के सामने दलित वोट बैंक को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने की चुनौती खड़ी की है. ऐसे में बीजेपी की कोशिश है कि विधानसभा चुनाव से पहले पासी समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत की जाए, नेताओं की नाराजगी दूर हो और समाज के प्रभावशाली चेहरों को एक मंच पर लाया जाए.

इसी कड़ी में पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता कौशल किशोर की नाराजगी दूर करने के प्रयासों के बाद अब पासी समाज के जनप्रतिनिधियों और संगठन से जुड़े पदाधिकारियों की बड़ी बैठक बुलाने की तैयारी है. पार्टी के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने पहले 14 अक्टूबर को लखनऊ स्थित पार्टी मुख्यालय पर पासी समाज के प्रतिनिधियों की बैठक प्रस्तावित की थी, लेकिन इसे फिलहाल टाल दिया गया है. अब बैठक अगले सप्ताह आयोजित किए जाने की बात कही गई है. इस बैठक में कौशल किशोर को भी आमंत्रित किए जाने की जानकारी सामने आई है.

बैठक का मकसद

बैठक का मकसद केवल नेताओं को एक जगह जुटाना नहीं, बल्कि समाज के बीच पार्टी की स्थिति, स्थानीय स्तर पर मौजूद नाराजगी और संगठनात्मक कमजोरियों पर चर्चा करना भी माना जा रहा है. बीजेपी के सामने सवाल है कि लोकसभा चुनाव के दौरान दलित मतदाताओं के बीच बने नए राजनीतिक समीकरणों को कैसे समझा जाए और विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक संपर्क को किस तरह मजबूत किया जाए.

100 सीटों का समीकरण, बीजेपी की नजर पासी समाज पर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पासी समाज को अनुसूचित जाति के प्रमुख समुदायों में गिना जाता है. जाटव समाज के बाद पासी समाज को प्रदेश के बड़े दलित समुदायों में शामिल माना जाता है. अवध क्षेत्र में इसकी विशेष उपस्थिति है. इसके अलावा गोरखपुर, कानपुर और काशी क्षेत्र के कई इलाकों में भी पासी समाज की राजनीतिक और सामाजिक मौजूदगी महत्वपूर्ण मानी जाती है.

बीजेपी नेताओं और राजनीतिक हलकों में पासी समाज के प्रभाव को प्रदेश की करीब 100 विधानसभा सीटों से जोड़कर देखा जाता है. जबकि लगभग 150 सीटों पर भी इसके प्रभाव की बात कही जाती है.

फिर भी विधानसभा चुनाव के लिहाज से इस समुदाय की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. बीजेपी की रणनीति में पासी समाज के नेताओं को महत्व देना, संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर संवाद मजबूत करना प्रमुख मुद्दे हो सकते हैं. पार्टी की प्रस्तावित बैठक को इसी व्यापक राजनीतिक कवायद के तौर पर देखा जा रहा है.

कौशल किशोर की नाराजगी क्यों बनी चर्चा का विषय?

पासी समाज को साधने की बीजेपी की कोशिशों के बीच कौशल किशोर की नाराजगी का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है. पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर लंबे समय से पासी समाज के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में गिने जाते हैं. ऐसे में उनके साथ संवाद और उन्हें संगठनात्मक गतिविधियों में साथ रखने की कोशिश को समाज के दूसरे नेताओं तक पहुंच बनाने के प्रयास से भी जोड़कर देखा जा रहा है.

बीजेपी के सामने चुनौती यह है कि समाज के बड़े नेताओं के साथ संबंध बनाए रखने के साथसाथ स्थानीय कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों तक भी अपनी पहुंच बढ़ाई जाए. यदि नेताओं की शिकायतें संगठन के भीतर ही सुनी जाएं और उनका समाधान हो, तो पार्टी को सामाजिक संपर्क अभियान चलाने में मदद मिल सकती है. हालांकि, बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा होगी और कौशल किशोर की ओर से क्या मांगें रखी जाएंगी, यह आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा.

पासी समाज को प्रतिनिधित्व देने की बीजेपी की रणनीति

बीजेपी ने बीते वर्षों में गैरजाटव दलित समुदायों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए अलगअलग स्तरों पर प्रयास किए हैं. पार्टी ने पासी समाज से आने वाले नेताओं को संगठन और सरकार में जिम्मेदारियां देकर प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश भी की है. राज्यसभा में प्रियंका रावत को भेजने, कृष्णा पासवान को प्रदेश सरकार में मंत्री बनाने और संगठन में पासी समाज से जुड़े चेहरों को जगह देने जैसे कदम इसी राजनीतिक संदर्भ में देखे जा सकते हैं. इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने बीजेपी के सामने यह सवाल खड़ा किया कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक समर्थन के बीच तालमेल कैसे मजबूत किया जाए.

किसी समाज से नेता को मंत्री या संगठन में पद देना राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे उस समुदाय के सभी मतदाताओं का समर्थन सुनिश्चित नहीं हो जाता. इसी वजह से बीजेपी के लिए अब संगठनात्मक संपर्क, स्थानीय मुद्दों का समाधान और समाज के अलगअलग वर्गों के साथ संवाद भी अहम होंगे.

सांसदों की संख्या में सपा आगे, बीजेपी के सामने चुनौती

पासी समाज से जुड़े राजनीतिक चेहरों के मामले में समाजवादी पार्टी भी सक्रिय है। बीजेपी के पास जयप्रकाश रावत, अशोक रावत और कमलेश पासवान जैसे सांसद हैं, जबकि सपा के सांसदों में आरके चौधरी, प्रिया सरोज, दारोगा प्रसाद सरोज, पुष्पेंद्र सरोज और अवधेश प्रसाद जैसे नाम शामिल हैं. इन नेताओं की मौजूदगी से पता चलता है कि पासी समाज और उससे जुड़े सामाजिक समीकरणों को लेकर दोनों दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है.

फैजाबाद से सांसद अवधेश प्रसाद को सपा ने दलित प्रतिनिधित्व के प्रमुख चेहरों में शामिल किया है. पार्टी के अन्य दलित नेताओं की सक्रियता और पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति पर जोर देने की रणनीति भी बीजेपी के लिए राजनीतिक चुनौती बनी हुई है.

हालांकि, इन सांसदों की संख्या को पासी समाज के समर्थन का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता. सभी नेताओं की जातिगत पहचान, उनके निर्वाचन क्षेत्र की सामाजिक संरचना और उनके चुनावी प्रदर्शन का अलगअलग आकलन जरूरी है.

2014 और 2017 में बीजेपी की बड़ी जीत, फिर कैसे बदला समीकरण?

उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 80 में से 71 सीटें जीती थीं, जबकि उसकी सहयोगी अपना दल ने दो सीटें हासिल की थीं. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटों पर जीत दर्ज की. इन चुनावों में बीजेपी को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला और गैरजाटव दलित समुदायों के एक हिस्से का समर्थन भी उसकी राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा रहा.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 62 सीटें जीतीं. लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में उसकी सीटें घटकर 255 रह गईं. इसके बावजूद पार्टी राज्य में सत्ता बरकरार रखने में सफल रही.

2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर और बदली। बीजेपी उत्तर प्रदेश में 33 सीटों पर सिमट गई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 के साथ गठबंधन मिला 43 सीटें जीतीं जिसमे कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत दर्ज की. इंडिया गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक मतदाताओं के समीकरणों पर नए सिरे से चर्चा शुरू कर दी.

इन्हीं नतीजों के बाद बीजेपी के सामने चुनौती है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में अपने पुराने सामाजिक आधार को कैसे मजबूत रखा जाए और जिन समुदायों के बीच समर्थन में बदलाव की चर्चा है, उनसे संवाद कैसे बढ़ाया जाए.

आरक्षित सीटों के नतीजों ने भी बढ़ाई चिंता

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में 86 सीटें अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. वहीं लोकसभा की 80 सीटों में 17 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. इन सीटों पर चुनावी प्रदर्शन दलित राजनीति की व्यापक तस्वीर समझने का एक महत्वपूर्ण आधार है, हालांकि ये आंकड़े किसी एक जाति के मतदाताओं का रुख नहीं बताते.

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले 69 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटें जीती थीं. 2022 में बीजेपी और उसके सहयोगियों का प्रदर्शन घटा और एनडीए की कुल सीटें 63 रहीं, जबकि सपा गठबंधन ने 20 आरक्षित सीटें जीतीं.

लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश की 17 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों में बीजेपी ने आठ, समाजवादी पार्टी ने सात, कांग्रेस ने एक और आजाद समाज पार्टी ने एक सीट जीती। यानी इन सीटों पर विपक्षी दलों ने मिलकर नौ सीटों पर जीत दर्ज की.

ये आंकड़े बताते हैं कि आरक्षित सीटों पर बीजेपी और विपक्ष के बीच मुकाबले का स्वरूप बदला है. लेकिन यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि इन सभी सीटों पर हारजीत का कारण पासी समाज के मतदाता ही थे. इसके लिए प्रत्येक सीट के उम्मीदवार, गठबंधन, मतदान प्रतिशत और स्थानीय सामाजिक समीकरणों का अलगअलग विश्लेषण करना होगा.

क्या 2024 में पासी समाज बीजेपी से दूर हुआ?

लोकसभा चुनाव 2024 के बाद उत्तर प्रदेश में दलित वोटों के रुझान को लेकर कई राजनीतिक आकलन सामने आए. बीजेपी को कुछ क्षेत्रों में नुकसान हुआ और समाजवादी पार्टी ने आरक्षित सीटों सहित कई क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया.पासी समाज की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हुई.

लेकिन यह कहना कि पासी समाज पूरी तरह बीजेपी से दूर हो गया या पासी बहुल सभी सीटों पर बीजेपी हार गई, उपलब्ध चुनाव परिणामों से साबित नहीं होता। .

बीजेपी की प्रस्तावित बैठक को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि पार्टी सामाजिक संपर्क और संगठन के स्तर पर अपनी रणनीति की समीक्षा करना चाहती है. वहीं सपा की पीडीए राजनीति और उसके दलित नेताओं की सक्रियता भी इस मुकाबले का अहम हिस्सा है.

2027 से पहले पासी समाज पर क्यों बढ़ा फोकस?

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने सामाजिक और जातीय समीकरणों को लेकर तैयारी तेज कर दी है.बीजेपी के लिए पासी समाज का महत्व इसलिए भी है क्योंकि उसकी मजबूत उपस्थिति वाले कई क्षेत्रों में विधानसभा की सीटों का बड़ा समूह आता है.

पार्टी के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां हैं.पहली, कौशल किशोर सहित समाज के प्रमुख नेताओं के साथ संवाद बनाए रखना। दूसरी, संगठन और सरकार में प्रतिनिधित्व के साथ स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं तथा सामाजिक संगठनों की शिकायतों को सुनना.तीसरी, 2024 के लोकसभा चुनाव में बदले राजनीतिक समीकरणों को समझकर विधानसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति तैयार करना.

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी अपने पीडीए फॉर्मूले और दलित नेताओं की सक्रियता के जरिए सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में पासी समाज को लेकर दोनों दलों की गतिविधियां आने वाले महीनों में और चर्चा में रह सकती हैं.

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संपादकीय टीम

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