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Tata Group में अंदरूनी कलह… नोएल टाटा बोले- हम नहीं चलाते कंपनी, विरोध करने वाले दो साथियों को दिया दो टूक जवाब​

देश के सबसे बड़े कारोबारी घराने टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के भविष्य को लेकर अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सतह पर आ गई है. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के नेतृत्व वाले ट्रस्टियों ने टाटा संस के पुनर्गठन प्लान का कड़ा बचाव किया है. इसके साथ ही उन्होंने साफ लफ्जों में कहा […]

देश के सबसे बड़े कारोबारी घराने टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के भविष्य को लेकर अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सतह पर आ गई है. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के नेतृत्व वाले ट्रस्टियों ने टाटा संस के पुनर्गठन प्लान का कड़ा बचाव किया है. इसके साथ ही उन्होंने साफ लफ्जों में कहा है कि ट्रस्ट टाटा संस को नहीं चलाता है. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टियों डेरियस खंबाटा, नेविल टाटा और भास्कर भट ने दो वरिष्ठ ट्रस्टियों वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह के एतराज को सिरे से खारिज कर दिया है.

विवाद की शुरुआत तब हुई जब वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने आरोप लगाया कि 28 सितंबर को टाटा संस बोर्ड को भेजे गए पुनर्गठन प्रस्ताव से पहले उनसे कोई सलाहमशविरा नहीं किया गया था. इसके जवाब में नोएल टाटा गुट ने 4 अक्टूबर को एक कड़ा पत्र लिखकर सभी बिंदुओं पर स्थिति साफ की है. इस पत्र में दोनों असंतुष्ट ट्रस्टियों पर ट्रस्ट के फैसलों को कमजोर करने और अपनी जिम्मेदारियों की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया है.

टाटा संस को हम नहीं चलाते: नोएल टाटा

नोएल टाटा और अन्य ट्रस्टियों ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट कभी भी टाटा संस के रोजमर्रा के कामकाज को नियंत्रित नहीं करता और न ही ऐसा करने की उसकी कोई मंशा है. पत्र में कहा गया कि इस पुनर्गठन से ट्रस्ट के चैरिटेबल दर्जे को नुकसान पहुंचने का आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है.

ट्रस्टियों ने बताया कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी का रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी को भले ही खारिज कर दिया हो, लेकिन उसने कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने का कोई आदेश नहीं दिया है. आरबीआई के पत्र में किसी नियम के उल्लंघन की बात भी दर्ज नहीं है. ट्रस्टियों का कहना है कि केंद्रीय बैंक के इस रुख के बाद अब लिस्टिंग के अलावा कोई ऐसा वैध रास्ता निकालना जरूरी हो गया है, जिससे टाटा संस और ट्रस्ट के तय लक्ष्यों को हासिल किया जा सके.

शेयर बाजार लिस्टिंग टालने की इनसाइड स्टोरी

टाटा संस को लिस्टिंग से दूर रखने के लिए जो खाका तैयार किया गया है, उसके तहत दो कंपनियों के मर्जर की तैयारी है. योजना के मुताबिक, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स लिमिटेड का विलय टाटा संस में किया जाना है. इस कदम का मकसद टाटा संस को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के दायरे से बाहर निकालना है, जिससे उस पर लिस्टिंग का नियम लागू न हो.

ट्रस्टियों ने साफ किया कि टाटा संस को अनलिस्टेड बनाए रखने की नीति कोई नई नहीं है. ये फैसला कई सालों से ट्रस्ट और टाटा संस दोनों की तय रणनीति का हिस्सा रहा है. इसके तहत मार्च 2024 में बोर्ड के फैसले के बाद करीब 20,000 करोड़ रुपये के कर्ज चुकाए गए थे और प्रेफरेंस शेयर रिडीम किए गए थे. इसके अलावा सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने 28 मई और 28 जुलाई को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर कंपनी को अनलिस्टेड रखने के रास्ते तलाशने की मंजूरी दी थी. इसमें शापूरजी पलोनजी ग्रुप की हिस्सेदारी से बाहर निकलने के विकल्पों पर बात करना भी शामिल था.

दो सीनियर ट्रस्टियों की भूमिका पर सवाल

पत्र में वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह के रुख पर कड़े सवाल उठाए गए हैं. ट्रस्टियों के अनुसार, 17 सितंबर को टाटा संस बोर्ड की बैठक में आरबीआई के पत्र पर चर्चा हुई थी और ये सहमति बनी थी कि केवल लिस्टिंग ही नहीं, बल्कि सभी विकल्पों पर गौर किया जाए. बोर्ड ने ही ट्रस्ट्स से नियमों के पालन के लिए विकल्प सुझाने का अनुरोध किया था. ऐसे में 28 सितंबर का प्रस्ताव बोर्ड के काम में दखल नहीं, बल्कि उसकी मांग पर दिया गया जवाब था.

नोएल टाटा खेमे ने श्रीनिवासन के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि 13 अगस्त को एसडीटीटी ने नए उत्तराधिकारी के चयन की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव पास किया था. इसके बावजूद 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में श्रीनिवासन ने एन चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाए जाने के पक्ष में वोट दिया. इसके जरिए उन्होंने ट्रस्ट के हितों की सुरक्षा से जुड़े अधिकारों की अनदेखी की. इसके अलावा, दोनों ट्रस्टियों ने 25 सितंबर को चैरिटी कमिश्नर के पास जाकर बैठकों पर रोक लगाने की मांग की, जिसे पत्र में आपसी बातचीत के सिद्धांतों के खिलाफ बताया गया है.

66 फीसदी हिस्सेदारी का बड़ा फैसला

ट्रस्टियों ने इस बात पर भी ऐतराज जताया कि श्रीनिवासन और सिंह ने अप्रैल 2026 से लिस्टिंग का सार्वजनिक समर्थन करना शुरू कर दिया, जबकि साथी ट्रस्टियों के सामने अपनी राय नहीं रखी थी. इसे सीधे तौर पर तय जिम्मेदारियों का उल्लंघन बताया गया है.

पत्र में याद दिलाया गया कि टाटा संस में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट की कुल हिस्सेदारी करीब 51.54 फीसदी है, जबकि सभी टाटा ट्रस्ट्स मिलकर लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं. कंपनी में इतने बड़े शेयरधारक होने के नाते किसी भी बड़े पुनर्गठन पर अपनी राय रखना ट्रस्ट्स का बुनियादी अधिकार है. शेयरधारकों के इस कदम को प्रक्रिया में कोई गैरजरूरी दखल नहीं कहा जा सकता.

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संपादकीय टीम

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