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इस्लामिक नाटो के बाद यूरोपियन नाटो…अमेरिका से अलग होकर आत्मनिर्भर बनने का बन रहा प्लान

दुनिया के कई हिस्सों में इस समय तनाव चल रहा है. मध्य पूर्व और रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की बड़ी-बड़ी ताकतों को अपनी विदेश और सुरक्षा नीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है. एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि NATO को लेकर बदले अमेरिकी राष्ट्रपति के रुख के बाद यूरोप एक इमरजेंसी प्लान बना रहा है, ताकि अगर अमेरिका NATO से अपना रोल कम करता है, तो NATO के नए मिलिट्री स्ट्रक्चर का इस्तेमाल करके कॉन्टिनेंट की रक्षा की जा सके.

इस्लामिक नाटो के बाद यूरोपियन नाटो…अमेरिका से अलग होकर आत्मनिर्भर बनने का बन रहा प्लान
इस्लामिक नाटो के बाद यूरोपियन नाटो…अमेरिका से अलग होकर आत्मनिर्भर बनने का बन रहा प्लान

NATO (North Atlantic Treaty Organization) यूोरपीय और उत्तरी अमेरिका के दो देशों का एक ग्रुप है, जिसमें 30 यूरोपीय और दो उत्तरी अमेरिकी देश (कनाडा और अमेरिका) शामिल है. NATO का Article 5 NATO संधि (North Atlantic Treaty) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसे कलेक्टिव डिफेंस का आधार कहा जाता है, यानी एक देश पर हमला पूरे नाटो पर हमला माना जाता है. जिसकी वजह से छोटे-छोटे यूरोपीय देश भी अमेरिका जैसी सैन्य ताकत के कवच में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में वापसी के बाद से कई ऐसे कदम उठाएं हैं, जिनकी वजह से अमेरिका और नाटो देशों में दूरी आई है. यूक्रेन युद्ध में भी डोनाल्ड ट्रंप कीव को पूरी तरह से अमेरिकी मदद देने के खिलाफ रहे हैं. अब ईरान से युद्ध के बाद ये दूरी और बढ़ गई है और ट्रंप अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने पर विचार कर रहे हैं. अब यूरोपीय देश भविष्य में किसी भी स्थिति से अमेरिका के बिना निपटने की प्लानिंग करने लगे हैं.

द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारी उन प्रस्तावों पर काम कर रहे हैं जिन्हें कुछ लोग ‘यूरोपियन NATO’ कहते हैं, जिसमें अलायंस के कमांड-एंड-कंट्रोल रोल में ज़्यादा यूरोपियन लोगों को रखने और US मिलिट्री एसेट्स को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है. ऐसा पहली बार नहीं हो रहा, जब अमेरिका से इतर देश अपनी सुरक्षा के लिए एकजुट हो रहे हैं. कुछ महीने पहले सऊदी अरब-पाकिस्तान और तुर्की के के बीच भी इस्लामिक नाटो जैसा एक संगठन बनाने के विचार की भी चर्चाएं तेज हो गई थी.

क्या रूस पर बदले अमेरिकी रुख से मजबूर हुए यूरोपीय देश?

कुछ रिपोर्ट्स की माने तो इसको लेकर NATO सर्कल में इनफॉर्मल तरीके से बातचीत आगे बढ़ रही है. हिस्सा लेने वालों का कहना है कि यह कोशिश अलायंस को बदलने के लिए नहीं है. इसके बजाय, इसका मकसद के खिलाफ रोकथाम बनाए रखना, ऑपरेशनल कंटिन्यूटी बनाए रखना और अगर वाशिंगटन अपनी सेना या सपोर्ट वापस ले लेता है तो न्यूक्लियर क्रेडिबिलिटी बनाए रखना है.

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ और डोनाल्ड ट्रंप

इस प्लान को जर्मनी से खुला सपोर्ट मिला है, जो लंबे समय से यूरोप के डिफेंस मॉडल पर शक करता रहा है. यह कदम चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की अमेरिकी निर्भरता को लेकर बढ़ती चिंताओं को दिखाता है. यह कोशिश NATO पर ट्रंप की बातों को लेकर बढ़ती बेचैनी के बीच हुई है. एक बयान में उन्होंने यूरोपियन साथियों की आलोचना की है, उन्हें कायर कहा है और अलायंस को कागज़ी शेर बताया है. उन्होंने यह भी धमकी दी है कि अगर साथी ईरान सहित US की प्रायोरिटीज़ के साथ अलाइन नहीं होते हैं तो वह सपोर्ट वापस ले लेंगे.

यूरोपीय नेता अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेने की कर रहे तैयारी

कुछ यूरोपीय नेताओं का कहना है कि कोई भी बदलाव धीरे-धीरे होना चाहिए. फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने कहा कि अमेरिका से यूरोप की ओर बोझ शिफ्ट हो रहा है और यह जारी रहेगा. उन्होंने जोर दिया कि अमेरिका के अचानक बाहर निकलने के बजाय मैनेज्ड और कंट्रोलेबल तरीके से होना चाहिए.

स्टब ने कहा, “हमारे अमेरिकी दोस्तों के लिए बेसिक मैसेज यह है कि इतने दशकों के बाद अब यूरोप के लिए अपनी सिक्योरिटी और डिफेंस की ज़्यादा जिम्मेदारी लेने का समय आ गया है.” जर्मनी के डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिस्टोरियस ने कहा कि NATO यूरोप और अमेरिका दोनों के लिए जरूरी है. लेकिन उन्होंने यह भी कहा, “हम यूरोपियन लोगों को अपनी डिफेंस की ज़्यादा जिम्मेदारी लेनी चाहिए.”

इस्लामिक नाटो की भी हो रही चर्चाएं

इस्लामिक नाटो (Islamic NATO) की चर्चाएं मुख्य रूप से मीडिया, जानकारों और कुछ राजनेताओं में चल रही हैं, लेकिन यह अभी कोई आधिकारिक या पूर्ण रूप से बने गठबंधन नहीं है. इसे अक्सर सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग को नाम दिया जाता है.

इसके कयास तब से लगाए जा रहे हैं, जब सितंबर 2025 सऊदी और पाकिस्तान नेस्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट(SMDA) साइन किया. दोनों देशों ने इस पेक्ट में एक ऐसा क्लॉस रखा है, जो नाटो के आर्टिकल 5 जैसा है. यानी एक पर हमला = दोनों पर हमला. इस समझौते के बाद तुर्की ने भी सऊदी और पाकिस्तान अधिकारियों के साथ कई बैठकें कि लेकिन वह अभी तक इस समझौते में शामिल नहीं हुआ है.

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