नौकरी करना और मन लगाकर काम करना, दोनों अलगअलग बातें हैं. कई बार कर्मचारी अपनी नौकरी तो जारी रखते हैं, हर महीने सैलरी भी लेते हैं और तय समय पर ऑफिस भी पहुंचते हैं, लेकिन काम के प्रति उनका उत्साह धीरेधीरे कम होने लगता है. वे अपनी जिम्मेदारी के मुताबिक काम तो करते हैं, लेकिन अतिरिक्त जिम्मेदारी लेने, ज्यादा मेहनत करने या ऑफिस के काम में जरूरत से ज्यादा समय देने से बचते हैं. कॉरपोरेट की दुनिया में इस स्थिति को क्वाइट क्विटिंग कहा जाता है.

Gallup की State of the Global Workplace 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2025 के दौरान केवल 23% कर्मचारी ही अपने काम में पूरी तरह जुड़े हुए थे. वहीं, 59% कर्मचारी Not Engaged की श्रेणी में थे, जबकि 18% कर्मचारी Actively Disengaged थे. यानी हर चार में से करीब तीन कर्मचारी ऐसे थे, जिनका काम के प्रति जुड़ाव कम था या वे पूरी तरह असंतुष्ट थे. रिपोर्ट के मुताबिक, मैनेजरों में भी एंगेजमेंट का स्तर घटा है. साल 2024 में 39% मैनेजर अपने काम में पूरी तरह जुड़े हुए थे, लेकिन 2025 में यह आंकड़ा घटकर 30% रह गया. यह स्थिति कंपनियों के लिए चिंता की बात है, क्योंकि कर्मचारियों की दिलचस्पी और काम के प्रति उनका जुड़ाव सीधे तौर पर प्रोडक्टिविटी और कारोबार के प्रदर्शन को प्रभावित करता है.
क्वाइट क्विटिंग का मतलब क्या है?
क्वाइट क्विटिंग का मतलब नौकरी छोड़ना नहीं है. इसमें कर्मचारी कंपनी में काम करना जारी रखता है, लेकिन अपने काम को तय जिम्मेदारियों और काम के घंटों तक सीमित कर देता है. वह बिना अतिरिक्त भुगतान के ओवरटाइम करने, बारबार अतिरिक्त काम लेने या अपनी निजी जिंदगी को प्रभावित करके ऑफिस के काम को प्राथमिकता देने से बचता है.
उदाहरण के लिए, किसी कर्मचारी की जिम्मेदारी रोजाना तय संख्या में रिपोर्ट तैयार करना है. वह अपना काम समय पर पूरा करता है, लेकिन मैनेजर के कहने पर लगातार अतिरिक्त रिपोर्ट बनाने या ऑफिस के समय के बाद भी काम करने के लिए तैयार नहीं होता. ऐसे कर्मचारी को क्वाइट क्विटिंग की श्रेणी में रखा जा सकता है.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर ऐसा कर्मचारी गैरजिम्मेदार है. कई बार कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियां ठीक से निभा रहा होता है, लेकिन उसे लगता है कि उसकी मेहनत के मुकाबले उसे पर्याप्त सैलरी, सम्मान या आगे बढ़ने के मौके नहीं मिल रहे हैं.
क्यों कम हो रहा है कर्मचारियों का काम के प्रति उत्साह?
- काम का दबाव और निजी जिंदगी में संतुलन की कमी कई कंपनियों में कर्मचारियों से सीमित समय में ज्यादा काम करने की उम्मीद की जाती है. लगातार डेडलाइन, टारगेट और अतिरिक्त जिम्मेदारियों के कारण कर्मचारी मानसिक रूप से थकने लगते हैं. कई बार ऑफिस का काम घर तक पहुंच जाता है. इससे निजी जिंदगी और काम के बीच संतुलन बिगड़ता है. धीरेधीरे कर्मचारी अपनी ऊर्जा बचाने के लिए काम को तय जिम्मेदारियों तक सीमित करने लगते हैं.
- मेहनत के मुताबिक सैलरी नहीं मिलना कर्मचारी जब देखते हैं कि उनसे लगातार ज्यादा काम लिया जा रहा है, लेकिन सैलरी में उसके मुताबिक बढ़ोतरी नहीं हो रही, तो उनका उत्साह कम होने लगता है. महंगाई और बढ़ते खर्चों के बीच अगर सैलरी में पर्याप्त इजाफा नहीं होता, तो कर्मचारी अपनी अतिरिक्त मेहनत को लेकर सवाल उठाने लगते हैं. उन्हें लगता है कि ज्यादा काम करने का उन्हें कोई वास्तविक फायदा नहीं मिल रहा है.
- प्रमोशन और करियर ग्रोथ के मौके कम होना किसी भी कर्मचारी के लिए नौकरी सिर्फ हर महीने मिलने वाली सैलरी तक सीमित नहीं होती. वह अपने करियर में आगे बढ़ना और नई जिम्मेदारियां हासिल करना चाहता है. लेकिन लंबे समय तक प्रमोशन नहीं मिलने, नई स्किल सीखने के मौके न मिलने या एक ही तरह का काम करते रहने से कर्मचारी निराश हो सकते हैं. जब उन्हें भविष्य में आगे बढ़ने की संभावना कम दिखाई देती है, तो काम के प्रति उनकी दिलचस्पी भी घटने लगती है.
- खराब मैनेजमेंट और पहचान नहीं मिलना कर्मचारियों के काम करने के अनुभव में मैनेजर की भूमिका काफी अहम होती है. अगर मैनेजर कर्मचारियों की समस्याओं को नहीं समझते, उनकी बात नहीं सुनते या अच्छी परफॉर्मेंस के बावजूद उनकी सराहना नहीं करते, तो उनका जुड़ाव कम हो सकता है. Gallup की भारत पर आधारित रिपोर्ट भी कमजोर ऑर्गेनाइजेशनल कल्चर, लीडरशिप पर भरोसे की कमी और पहचान नहीं मिलने को क्वाइट क्विटिंग की प्रमुख वजहों में शामिल करती है.
मैनेजर भी हो रहे हैं काम से डिस्कनेक्ट
इस समस्या का एक अहम पहलू यह है कि सिर्फ जूनियर कर्मचारी ही नहीं, बल्कि मैनेजर भी अपने काम से दूरी बना रहे हैं. Gallup के मुताबिक, भारत में मैनेजरों का एंगेजमेंट 2024 के 39% से घटकर 2025 में 30% रह गया. वहीं, सामान्य कर्मचारियों में यह आंकड़ा 24% से घटकर 19% पर पहुंच गया.
मैनेजर ही कर्मचारियों को काम की प्राथमिकताएं समझाते हैं, उनकी परफॉर्मेंस पर फीडबैक देते हैं और टीम को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं. जब मैनेजर खुद ही काम को लेकर उत्साहित नहीं होते, तो इसका असर पूरी टीम पर पड़ सकता है. Gallup के मुताबिक, किसी टीम के एंगेजमेंट में 70% तक अंतर के लिए मैनेजर की भूमिका जिम्मेदार होती है.
कंपनियों और कारोबार पर क्या पड़ता है असर?
क्वाइट क्विटिंग का असर सिर्फ कर्मचारी तक सीमित नहीं रहता. जब बड़ी संख्या में कर्मचारी काम में अतिरिक्त दिलचस्पी नहीं लेते, तो कंपनियों की प्रोडक्टिविटी प्रभावित हो सकती है. नए आइडिया सामने आने कम हो सकते हैं, टीम के बीच सहयोग घट सकता है और काम की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है.
Gallup ने भारत में कर्मचारियों के कम एंगेजमेंट के कारण हर साल 351 अरब डॉलर यानी करीब 32.7 लाख करोड़ रुपये की उत्पादकता का नुकसान होने का अनुमान लगाया है. यह भारत की GDP के करीब 9% के बराबर है.
कुल मिलाकर, क्वाइट क्विटिंग को सिर्फ कर्मचारियों की कामचोरी समझना सही नहीं होगा. यह कंपनी के माहौल, मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच भरोसे में कमी का संकेत भी हो सकता है. नौकरी में बने रहना और काम से भावनात्मक रूप से जुड़ा होना अलगअलग बातें हैं. कंपनियों के सामने चुनौती सिर्फ कर्मचारियों को नौकरी में बनाए रखने की नहीं, बल्कि उन्हें काम के प्रति उत्साहित और प्रतिबद्ध बनाए रखने की भी है.