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FII आउटफ्लो और भू-राजनीतिक तनाव के बीच अगले हफ्ते कैसी होगी दलाल स्ट्रीट की चाल?​

इस हफ्ते भारतीय शेयर बाजारों में फिर से बिकवाली का दबाव देखने को मिला. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी और बढ़ते भूराजनीतिक तनाव ने निवेशकों के सेंटीमेंट को प्रभावित किया. निफ्टी 50 में 2.36 फीसदी की गिरावट आई, जबकि बीएसई सेंसेक्स करीब 2.15 फीसदी गिर गया. इससे पिछले दो हफ्तों […]

इस हफ्ते भारतीय शेयर बाजारों में फिर से बिकवाली का दबाव देखने को मिला. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी और बढ़ते भूराजनीतिक तनाव ने निवेशकों के सेंटीमेंट को प्रभावित किया. निफ्टी 50 में 2.36 फीसदी की गिरावट आई, जबकि बीएसई सेंसेक्स करीब 2.15 फीसदी गिर गया. इससे पिछले दो हफ्तों की बढ़त खत्म हो गई और लगातार चौथे सत्र में बाजार में गिरावट दर्ज की गई.

बिकवाली का असर सिर्फ बड़े शेयरों तक ही सीमित नहीं रहा. मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में और भी तेज गिरावट देखी गई. बढ़ती अनिश्चितता, वैल्युएशन को लेकर चिंता और लिक्विडिटी में कमी के चलते निवेशकों ने इन शेयरों से अपना निवेश घटाया. साइक्लिकल शेयरों में कमजोरी ने दबाव को और बढ़ा दिया, जबकि आईटी शेयरों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया.

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और एनर्जी सप्लाई में लंबे समय तक बाधा आने की चिंताओं के बीच, ब्रेंट क्रूड की कीमत 117 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई. अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी, विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और रिलायंस जियो IPO से जुड़ी लिक्विडिटी संबंधी चिंताओं ने भी बाजार के सेंटीमेंट पर असर डाला.

निवेशकों और विश्लेषकों का मानना ​​है कि 2728 अक्टूबर को होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की पॉलिसी मीटिंग, घरेलू औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े और सितंबर तिमाही के नतीजों पर सबकी नजर रहेगी. इनके आधार पर यह तय होगा कि बाजार स्थिर हो पाता है या बिकवाली का दबाव आगे भी बना रहता है. यहां वे पांच फैक्टर दिए गए हैं जो अगले हफ्ते शेयर बाजार की दिशा तय कर सकते हैं.

कच्चे तेल की कीमतें और भूराजनीतिक तनाव

भारतीय इक्विटी के लिए कच्चा तेल एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है. मध्य पूर्व में बढ़ते भूराजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति में रुकावट की आशंकाओं के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़ रही हैं. इस हफ्ते WTI क्रूड की कीमत भी 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई.

एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने कहा कि ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण भूराजनीतिक जोखिम प्रीमियम ऊंचे बने रह सकते हैं. अगर ईरान, होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी कोई और रुकावट आती है, तो भारत के ऊर्जा आयात बिल, महंगाई और कंपनियों के मुनाफे को लेकर चिंताएं और बढ़ सकती हैं.

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से ऊर्जा और परिवहन की लागत बढ़ सकती है, जिससे घरेलू खपत पर असर पड़ सकता है और तेल पर निर्भर क्षेत्रों पर दबाव आ सकता है. ऊर्जा की ऊंची कीमतें महंगाई के हालात को और जटिल बना सकती हैं और राजकोषीय घाटे को लेकर चिंताएं बढ़ा सकती हैं.

अगर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आती है, तो घरेलू मैक्रोइकॉनॉमिक हालात पर दबाव कम हो सकता है और निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है. हालांकि, अगर भूराजनीतिक तनाव और ऊर्जा की ऊंची कीमतें बनी रहती हैं, तो इक्विटी बाजार में और बिकवाली देखने को मिल सकती है.

US फेडरल रिज़र्व की पॉलिसी

आने वाले सप्ताह में US फेडरल रिज़र्व की 2728 अक्टूबर को होने वाली नीतिगत बैठक बाज़ारों के लिए एक अहम वैश्विक कारक होगी. चूंकि बाज़ारों को काफी हद तक यही उम्मीद है कि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा, इसलिए निवेशकों की नज़रें महंगाई और भविष्य में ब्याज दरों की चाल को लेकर केंद्रीय बैंक के मार्गदर्शन पर टिकी होंगी.

हरिसेलवन ने कहा कि ब्याज दरों पर लिए गए फैसले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण वह मार्गदर्शन होगा जो नीति के तहत दिया जाएगा. अगर महंगाई के जोखिमों पर लगातार ज़ोर दिया जाता है, तो इससे US यील्ड और डॉलर में तेज़ी आ सकती है, जिससे उभरते बाज़ारों में आने वाले विदेशी निवेश पर दबाव बना रह सकता है. वहीं, अगर मार्गदर्शन अधिक संतुलित रहता है, तो इससे वैश्विक इक्विटी बाज़ारों में कुछ समय के लिए सुधार देखने को मिल सकता है.

US ट्रेज़री यील्ड के ऊंचे स्तर पर रहने से ‘फिक्स्डइनकम’ एसेट्स ज़्यादा आकर्षक हो गए हैं, जिसका असर पूंजी के आवंटन और उभरते बाज़ारों में आने वाले विदेशी निवेश पर पड़ रहा है. US की 10वर्षीय ट्रेज़री यील्ड का मज़बूत बने रहना जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है और भारतीय इक्विटी बाज़ारों में विदेशी भागीदारी को सीमित कर सकता है.

‘एंटीAI ट्रेड’ के पलटने के बीच, वैश्विक टेक्नोलॉजी शेयरों और सट्टेबाज़ी वाले ग्रोथ एसेट्स पर भी निवेशकों की नज़रें टिकी रहेंगी. US यील्ड, डॉलर और वैश्विक जोखिम लेने की क्षमता की दिशा यह तय करने में अहम होगी कि क्या विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाज़ारों से अपना निवेश कम करना जारी रखेंगे या फिर वे वापस उभरते बाज़ारों की ओर लौटेंगे.

FII की बिकवाली, घरेलू लिक्विडिटी और रिलायंस जियो का IPO

विदेशी निवेशकों की बिकवाली घरेलू इक्विटी बाज़ारों के लिए एक बड़ा दबाव बनी हुई है, हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने इस बिकवाली के एक बड़े हिस्से को खपाने में मदद की है. अक्टूबर महीने में FIIs की कुल बिकवाली लगभग 51,465 करोड़ रुपए रही, जबकि इसी दौरान DIIs ने लगभग 59,110 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीदारी की. घरेलू संस्थागत निवेशकों की इस खरीदारी ने बाज़ार में बड़ी गिरावट को रोकने में मदद की है, लेकिन बाज़ार को स्थिर बनाए रखने के लिए यह देखना अहम होगा कि क्या यह समर्थन आगे भी बना रहता है या नहीं.

रिलायंस जियो का IPO एक और ऐसा कारक है जो घरेलू लिक्विडिटी को प्रभावित कर रहा है. सिंह ने कहा कि प्राइमरी मार्केट में आए इस बड़े इश्यू ने संस्थागत और खुदरा निवेशकों की पूंजी को अपनी ओर खींच लिया है, जिससे सेकेंडरी मार्केट की इक्विटी से फंड हट गया है और बेंचमार्क सूचकांक बिकवाली के दबाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं.

बाजार की निकट भविष्य की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी, विदेशी निवेशकों की बिकवाली की भरपाई कर पाती है या नहीं. FII की ओर से होने वाली निकासी में कमी आना और साथ ही घरेलू स्तर पर लगातार समर्थन मिलना, बाजार को अधिक मजबूती प्रदान कर सकता है. वैश्विक स्तर पर ऊंची यील्ड और प्राइमरी मार्केट में भारी गतिविधियों के बीच, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली इक्विटी पर दबाव बनाए रख सकती है.

औद्योगिक उत्पादन डेटा और दूसरी तिमाही की कमाई

घरेलू औद्योगिक उत्पादन डेटा और सितंबर तिमाही के नतीजों का दौर यह समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत देगा कि क्या कॉर्पोरेट प्रदर्शन और आर्थिक गतिविधियां लगातार बने बाहरी दबावों की भरपाई कर सकती हैं.

निवेशक रेवेन्यू ग्रोथ, ऑपरेटिंग मार्जिन, मांग की स्थिति और मैनेजमेंट की टिप्पणियों का आकलन करेंगे. इससे यह पता चलेगा कि क्या ऊर्जा की बढ़ती लागत और वैश्विक अनिश्चितता के बीच, कंपनियों की कमाई उनके मौजूदा वैल्यूएशन को सहारा दे सकती है.

निवेशक आईटी, ऑटोमोबाइल, कंज्यूमरकेंद्रित और अन्य प्रमुख क्षेत्रों की कंपनियों के नतीजों और मैनेजमेंट की टिप्पणियों पर बारीकी से नजर रखेंगे. वे यह देखेंगे कि क्या मांग में मजबूती बनी हुई है और क्या कंपनियों का मुनाफा आगे भी टिकाऊ रह सकता है. कुछ बैंकों के निराशाजनक नतीजों के बाद बैंकिंग शेयरों में आई हालिया कमजोरी ने कमाई की गुणवत्ता और ग्रोथ की उम्मीदों को लेकर निवेशकों की सतर्कता बढ़ा दी है.

क्या निफ्टी 22,300 के स्तर को बचा पाएगा?

मास्टर कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड के रवि सिंह के अनुसार, इस हफ्ते निफ्टी 50 में 2.36% की गिरावट आई है. इसके साथ ही, पिछले दो हफ्तों से चली आ रही तेजी का सिलसिला टूट गया है और सूचकांक अपने 200सप्ताह के ‘एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज’ के करीब पहुंच गया है.

सिंह ने बताया कि सूचकांक का तकनीकी ढांचा कमजोर बना हुआ है, और आईटी को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों में बिकवाली का दबाव दिख रहा है. फिलहाल 22,300 के आसपास सपोर्ट है. अगर सूचकांक इस स्तर के नीचे मजबूती से टूटता है, तो और बिकवाली आ सकती है और यह 22,000 के स्तर तक जा सकता है, जो एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सपोर्ट है.

ऊपर की तरफ, 22,85022,900 का दायरा एक अहम ‘रेजिस्टेंस’ बना हुआ है, जो 21दिवसीय EMA के साथ मेल खाता है. सिंह का कहना है कि जब तक सूचकांक इस रेजिस्टेंस के नीचे कारोबार करता है, तब तक ‘तेजी आने पर बिकवाली’ की रणनीति अपनानी चाहिए. ऐसे में, रिकवरी की किसी भी कोशिश पर लगातार बिकवाली का दबाव देखने को मिल सकता है.

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संपादकीय टीम

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