नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय इतिहास के सितारे थे, हैं और रहेंगे. भारत की आजादी में उनका योगदान अतुलनीय रहा. वे पहले भारतीय और आजादी के सिपाही थे, जिसने देश के बाहर यानी विदेशी धरती पर आजाद हिंद सरकार का गठन किया. उस जमाने में यह बहुत बड़ी बात थी. यह काम उन्होंने तब किया जबकि अहिंसावादी नेता महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू जैसे अनेक बड़े लोग वैचारिक तौर पर उनके साथ नहीं थे. यह सरकार सिंगापुर में बनी थी. आइए, नेताजी की पुण्यतिथि के बहाने जानते हैं कि आजाद हिंद सरकार को कितने देशों ने मान्यता दी? सरकार का स्वरूप क्या था? इस सरकार के प्रमुख के रूप में उन्होंने भारत भूमि पर तिरंगा कहा फहराया?

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. उन्होंने देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए अद्वितीय साहस दिखाया. उन्होंने न केवल सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुना, बल्कि एक समानांतर सरकार का गठन भी किया. इस सरकार को आरज़ी हुकूमतएआज़ाद हिंद यानी आजाद हिंद की अस्थायी सरकार कहा गया. इतिहास के पन्नों में यह पहला अवसर था जब भारत की भूमि से बाहर एक पूर्ण प्रशासनिक और कूटनीतिक सरकार का निर्माण हुआ. इस सरकार को दुनिया के कई प्रमुख देशों ने औपचारिक कूटनीतिक मान्यता भी दी थी.
सिंगापुर में हुई थी सरकार गठन की ऐतिहासिक घोषणा
21 अक्टूबर 1943 का दिन भारतीय इतिहास में एक युगांतकारी मोड़ था. सिंगापुर के प्रसिद्ध कैथे सिनेमा हॉल में विशाल जनसमूह एकत्र हुआ था. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इसी मंच से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार के गठन का औपचारिक ऐलान किया. नेताजी ने इस सरकार के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री और युद्ध मंत्री का पद संभाला. उनके साथ कैप्टन लक्ष्मी सहगल, एस. ए. अय्यर, रासबिहारी बोस और कई अन्य प्रमुख राष्ट्रवादी नेता मंत्रिमंडल में शामिल थे. इस सरकार का मुख्य उद्देश्य भारत की भूमि को ब्रिटिश हुकूमत से मुक्त कराना था.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विदेशी धरती पर आजाद हिंद सरकार का गठन किया. फोटो: Getty Images
नेताजी ने यहीं से अपना प्रसिद्ध नारा दिया था.
तुम मुझे खून दो,
मैं तुम्हें आजादी दूंगा.
आजाद हिंद सरकार को किन देशों ने दी थी मान्यता?
नेताजी की कूटनीतिक कुशलता का ही परिणाम था कि स्थापना के तुरंत बाद दुनिया के शक्तिशाली देशों ने इसे वैध सरकार के रूप में स्वीकार किया. इतिहास के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार कुल नौ संप्रभु देशों ने आजाद हिंद सरकार को औपचारिक मान्यता दी थी.
- जापान ने गठन के दो दिन बाद यानी 23 अक्टूबर 1943 को सबसे पहले इस सरकार को मान्यता दी. जापान ने आजाद हिंद फौज को हथियारों, प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सहायता में व्यापक सहयोग दिया.
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी ने 29 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद सरकार को आधिकारिक तौर पर मान्यता प्रदान की.
- यूरोप की प्रमुख धुरी शक्ति इटली ने भी नेताजी की सरकार को पूर्ण कूटनीतिक दर्जा दिया.
- डॉ. बा मॉ के नेतृत्व वाली बर्मा सरकार ने आजाद हिंद सरकार का गर्मजोशी से स्वागत किया और मान्यता दी. बाद में रंगून इस सरकार का प्रमुख आधार बना.
- यूरोप के तत्कालीन स्वतंत्र राज्य क्रोएशिया ने भी नेताजी के नेतृत्व वाली सरकार को संप्रभु सरकार के रूप में स्वीकार किया.
- वांग चिंगवेई के नेतृत्व वाली चीनी सरकार ने आजाद हिंद सरकार को अपनी औपचारिक मान्यता दी.
- दक्षिणपूर्व एशिया में थाईलैंड सरकार ने आजाद हिंद सरकार के साथ नजदीकी संबंध बनाए और उसे मान्यता प्रदान की.
- पूर्वी एशिया में स्थित मंचुकू सरकार ने भी नेताजी की अस्थायी सरकार को विधिवत मान्यता दी.
- जोस पी. लॉरेल के नेतृत्व वाले तत्कालीन द्वितीय फिलीपीन गणराज्य ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता दी.
- कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में आयरलैंड के पूर्व राष्ट्रपति इमोन डी वलेरा द्वारा भेजे गए बधाई और सहानुभूति संदेश का भी उल्लेख मिलता है, जिसने इस सरकार के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को और मजबूत किया.
आजाद हिंद सरकार को मिली अंतरराष्ट्रीय मान्यता ने वैश्विक राजनीति में बड़ा संदेश दिया.
केवल नाम की नहीं, पूर्ण प्रशासनिक सरकार
आजाद हिंद सरकार केवल प्रतीकात्मक या कागजी संगठन नहीं था. इसमें एक पूर्ण संप्रभु राष्ट्र के सभी आवश्यक घटक मौजूद थे.
- मुद्रा और बैंकिंग: आजाद हिंद सरकार ने नेशनल बैंक ऑफ आजाद हिंद की स्थापना की. इस बैंक की अपनी मुद्रा और चेक जारी होते थे.
- डाक टिकट और पासपोर्ट: सरकार ने अपने आधिकारिक डाक टिकट जारी किए. विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए यात्रा दस्तावेज और पहचान पत्र बनाए गए.
- न्यायालय और कानून: सैनिकों और नागरिकों के लिए कानूनी संहिता और नागरिक अदालतें स्थापित की गईं.
- महिला रेजिमेंट: कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में रानी झांसी रेजिमेंट बनी, जो एशिया में महिलाओं की पहली लड़ाकू सैन्य टुकड़ी थी.
- रेडियो और समाचार: आजाद हिंद रेडियो के जरिए नियमित रूप से कई भाषाओं में समाचार और रणनीतिक संदेश प्रसारित किए जाते थे.
स्वतंत्र भारत की पहली भूमि बनी अंडमान और निकोबार
दिसंबर 1943 में जापानी सेना ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का प्रशासनिक नियंत्रण आजाद हिंद सरकार को सौंप दिया. 30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में पहली बार तिरंगा फहराया. उन्होंने अंडमान का नाम बदलकर शहीद द्वीप और निकोबार का नाम स्वराज द्वीप रखा. यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण थी कि आजाद हिंद सरकार के पास अपनी स्वतंत्र भौगोलिक भूमि भी थी. इसके बाद आजाद हिंद फौज ने बर्मा सीमा पार कर पूर्वोत्तर भारत के कोहिमा और इंफाल तक अपनी पहुंच बनाई.
अचानक बढ़ा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
आजाद हिंद सरकार को मिली अंतरराष्ट्रीय मान्यता ने वैश्विक राजनीति में बड़ा संदेश दिया. इसने साबित किया कि भारत की आजादी की मांग केवल घरेलू आंदोलन नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मसला बन चुकी थी. ब्रिटिश सरकार इस सरकार और आजाद हिंद फौज से बेहद भयभीत हो गई थी. 1945 में जब लाल किले में आजाद हिंद फौज के अधिकारियों कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और मेजर शाहनवाज खान पर मुकदमा चला, तो पूरे भारत में विद्रोह की लहर दौड़ गई. रॉयल इंडियन नेवी के 1946 के विद्रोह ने अंग्रेजों को यह स्पष्ट कर दिया कि अब भारतीय सेना पर उनका नियंत्रण समाप्त हो चुका है.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित आजाद हिंद सरकार भारत की संप्रभुता का पहला अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र थी. बेहद अल्पकाल में नौ देशों से मिली आधिकारिक मान्यता ने इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ला दिया. इस सरकार ने भारत के लोगों में यह अटूट विश्वास जगाया कि वे स्वयं पर शासन करने में पूरी तरह सक्षम हैं. आजाद हिंद सरकार का पराक्रम और नेताजी की दूरदर्शिता भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में सदैव अमर और प्रेरणादायी रहेगी.