दिल की बीमारी का नाम सुनते ही आमतौर पर सीने में दर्द, सांस फूलना या बेचैनी जैसे लक्षणों का ध्यान आता है. लेकिन कुछ लोगों में हार्ट की आर्टरी में ब्लॉकेज होने के बावजूद कोई साफ संकेत दिखाई नहीं देता. इस सिचुएशन को साइलेंट इस्किमिया या आम भाषा में साइलेंट हार्ट डिजीज कहा जाता है. लक्षण न होने के कारण इसका पता अक्सर नियमित जांच, ईसीजी या किसी अन्य बीमारी की जांच के दौरान चलता है.

जब हृदय तक ऑक्सीजन पहुंचाने वाली धमनियों में वसा और कोलेस्ट्रॉल जमा होने लगता है, तो रक्त का प्रवाह कम हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि डॉक्टर ने इस पर क्या कहा?
डॉ. विवेक कुमार कहते हैं कि आमतौर पर इससे सीने में दर्द या दबाव महसूस होता है, लेकिन कुछ लोगों में दर्द की अनुभूति कम या बिल्कुल नहीं होती. इसका मतलब यह नहीं है कि हृदय सुरक्षित है. लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी रहने से हृदय की मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है और हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ सकता है.
किन लोगों में खतरा अधिक होता है?
डायबिटीज से पीड़ित लोगों में नसों को नुकसान पहुंचने के कारण दर्द का एहसास कम हो सकता है. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, धूम्रपान, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव और परिवार में कम उम्र में हृदय रोग का इतिहास भी जोखिम बढ़ाते हैं. उम्र बढ़ने के साथसाथ पुरुषों और रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में भी खतरा बढ़ सकता है.
कभीकभी साइलेंट हार्ट डिजीज में सीने में दर्द के बजाय असामान्य थकान, सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना, चक्कर, पसीना, अपच जैसा महसूस होना या जबड़े, पीठ और कंधे में हल्का दर्द हो सकता है. इन संकेतों को अक्सर गैस, थकान या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
डॉक्टर की सलाह सबसे जरूरी
इस बीमारी की पहचान के लिए डॉक्टर मरीज की उम्र, लक्षण और जोखिम कारकों के आधार पर जांच की सलाह दे सकते हैं. इनमें ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की जांच, ईसीजी, ट्रेडमिल टेस्ट, इकोकार्डियोग्राफी या जरूरत पड़ने पर सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी शामिल हो सकती है. हर व्यक्ति के लिए सभी जांच जरूरी नहीं होती और टेस्ट का फैसला डॉक्टर करते हैं.
बचाव के लिए क्या करें
बचाव के लिए नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, धूम्रपान से दूरी, वजन और तनाव पर नियंत्रण तथा डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना जरूरी है. 40 वर्ष की उम्र के बाद, या इससे पहले यदि जोखिम अधिक हो, तो नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए.
सीने में दबाव, अचानक सांस फूलना, ठंडा पसीना, बेहोशी या जबड़े और बाएं हाथ में दर्द जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज न करें. साइलेंट हार्ट डिजीज में लक्षण कम हो सकते हैं, लेकिन खतरा कम नहीं होता. टाइमटाइम पर टेस्ट कराना और लाइफस्टाइल में बदलाव हृदय को गंभीर नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.