Thursday, April 23, 2026
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Kolkata: कहीं जोकर कहीं सत्ता… यही है ‘कलकत्ता’? फिल्मी पर्दे पर सिटी ऑफ जॉय की अनोखी कहानियां

दिग्गज निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत ने सन् 1958 में फिल्म बनाई- हावड़ा ब्रिज. मुख्य सितारे- अशोक कुमार और मधुबाला. फिल्म का मुख्य नायक अपने भाई के हत्यारे की तलाश में कोलकाता (तब कलकत्ता) जाता है. इसी दौरान उसे इस महानगर की खूबियां मालूम होती हैं तो दुश्वारियों का सामना भी करना पड़ता है. दुनिया के बड़े बुद्धिजीवियों ने इसे कभी सिटी ऑफ जॉय कहा था. मतलब आनंद का शहर. फिल्म में एक ऐसा गाना है जो कोलकाता शहर का मिजाज दर्शाता है. यह आज के माहौल में और भी प्रासंगिक है. गाने की शुरुआती पंक्तियां हैं- ईंट की दुक्की, पान का पत्ता, कहीं जोकर, कहीं सत्ता है, सुनो जी ये कलकत्ता है…

Kolkata: कहीं जोकर कहीं सत्ता… यही है ‘कलकत्ता’? फिल्मी पर्दे पर सिटी ऑफ जॉय की अनोखी कहानियां
Kolkata: कहीं जोकर कहीं सत्ता… यही है ‘कलकत्ता’? फिल्मी पर्दे पर सिटी ऑफ जॉय की अनोखी कहानियां

जी हां, सुनो जी ये कलकत्ता है. ताश के पत्तों का शहर. साहब बीबी और गुलाम का शहर, प्यासा का शहर, देवदास का शहर. सियासत की हो या जिंदगी की- कोलकाता की फितरत तब भी थी, आज भी है. तांगे दौड़ाते सदाबहार अभिनेता ओम प्रकाश मस्तमौला अंदाज में यह गाना गा रहे हैं और कोलकाता की जीवनशैली की बखान कर रहे हैं. साठ के दशक के शहर का बैकग्राउंड लुभावना है. यह दर्शाता है कि आज के कोलकाता में जो आपाधापी मची है, उसकी बुनियाद काफी पहले ही पड़ चुकी थी. साहित्य हो या कि सिनेमा- यहां हर दौर के कोलकाता को दिखाया है.

कहां किसका कटने वाला पत्ता है

उस गाने में आगे की पंक्तियां भी क्या खूब हैं, कितनी मौजू हैं- ये बस्ती हैं आग का दरिया…इसमें हावड़ा पुल हैं, अपनी जान बचा लो बाबू, वरना डिब्बा गुल हैं… सर पर पांव रख कर भागो… कटने वाला पत्ता है… सुनो जी ये कलकत्ता है… कोलकाता ही क्यों इन दिनों पूरे पश्चिम बंगाल की चुनावी फिजां का भी यही हाल है. चुनावी रेस में हर कोई मानो सर पर पांव रखकर भाग रहा है… हर कोई एक दूसरे का डिब्बा गुल करने पर आमदा है, ना जाने कहां किसका पत्ता कट जाय.

बहरहाल सिल्वर स्क्रीन पर कोलकाता शहर के ऐसे ही मिजाज को दर्शाने वाली कहानियों की चर्चा करें, उससे पहले बताएं कि इस गीत को कमर जलालाबादी ने लिखा था, संगीत दिया था ओपी नैय्यर ने और गाया था- मो. रफी ने. हावड़ा ब्रिज साठ के दशक की एक कल्ट मूवी है. इससे कई नये कलाकारों की प्रतिभा निखरकर सामने आई थी. गीता दत्त के गाये मेरा नाम चिन चिन चू… गाने पर हेलन की मादक पेशकश, तो मधुबाला के लिए आइये मेहरबां, बैठिए जाने जां… गाकर आशा भोसले भी चर्चा में आईं. हावड़ा ब्रिज ने हेलन और आशा भोसले को बड़ा मौका दिया. शक्ति सामंत इसके सूत्रधार बने.

चाइना टाउन में डबल रोल के दो चेहरे

गौरतलब है कि हावड़ा ब्रिज एक क्राइम थ्रिलर थी. और इसके बाद कई फिल्मों में कोलकाता को इसी थ्रिल के साथ दिखाया गया है. कोलकाता मतलब महानगरीय आपाधापी, गरीबी और अमीरी का कॉन्ट्रास्ट. औद्योगिक विकास और आम आदमी की मुश्किलें. मिल मालिकों का जुल्म और मजदूरों का हक. अंग्रेजों के बसाये क्लब कल्चर और बढ़ते अपराध. पश्चिमी आधुनिकता और प्रादेशिक संस्कृति का संगम. लेकिन इसी कोलकाता को इससे पहले बिमल रॉय ने 1957 की दो बीघा ज़मीन में आम आदमी के सपनों और उसकी जिंदगी की दुश्वारियों को बहुत ही यथार्थवादी शैली में दिखाया था. महानगर का कैनवस कैसे एक मजदूर को लील जाता है- दो बीघा ज़मीन इसका उदाहरण है. वह ना कर्ज उतार पाता है और ना ही खुशहाल हो पाता है.

लेकिन हावड़ा ब्रिज ने सिल्वर स्क्रीन पर इस शहर के कैनवस को बदल दिया. इसके बाद साल 1962 में आई- चाइना टाउन. रियल हावड़ा ब्रिज से लेकर कोलकाता शहर तक की कहानी. इसे भी शक्ति सामंत ने ही बनाया था. सितारे थे- शम्मी कपूर और शकीला. एक बार फिर क्राइम थ्रिलर. डबल रोल में शम्मी कपूर के किरदारों ने शहर के दो चेहरे भी दिखा दिये. कोलकाता तेजी से बदल रहा था. दोहरा व्यक्तित्व महानगरीय जीवन की प्रवृत्ति है. इसे दिखाने में शक्ति सामंत एक बार फिर कामयाब हुये. कोलकाता क्राइम थ्रिलर वाला खास शहर कहलाने लगा.

केएल सहगल, पृथ्वीराज कपूर, अमिताभ बच्चन

कोलकाता अंग्रेजी उपनिवेशकाल से ही कला, सिनेमा, थिएटर और सत्ता के साथ-साथ व्यापार का बड़ा केंद्र रहा है. मृणाल सेन और सत्यजित राय जैसी दिग्गज सिने शख्सियतों के नाम से यह शहर दुनिया भर में जाना गया है. पारसी थिएटर हो या कि न्यू थिएटर- इनके माध्यम से सिनेमा उद्योग को आगे बढ़ाने में कोलकाता ने बड़ी भूमिका निभाई. कुंदनलाल सहगल हों या पृथ्वीराज कपूर- उनके जैसे कई ख्यातिप्राप्त कलाकारों ने कोलकाता से अपने करियर की उड़ान भरी.

हिंदी सिनेमा में सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन भी मुंबई रुख करने से पहले कोलकाता में ही थे. अमिताभ बच्चन वैसे तो ऋषिकेश मुखर्जी की आनंद में ही बंगाली डॉक्टर का किरदार निभा चुके थे लेकिन कोलकाता बैकड्रॉप के साथ बाद के दौर में उन्होंने शूजित सरकार की पीकू और रिभु दासगुप्ता की तीन में खास रोल किया था. पीकू के भास्कर बैनर्जी अस्वस्थ बुजुर्ग हैं लेकिन तीन के जॉन बिस्वास क्राइम का सुराग लगाने के लिए लगातार प्रयत्नरत हैं.

ये दुनिया अगर मिल भी जाय तो क्या है!

कोलकाता और बंगाली साहित्य से गुरु दत्त का भी विशेष प्रेम रहा है. उन्होंने जब प्यासा बनाई तो उसकी कहानी में भी कोलकाला शहर नजर आया. वहीदा रहमान, माला सिन्हा, रहमान और जॉनी वाकर की एक क्लासिक फिल्म है. ये दुनिया अगर मिल भी जाय तो क्या है… का भाव कोलकाता की फितरत से है. शायर विजय को कला और व्यवसाय, धोखा और जज्बात में अंतर मालूम होता है. यह सन् 1957 की फिल्म थी. देश आजाद होने के महज एक दशक के बाद का भारत. साहिर लुधियानवी के शब्द थे- जिन्हें नाज है हिंद पर वे कहां हैं.

इससे दो साल पहले ही बिमल रॉय शरतचंद्र चटोपाध्याय रचित देवदास पर फिल्म लेकर आए थे. दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन और मोतीलाल जैसे सितारों से सजी एक क्लासिक फिल्म. देवदास में भी कोलकाता का परिदृश्य था और सामंतवाद का स्वांग था. ढहते सामंतवाद के आडंबर को दर्शाने के लिए गुरु दत्त ने एक बार फिर विमल मित्र के उपन्यास साहिब बीबी और गुलाम को चुना और कामयाब फिल्म बनाई.

कोलकाता फिल्मों का सक्सेस फॉर्मूला

इस तरह कोलकाता शहर भी फिल्मों की कामयाबी का एक फॉर्मूला रहा है, जैसे कि मुंबई का बैकड्रॉप. आगे चलकर कोलकाता केंद्रित अनेक फिल्में आईं और बॉक्स ऑफिस पर खूब चर्चित भी रहीं. इनमें समानांतर और मुख्यधारा दोनों ही शैली की फिल्में हैं. सन् 1963 में सत्यजित राय ने द बिग सिटी नामक फिल्म बनाई थी. आधुनिक शहर में मध्यमवर्गीय परिवार के गुजारे और महत्वाकांक्षा की कहानी.

सत्यजित राय ने सन् 1970 में कोलकाता को केंद्र में रखकर एक और फिल्म बनाई- विरोधी. इसमें केवल आम आदमी की कहानी नहीं थी बल्कि शहर की बदलती राजनीति फिजां को भी दर्शाया गया था. कोलकाता कैसे धीरे-धीरे राजनीतिक हिंसा की चपेट में आ गया. राजनीति ग्रस्त और हिंसा ग्रस्त होते कोलकाता को इसी समय 1971 में मृणाल सेन ने भी साक्षात्कार में बेबाकी से दिखाया.

विद्या बालन की परिणीता और कहानी

इसके बाद सन् 1981 में हमें 36 चौरंगी लेन में एक ऐसा कोलकाता नजर आता है, जहां के तेज आधुनिकीकरण की चपेट में महानगरीय लोग अकेलेपन से ग्रस्त हो गए. इसमें अपर्णा सेन और जेनिफर कैंडल ने भूमिका निभाई थी. इस फिल्म को शशि कपूर ने प्रोड्यूस किया था. लेकिन सालों बाद कोलकाता सबसे अधिक चर्चा में तब आया जब प्रदीप सरकार के निर्देशन में साल 2005 में विद्या बालन की परिणीता और सुजॉय घोष निर्देशित 2012 में कहानी आई.

परिणीता भी शरद चंद्र चटोपाध्याय की कहानी की आधुनिक पेशकश थी. जोकि एक सफल फिल्म थी. लेकिन कहानी में विद्या बालन की दमदार एकल भूमिका ने मानो साक्षात दुर्गा का अवतार ही ले लिया. कहानी ने एक बार फिर से कोलकाता बैकड्रॉप वाले क्राइम थ्रिलर का जॉनर को पकड़ा और बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी हासिल की. इसके बाद सबसे हाल में लाइफ इन मेट्रो पार्ट 2 के कुछ सीन में भी कोलकाता शहर नए लकदक में नजर आता है. तो विवेक रंजन अग्निहोत्री की दी बंगाल फाइल्स में भी नया-पुराना कोलकाता दिखता है. यहां तक आते आते कोलकाता कितना बदल गया, या कोलकाता को देखने समझने का नजरिए कितना अलग हो गया, समझा जा सकता है.

लेख की शुरुआत में जिस गाने का जिक्र किया गया है, लेख का अंत भी उसी गाने की कुछ पंक्तियों से. ये पंक्तियां हैं- कहीं मुखर्जी, कहीं बनर्जी, कहीं घोष कहीं दत्ता है…सुनो जी ये कलकत्ता है.

khabarmonkey@gmail.com

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