भारतीय थाली में गेहूं की रोटी का स्थान सबसे अहम है, लेकिन पिछले कुछ समय से ‘ग्लूटेन फ्री’ ट्रेंड ने इसे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर दावे किए जा रहे हैं कि गेहूं की रोटी कई बीमारियों की जड़ है। लेकिन क्या वाकई हर किसी के लिए ग्लूटेन जहर है, या यह सिर्फ एक मार्केटिंग का हिस्सा है? विज्ञान और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बारे में क्या सोचते हैं? Dr Anoop Misra की किताब Smart Calories and Common Sense में ग्लूटेन को लेकर सारी सच्चाई बताई गई है।

डॉक्टर मिश्रा के मुताबिक कई डाइट ट्रेंड्स की तरह आजकल ग्लूटेन-फ्री डाइट को भी हर बीमारी का समाधान मानने का चलन बढ़ गया है। बहुत से लोग खुद को ज्यादा हेल्दी बनाने के लिए ग्लूटेन-फ्री डाइट अपनाने लगे हैं। ग्लूटेन को कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बताया जाता है, लेकिन वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि ग्लूटेन-फ्री डाइट का फायदा मुख्य रूप से उन्हीं लोगों को होता है जिन्हें ग्लूटेन से जुड़ी मेडिकल समस्याएं हैं।
ग्लूटेन क्या है और यह समस्या कैसे पैदा करता है?
ग्लूटेन एक प्रकार का प्रोटीन है जो गेहूं, जौ और राई में पाया जाता है। यह अनाज को उसकी संरचना बनाए रखने में मदद करता है। आमतौर पर ग्लूटेन का संबंध गेहूं से जोड़ा जाता है। रोटी और ब्रेड के अलावा यह सूप, पास्ता, सीरियल, सॉस और कुछ सलाद ड्रेसिंग में भी मौजूद होता है। आंतों में प्रोटीज एंजाइम ग्लूटेन को तोड़ते हैं। ज्यादातर लोग बिना पचे ग्लूटेन को आसानी से सहन कर लेते हैं, लेकिन कुछ लोगों में यह बीमारी का कारण बन सकता है।
ग्लूटेन का सबसे अच्छा स्रोत है रोटी
भारतीय डाइट में रोटी ग्लूटेन का सबसे बड़ा स्रोत है और खासकर उत्तर भारत में यह भोजन का अहम हिस्सा है। एक मध्यम आकार की रोटी में लगभग 3 ग्राम फाइबर, 3.8 ग्राम प्रोटीन होता है। अगर कोई व्यक्ति दिन में 4 रोटियां खाता है, तो उसे करीब 12 ग्राम फाइबर और 15 ग्राम प्रोटीन मिलता है, जो दैनिक जरूरत का बड़ा हिस्सा है। फाइबर और प्रोटीन दिल की बीमारी का खतरा कम करने, मांसपेशियों और हड्डियों को मजबूत रखने और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने में मदद करते हैं। पर्याप्त फाइबर आंतों की सेहत के लिए भी जरूरी है।
ग्लूटेन का सेवन करने से सेहत पर कैसा होता है असर?
कुछ लोगों में बिना पचा ग्लूटेन ऑटोइम्यून रिएक्शन पैदा कर सकता है, जिससे शरीर की कोशिकाएं खुद आंतों पर हमला करने लगती हैं। इससे पेट फूलना, गैस और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इस बीमारी को सीलिएक डिजीज कहा जाता है। अगर यह बीमारी गंभीर हो जाए तो एनीमिया, हड्डियों का कमजोर होना और वजन कम होना जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। सीलिएक डिजीज अक्सर परिवारों में चलती है और इसे लक्षणों व विशेष एंटीबॉडी टेस्ट (Tissue Transglutaminase IgA) से पहचाना जाता है। यह बीमारी लगभग 1 प्रतिशत लोगों को प्रभावित करती है। ऐसे लोगों में ग्लूटेन का सेवन बंद करने पर लक्षण खत्म हो जाते हैं।
कुछ लोगों में ग्लूटेन संवेदनशीलता के कारण त्वचा पर फफोले जैसी समस्या (Dermatitis Herpetiformis) हो सकती है। वहीं कुछ लोगों को ग्लूटेन खाने के बाद परेशानी होती है लेकिन उनके शरीर में एंटीबॉडी नहीं मिलते। इन्हें नॉन-सीलिएक ग्लूटेन सेंसिटिविटी कहा जाता है। कुछ मरीजों में ग्लूटेन की वजह से चलने-फिरने में भी समस्या हो सकती है। ऐसे लोगों को भी ग्लूटेन छोड़ने से फायदा मिलता है।
क्या आधुनिक गेहूं ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है?
आधुनिक गेहूं में ग्लूटेन की मात्रा बढ़ने और उससे इम्यून सिस्टम पर ज्यादा असर पड़ने के बीच सीधा संबंध अभी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है। डाइट, जेनेटिक्स और अन्य कारण भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं। इस विषय पर अभी और रिसर्च की जरूरत है।
जिन लोगों को सीलिएक डिजीज नहीं है, उनके लिए ग्लूटेन-फ्री डाइट कितनी सही?
रिसर्च बताती है कि ज्यादातर स्वस्थ लोगों के लिए ग्लूटेन छोड़ना सही फैसला नहीं हो सकता, क्योंकि इससे शरीर को जरूरी पोषक तत्व कम मिल सकते हैं और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है।
ग्लूटेन-फ्री डाइट के नुकसान भी हो सकते हैं
- ग्लूटेन-फ्री डाइट के कुछ नुकसान भी सामने आए हैं जैसे
- स्वाद कम पसंद आना
- ज्यादा खर्च होना
- सामाजिक और मानसिक असहजता होना
- पोषण की कमी का खतरा बढ़ता है।
हाल ही में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन IBS मरीजों को लगता था कि वे ग्लूटेन के प्रति संवेदनशील हैं, उनमें गेहूं, ग्लूटेन और प्लेसीबो तीनों पर लगभग समान प्रतिक्रिया हुई। इससे संकेत मिलता है कि कई मामलों में लक्षणों के पीछे ग्लूटेन नहीं बल्कि मानसिक अपेक्षाएं भी हो सकती हैं। कुछ मामलों में ग्लूटेन-फ्री डाइट IBS जैसे लक्षणों को बढ़ा भी सकती है, क्योंकि कई ग्लूटेन-फ्री फूड्स में FODMAPs अधिक होते हैं, जो गैस और पेट फूलने की समस्या पैदा कर सकते हैं।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य स्वास्थ्य चर्चा और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। गेहूं या ग्लूटेन का प्रभाव हर व्यक्ति के मेटाबॉलिज्म और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है। यदि आपको पाचन संबंधी समस्या, गेहूं से एलर्जी या ‘सीलिएक डिजीज’ (Celiac Disease) के लक्षण महसूस होते हैं, तो अपनी डाइट में किसी भी तरह का बड़ा बदलाव करने से पहले किसी प्रमाणित डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें।





