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‘कोई ले…’ की पुकार से पड़ा नाम! कृष्ण जन्म की कहानी से जुड़ा है मथुरा का कोयले घाट​

Shri Krishna Janmashtami: भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में यमुना किनारे बसे कई घाट अपने साथ सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं और कृष्ण लीलाओं की कहानियां समेटे हुए हैं. इन्हीं में से एक है कोयले घाट. ब्रज की स्थानीय परंपरा में इस घाट को उस स्थान से जोड़कर देखा जाता है, जहां श्रीकृष्ण के जन्म के […]

Shri Krishna Janmashtami: भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में यमुना किनारे बसे कई घाट अपने साथ सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं और कृष्ण लीलाओं की कहानियां समेटे हुए हैं. इन्हीं में से एक है कोयले घाट. ब्रज की स्थानीय परंपरा में इस घाट को उस स्थान से जोड़कर देखा जाता है, जहां श्रीकृष्ण के जन्म के बाद वासुदेव उन्हें लेकर यमुना पार करते हुए गोकुल पहुंचे थे. जन्माष्टमी के मौके पर एक बार फिर कोयले घाट की चर्चा हो रही है. गोकुल के सामने यमुना किनारे स्थित यह जगह धार्मिक आस्था के साथसाथ ब्रज की लोककथाओं और परंपराओं का भी हिस्सा है.

जन्म के बाद कृष्ण को लेकर निकले थे वासुदेव

धार्मिक कथा के अनुसार, कंस की जेल में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था. इसके बाद वासुदेव नवजात कृष्ण को एक टोकरी में रखकर गोकुल की ओर निकल पड़े. उस समय यमुना का जल काफी बढ़ा हुआ था. कहा जाता है कि जब वासुदेव यमुना पार करने लगे तो नदी का जलस्तर बढ़ता चला गया. मान्यता है कि यमुना श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श करना चाहती थीं. इससे वासुदेव परेशान हो गए. इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपने चरण यमुना की ओर किए और नदी का जल शांत हो गया. वासुदेव यमुना पार करके सुरक्षित गोकुल पहुंच गए. इसी धार्मिक मान्यता से कोयले घाट को जोड़कर देखा जाता है.

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कोई ले पुकार से जुड़ा है घाट का नाम

कोयले घाट के नाम को लेकर भी ब्रज में एक लोककथा प्रचलित है. ब्रज फाउंडेशन के अनुसार, मान्यता है कि संकट की उस घड़ी में वासुदेव मदद के लिए पुकारते हुए कोई ले कहते हुए आगे बढ़े थे. इसी लोककथा से इस स्थान का नाम आगे चलकर कोइले या कोयले घाट पड़ा. हालांकि, नाम की यह व्याख्या धार्मिक लोककथा पर आधारित है और इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाता.

एक तरफ मथुरा, दूसरी ओर गोकुल

कोयले घाट की खासियत सिर्फ इसकी धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि इसका भौगोलिक स्थान भी है. यह यमुना के किनारे स्थित है और यहां से नदी के दूसरी तरफ गोकुल दिखाई देता है. ब्रज फाउंडेशन के विवरण के मुताबिक, घाट से एक दिशा में वृंदावन और दूसरी ओर मथुरा का क्षेत्र भी नजर आता है. यही वजह है कि यह जगह धार्मिक आस्था के साथसाथ यमुना के सुंदर नजारे के लिए भी जानी जाती है.

यमुना की बाढ़ ने फिर याद दिलाई कृष्ण लीला

साल 2010 और 2014 में यमुना में आई बाढ़ के दौरान कोयले घाट का बड़ा हिस्सा पानी में डूब गया था. बताया जाता है कि इस दौरान यहां स्थापित वासुदेव जी की प्रतिमा भी कमर तक पानी में आ गई थी. स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने इस दृश्य को भगवान कृष्ण के जन्म और वासुदेव द्वारा यमुना पार करने की पुरानी कथा से जोड़कर देखा.

कृष्ण जन्म की कथा से जुड़ा आस्था का केंद्र

आज कोयले घाट सिर्फ यमुना किनारे मौजूद एक घाट नहीं है. यह ब्रज की उस धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जहां श्रीकृष्ण के जन्म, वासुदेव की यात्रा और यमुना की लीला की कहानी एक साथ जुड़ती है. जन्माष्टमी के दौरान जब मथुरावृंदावन में कृष्ण जन्मोत्सव की धूम रहती है, तब कोयले घाट भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का केंद्र बन जाता है. यहां की मान्यताएं आज भी ब्रज की लोक परंपराओं और कृष्ण भक्ति की गहरी जड़ों को दर्शाती हैं.ँ

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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