लंबे इंतजार के बाद आखिर अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट के लिए मुख्य कार्यपालक अधिकारी का चयन हो ही गया. पूरे 5585 आवेदनकर्ताओं में से सीईओ की तलाश आसान नहीं थी. बड़ी मशक्कत के बाद यह चयन हो सका. चंदे में घपले से सरकार की इतनी बदनामी हुई थी कि जिन लोगों को बीजेपी का अंध भक्त कहा जाता था, वे भी मोदीयोगी सरकार का नाम सुनते ही उद्विग्न हो जाते. करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केन्द्र राम मंदिर के चंदे में भी घपला! इसके बाद फिर कैसे एक कड़क, अनुशासन बद्ध व्यक्ति का इस अहम पद के लिए चयन हो यह भी एक अग्नि परीक्षा थी.

सरकार को इस पद के लिए एक निस्पृह, निष्पक्ष और ईमानदार व्यक्ति का चयन करना था. कई आईएएस, आईपीएस और विभिन्न क्षेत्रों के वरिष्ठ अफसरों, रिटायर्ड नौकरशाहों ने भी आवेदन किया था. पद वायु सेना के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी जितेंद्र मिश्रा को मिला.
कड़क और अनुशासित सैन्य अधिकारी की छवि
नये CEO जितेंद्र मिश्रा की प्रोफाइल में कई अहम वीरता पदक और जटिल सैन्य अभियानों को सफलतापूर्वक निपटा देने की उनकी कुशलता भी है. जितेंद्र मिश्रा जब एयर मार्शल थे तब उन्होंने गत वर्ष ऑपरेशन सिंदूर का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया था. वे कड़क हैं और सेना के अनुशासन में पगे भी. यूं भी अपने देश में आईएएस और आईपीएस के अफसरों के भ्रष्टाचार, भाईभतीजावाद तथा उत्पीड़न के इतने अधिक किस्से हैं कि कोई भी सामान्य व्यक्ति उनके नाम पर शंका ही करता.
लेकिन जितेंद्र मिश्रा की चारों तरफ जयजयकार हो रही है. इस तरह के व्यक्ति का चयन केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की योगी सरकार की छवि सुधारने भी सहायक होगी. उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव अगले ही वर्ष मार्च तक निपट जाएगा. इस वजह से अयोध्या उनके लिए बहुत महत्त्वपूर्ण था. खासकर योगी की जातिवादी छवि को ठीक करने के लिए.
योगी के लिए भी लाभदायक होंगे जितेंद्र मिश्रा
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एक योगी हैं और गोरखपुर की प्रतिष्ठित गोरख पीठ के महंत भी. गेरुआ वस्त्र पहनते हैं और उनकी छवि बेदाग बताई जाती है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि प्रदेश की नौकरशाही, पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य महकमे में जम कर भ्रष्टाचार और भाईभतीजावाद तथा जातिवाद व्याप्त है. एक वर्ग की शिकायत है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चूंकि स्वयं राजपूत हैं इसलिए सारे अहम पदों पर सिर्फ राजपूत ही हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण इस बात से खासे नाराज हैं. और वहां पर ब्राह्मणों की संख्या पर्याप्त है.
अयोध्या स्थित राम मंदिर के CEO जितेंद्र मिश्रा ब्राह्मण हैं और उनकी जड़ें पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से हैं. इसलिए एक संदेश तो ब्राह्मणों में गया कि नहीं सरकार जातिवाद नहीं फैला रही. दूसरे वह ईमानदार व्यक्तियों को ही पसंद करती है. तीसरे जितेंद्र मिश्रा सेना से हैं, जिनके प्रति पब्लिक में एक सहज आदरभाव होता है.
मंदिर का कामकाज एडहॉकिज्म से चला
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के CEO की तलाश आसान नहीं थी. एक तो अयोध्या में राम मंदिर की स्थापना पूरे प्रदेश और देश की प्रतिष्ठा का प्रश्न था. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अदालती लड़ाई की जीत के बाद मंदिर का निर्माण शुरू हुआ और राम लला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी यह मंदिर आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के नेता चंपत राय बंसल की देखरेख में चलता रहा. कभी भी विधिवत यहां के ख़ज़ाने और तीर्थ क्षेत्र की व्यवस्था के बाबत कोई ठोस पहल नहीं हुई.
मंदिर की सारी व्यवस्था अफरातफरी में चली. एक तरह की एडहॉकिज्म जैसा माहौल था. तीर्थ क्षेत्र के विकास के नाम पर जिस तरह की तोड़फोड़ और अयोध्या शहर के विध्वंस का दौर चला, वह बहुत ही दुखद था. अयोध्या के एक संत आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने खुले मंच से इस अव्यवस्था का विरोध किया परंतु चंपत राय ने कभी भी अयोध्या वासियों की बात नहीं सुनी.
चंपत राय ने चौकसी नहीं बरती
आखिरकार अभी जून 2026 में तब हंगामा मच गया जब उस महीने की 4 तारीख़ को तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के एक कर्मचारी के घर से भारी मात्रा में नकदी मिली. इसके बाद तो रोज नयेनये घपले सामने आने लगे. सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने चंदा चोरी पर खूब हंगामा किया. इससे सरकार डिफेंसिव पोजिशन में आ गई. चंपत राय बंसल ने 27 जून को ट्रस्ट के महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया. साथ ही कुछ अन्य पदाधिकारियों को भी. चंपत राय सीधे आरएसएस से जुड़े हुए थे. इसलिए वे एक तरह से निश्चिंत थे.
लेकिन राम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट जैसे देश के सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिर को एक बेहद चुस्त और संजीदा महासचिव की जरूरत थी. चंपत राय के बारे में बाद में जांच कमेटी ने बताया कि वे बेदाग हैं. परंतु चंपत राय ईमानदार थे या नहीं, इस बात से अधिक महत्त्वपूर्ण बात है कि उन्होंने ट्रस्ट के कामकाज के प्रति सजगता क्यों नहीं बरती?
पीएमओ की भूमिका
कहा जा रहा है कि श्रीराम मंदिर तीर्थ स्थान ट्रस्ट में नई नियुक्तियां पीएमओ की अनुशंसा पर हुई हैं. यह बात सच हो सकती है किंतु इसमें कोई शक नहीं कि 62 वर्षीय रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा के कंधे पर कर्त्तव्यनिष्ठा तथा कार्य कुशलता के जो तमगे लटके हैं, वे उनकी छवि के प्रति एक सम्मान का भाव पैदा करते हैं.
उनके साथ ही इस ट्रस्ट में स्वामी गोविंद देव गिरि को ट्रस्ट का महासचिव नियुक्त किया गया है. वे चंपत राय के समय ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष थे. अब कोषाध्यक्ष पद पर महेश चंद्र भागचंदका की नियुक्ति हुई है. इनके अलावा दो न्यासी भी हैं. मदन मोहन पांडेय, जो अयोध्या के ही हैं और डॉ निर्मला यादव. इस तरह ट्रस्ट में एक महिला की भी नियुक्ति हुई. वे शिकोहाबाद की हैं तथा संस्कृत की विद्वान हैं. एक कॉलेज के प्राचार्य पद से रिटायर हुई हैं. संभावना है कि एक सहायक सीईओ को भी नियुक्त किया जाए.
मंदिर के कामकाज को पारदर्शी बनाना
जितेंद्र मिश्रा ने गुरुवार को अयोध्या पहुंचने पर कहा, कि वे ट्रस्ट से जुड़े हर काम के प्रति पारदर्शिता बरतेंगे. चंदे का सही ढंग से रखरखाव होगा तथा निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे. हर कर्मचारी के काम को देखा जाएगा. तीन सदस्यीय चयन समिति ने 16 नामों में से जितेंद्र मिश्रा के नाम पर मुहर लगाई. एक सैन्य अधिकारी को इस तरह की जिम्मेदारी पहली बार मिली है. अयोध्या के अलावा तिरुपति, जगन्नाथ पुरी और बद्रीकेदार मंदिर समिति में भी सीईओ जैसी पोस्ट है. लेकिन अयोध्या के राम जन्मभूमि ट्रस्ट के सीईओ के लिए कड़ी प्रतियोगिता हुई. और तब सर्व सम्मति से एक का चयन हुई. अभी तक कई पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के CEO बन जाने की अटकलें चल रही थीं. उनमें से STF के एक अधिकारी का नाम फाइनल समझा जा रहा था. पर चयन समिति ने पूरी गोपनीयता से काम किया.
राम मंदिर का कोप
यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि राम मंदिर ट्रस्ट के चंदे में जो घपला हुआ, उससे पूरे देश में भारी रोष था. इतना अधिक रोष तो कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने अनशन, धरनाप्रदर्शन से नहीं उत्पन्न कर पाई. जेनजी आंदोलन की हवा जल्दी ही निकल गई. कुछ विरोधी नेता तो यह भी कह रहे थे कि राम जन्म भूमि ट्रस्ट के घोटाले के गुस्से को कम करने के लिए सरकार ने स्वयं CJP को खड़ा किया था. उत्तर प्रदेश में विधान सभा की 403 सीटें हैं और लोकसभा में 80 सीटें. सरकार को 2027 और 2029 दोनों की चिंता थी. इसलिए सीईओ के रूप में ऐसा दांव चला गया कि फ़िलहाल विरोधी सन्नाटे में हैं. अब यह तो वक़्त बताएगा कि जितेंद्र मिश्रा श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ स्थान ट्रस्ट को उसकी पवित्रता और महत्ता लौटाने में कितने सक्षम होते हैं.