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यूपी में 30 प्रतिशत हाउस वाइफ…महिलाओं को यूं ही नहीं साधने में जुटे अखिलेश यादव, ये है स्ट्रैटजी​

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव लगभग 6 महीने बाकी होंगे. लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से अपना सियासीगुणा भाग लगाना शुरू कर दिया है. जातिधर्म से इतर इस बार के चुनावों में पार्टियां अपने वोटबैंक में एक ऐसी आबादी को बड़ी संख्या में अपने साथ जोड़ना चाहती हैं, जो तकरीबन हर घर का […]

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव लगभग 6 महीने बाकी होंगे. लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से अपना सियासीगुणा भाग लगाना शुरू कर दिया है. जातिधर्म से इतर इस बार के चुनावों में पार्टियां अपने वोटबैंक में एक ऐसी आबादी को बड़ी संख्या में अपने साथ जोड़ना चाहती हैं, जो तकरीबन हर घर का अहम हिस्सा है. ये हैं महिलाएं. इनकी राजनीतिक पसंद सत्ता की दशा और दिशा दोनों बदल सकती हैं.

यूपी में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा कार्यबल से बाहर है. पीरियडिक श्रम बल सर्वेक्षण उत्तर प्रदेश में महिला श्रमबल भागीदारी दर करीब 25 फीसदी है. इसका अर्थ यह हुआ कि राज्य की 75 प्रतिशत महिलाएंऔपचारिक रोजगार में नहीं हैं. कई राजनीतिक और सामाजिक सर्वे यह बतलाती हैं कि लगभग 30 फीसदी महिलाएं राज्य में हाउसवाइफ है. यही एक वर्ग है, जिसे लेकर बीजेपी, सपा और कांग्रेस सभी पार्टियां साधना चाहती हैं.

अखिलेश यादव ने महिलाओं के लिए सालाना 40 हजार रुपये की सहायता देने वाली स्त्री सम्मानसमृद्धि योजना का वादा किया. उनके इस कदम को चुनावी मुकाबले को सीधे आर्थिक मदद की राजनीति में ले जाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. इसके अलावा वह महिलाओं के लिए नौकरी में 33 फीसदी आरक्षण, कामकाजी महिलाओं को हफ्ते में दो दिन की छुट्टी जैसी सुविधाएं देने का भी ऐलान किया है.

उत्तर प्रदेश में महिला वोटरों की क्यों बढ़ी अहमियत?

  • उत्तर प्रदेश के मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 45.46 फीसदी है.
  • यह संख्या अपने आप में इतनी बड़ी है कि कोई भी पार्टी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती.
  • पिछले चुनावों में महिला मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी ने दलों को यह समझा दिया है.
  • महिला वोट अब केवल पति के कहने पर पड़ने वाला वोट मानकर नहीं छोड़ा जा सकता.
  • यही कारण है कि 2027 की लड़ाई में महिलाओं के लिए अलग घोषणाएं, नकद सहायता और सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा सामने आ रहा है.

अखिलेश की तरफ से महिला वोटरों साधने की कवायद के पीछे की क्या है वजह?

जिस यूपी की राजनीति लंबे समय से जातीय गणित के इर्दगिर्द घूमती रही है. यादव, गैरयादव ओबीसी, दलित, सवर्ण और मुस्लिम वोटों के अलगअलग समीकरण बनाए जाते रहे हैं. अब उसी यूपी में महिलाओं को एक वोटबैंक के तौर पर देखा जा रहा है. महिला मतदाता एक ऐसा वर्ग है, जो हर जाति, धर्म और क्षेत्र में मौजूद है. ऐसे अगर कोई पार्टी बड़ी संख्या में महिलाओं का वोट पाने में करीब रहा तो एक कदम और सत्ता के करीब आ सकता है.

यही वजह है कि अखिलेश अब अपने पीडीए फॉर्मूले में आधी आबादी को भी प्रमुखता दे रहे हैं. उनका राजनीतिक संदेश यह है कि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों की महिलाओं तक पहुंचने के साथसाथ उन वर्गों की महिलाओं को भी जोड़ा जाए, जो पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी के वोटर नहीं रहे हैं. इसके लिए पार्टी बूथ स्तर पर महिला नेटवर्क बनाने और महिलाओं तक पहुंचने कोशिश करेगी.

अखिलेश क्यों बदल रहे हैं अपनी पुरानी राजनीति?

  • समाजवादी पार्टी की पारंपरिक छवि लंबे समय तक युवाओं, किसानों, पिछड़े वर्गों और मुसलमानों की पार्टी के रूप में रही है.
  • महिला वोटर को लेकर पार्टी की अलग और लगातार रणनीति उतनी स्पष्ट नहीं दिखाई देती थी.
  • दूसरी तरफ बीजेपी ने केंद्र और यूपी दोनों स्तर पर महिलाकेंद्रित योजनाओं के जरिए मजबूत राजनीतिक आधार बनाया.
  • उज्ज्वला गैस कनेक्शन, आवास योजना, शौचालय, जनधन, मुफ्त राशन और स्वयं सहायता समूहों जैसे कार्यक्रमों ने महिलाओं तक सरकार की सीधी पहुंच बनाई.
  • यूपी में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बड़ी संख्या में घर महिलाओं के नाम या प्राथमिकता के आधार पर दिए जाने का भी राजनीतिक संदेश गया.
  • यही वजह है कि अखिलेश अब महिलाओं को केवल किसी जाति या परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वतंत्र चुनावी समूह के रूप में देखने लगे हैं.

अखिलेश ने कैसे बढ़ाई BJP की टेंशन?

अखिलेश की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बीजेपी पहले से महिलाओं के बीच मजबूत पकड़ बना चुकी है या बनाने में जुटी हुई है, ऐसे में महिला सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाएं और लाभार्थी नेटवर्क बीजेपी की रणनीति के अहम हिस्से रहे हैं. हाल के दिनों में योगी सरकार की तरफ महिलाओं को आर्थिक सहायता देने की संभावित योजनाओं पर भी राजनीतिक चर्चा तेज हुई है.

इस बीच अखिलेश ने बीजेपी से पहले बड़ा दांव खेलते हुए 40 हजार रुपये सालाना सहायता का वादा कर दिया. साथ ही आर्थिक मदद के अलावा नौकरी में 33 फीसदी आरक्षण, कामकाजी महिलाओं को हफ्ते में दो दिन की छुट्टी जैसी सुविधाएं जैसे ऐलान के साथ भी महिलाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं. दरअसल यह सिर्फ एक चुनावी वादा नहीं, बल्कि राजनीतिक रेट सेटिंग की कोशिश भी है. अब बीजेपी या किसी अन्य दल की महिला सहायता योजना की तुलना एसपी के 40 हजार रुपये के वादे और अन्य घोषणाओं से होगी.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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