आज दशहरा है. देश भर में जश्न का माहौल है. कहीं मेले लगे हैं तो कहीं रावण दहन हो रहा है. लेकिन उत्तर प्रदेश में मेरठ के गगोल गांव में मातम जैसी स्थिति है. करीब डेढ़ सौ वर्षों से इस गांव में दशहरे के दिन हर साल शोक मनाया जाता है. यह सुनकर आपको हैरानी हो सकती है, लेकिन यही सच्चाई है. मेरठ शहर से महज 14 किलोमीटर दूर इस गांव के ज्यादातर घरों में आज भी दशहरा के दिन चूल्हे नहीं जलते.

गांव के लोग कोई नया काम नहीं करते, जश्न नहीं मनाते. दरअसल, इसके पीछे की कहानी 1857 की क्रांति से जुड़ी है. दशहरे के दिन ही इस गांव के रहने वाले नौ क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी. क्रांति में शामिल होने पर इन क्रांतिकारियों को पेड़ से लटका दिया गया था. उस घटना के बाद से ही गांव में दशहरे के दिन उत्सव मनाने की जगह शोक मनाने की परंपरा शुरू हो गई. दशहरा के दिन गांव के लोग शहीदों की शहादत को सलाम करते हैं.
शहादत की निशानी है पेड़
इस गांव के लोग दशहरा पर्व को अपने पूर्वजों के बलिदान से जोड़कर देखते हैं. यही नहीं, गांव में मौजूद एक पीपल के पेड़ को भी अपने पूर्वजों की शहादत की निशानी मानते हैं. गांव के लोगों के मुताबिक इसी पेड़ पर 9 क्रांतिकारियों रम्मन सिंह, राम सहाय, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, शिब्बा सिंह, कढ़ेरा सिंह, घसीटा सिंह, बैरम और दरबा सिंह को लटकाया गया था. बाद में इस पेड़ के नीचे सभी क्रातिकारियों की स्मृति में उनकी समाधि बनी.
झंडारोहण कर देते हैं श्रद्धांजलि
परंपरा के मुताबिक दशहरा के तीन इस पीपल के पेड़ के पास बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और यहां ध्वजारोहण कर पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं. इस स्थान को गगोल तीर्थ कहा जाता है. झंडारोहण के बााद यहां हवन पूजन भी किया जाता है. मान्यता है कि दशहरे के दिन जिस परिवार में बेटा पैदा होता है, केवल वही लोग त्योहार मनाते हैं. बाकी पूरे गांव में चूल्हे भी नहीं जलते.