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3 लड़कियों को मौत के घाट उतारा… कौन थी देश में मौत की सजा पाने वाली पहली महिला? साहिल-मुस्कान केस से उठा सवाल​

पति को मारकर नीले ड्रम में भरने वाली मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को मेरठ कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई है. इस मामले में एक सवाल चर्चा में है कि आजाद भारत में किसी महिला को पहली बार फांसी कब हुई थी? इसका जवाब है रतनबाई जैन. कहानी को समझने के लिए 70 साल […]

पति को मारकर नीले ड्रम में भरने वाली मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को मेरठ कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई है. इस मामले में एक सवाल चर्चा में है कि आजाद भारत में किसी महिला को पहली बार फांसी कब हुई थी? इसका जवाब है रतनबाई जैन. कहानी को समझने के लिए 70 साल पीछे जाना होगा. रतनबाई को 1955 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी.

दिल्ली की रहने वाली रतन बाई जैन एक फैमिली प्लानिंग क्लिनिक में बतौर मैनेजर काम करती थी. इसी क्लिनिक में उसकी मुलाकात उन तीन लड़कियों से हुई, जो आगे चलकर उसके हाथों मारी गईं. मौजूद दस्तावेजों में उन तीन लड़कियों के बारे में जानकारी बहुत कम मिलती है.

क्या था मामला?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रतन बाई को शक था कि तीनों लड़कियों का सम्बंध उसके पति से है. यही शक तीनों की जान लेने की वजह बना. रतन बाई ने तीनों को मारने के लिए किसी हथियार का नहीं, जहर का इस्तेमाल किया. खाने में जहर मिलाकर तीनों को मौत के घाट उतार दिया.

अदालत ने रतन बाई को हत्या का दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई. अपील और दया याचिका के सभी रास्ते खुले थे, लेकिन दोनों खारिज हो गए. आखिरकार 3 जनवरी 1955 को तिहाड़ जेल में 35 साल की रतन बाई को फांसी दे दी गई.

दिल्ली सत्र न्यायालय की ओर से रतन की मौत की सजा बरकरार रखे जाने के बाद पंजाब हाई कोर्ट ने भी उसकी मौत की सजा बरकरार रखी. इसे आजादी के बाद किसी महिला को दी गई पहली फांसी माना जाता है. आधिकारिक रिकॉर्ड में वो अब तक की एकमात्र ऐसी महिला है.

रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामलों में ही मौत की सजा

1980 के बाद अदालतें मौत की सजा सिर्फ रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामलों में देती हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में देश में 571 लोग डेथ रो पर हैं, जिनमें 21 महिलाएं हैं. अमरोहा हत्याकांड की शबनम अली जैसी कुछ महिलाएं सालों से सजा के इंतजार में हैं, पर रतन बाई के बाद किसी महिला को फांसी नहीं हुई.

क्या है रेयरेस्ट ऑफ रेयर?

ऐसे मामलों को रेयरेस्ट ऑफ रेयर माना जाता है जिसमें अदालत को यह लगता है कि वो अपना मौजूदा सजा के विकल्प जैसे आजीवन कारावास से न्याय का उद्देश्य को पूरा नहीं हो. इसलिए इसका कोई फिक्स फॉर्मूला नहीं है. कोर्ट अपराध की प्रकृति, उसके अंजाम देने का तरीका, पीड़ित पर असर और अभियुक्त की व्यक्तिगत परिस्थितियों को साथ रखकर तय करता है.सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी गंभीर अपराधों को परखने के लिए अपने कई फैसलों में व्यापक पहलुओं की चर्चा की है.

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संपादकीय टीम

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