मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों के नकदी प्रबंधन से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक ने नकद आरक्षित अनुपात यानी सीआरआर की दैनिक सीमा को बढ़ाकर 99 प्रतिशत कर दिया है। इस कदम का उद्देश्य बैंकों को अपनी नकदी का प्रबंधन करने में अधिक लचीलापन देना है, ताकि उन्हें दिन के दौरान भुगतान और अन्य बैंकिंग जरूरतों को पूरा करने में आसानी हो।

बैंकिंग व्यवस्था में नकदी का संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। बैंकों को ग्राहकों के लेनदेन, दूसरे बैंकों को भुगतान और वित्तीय बाजार से जुड़ी जरूरतों के लिए लगातार धन उपलब्ध रखना पड़ता है। ऐसे में सीआरआर से संबंधित नियमों में बदलाव का असर बैंकों की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है।
क्या होता है सीआरआर?
सीआरआर का पूरा नाम नकद आरक्षित अनुपात है। यह वह हिस्सा है, जिसे बैंकों को अपनी शुद्ध मांग और समय देनदारियों के अनुपात में रिजर्व बैंक के पास नकद के रूप में रखना होता है। इस राशि का इस्तेमाल बैंक अपने सामान्य ऋण कारोबार के लिए नहीं कर सकते।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी बैंक की शुद्ध मांग और समय देनदारियां 1,000 करोड़ रुपये हैं और सीआरआर की दर 4 प्रतिशत है, तो उसे 40 करोड़ रुपये रिजर्व बैंक के पास रखना होगा। सीआरआर की वास्तविक दर समयसमय पर आरबीआई तय करता है।
दैनिक सीमा 99 प्रतिशत होने का क्या अर्थ है?
सीआरआर की दैनिक सीमा को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बैंकों को केवल निर्धारित राशि बनाए रखना ही नहीं, बल्कि पूरे पखवाड़े के दौरान आरक्षित राशि का औसत भी निर्धारित नियमों के अनुसार पूरा करना होता है।
दैनिक सीमा बढ़ने का अर्थ यह है कि बैंक किसी दिन अपनी आवश्यक आरक्षित राशि के मुकाबले पहले से अधिक कमी रख सकते हैं, बशर्ते वे लागू औसत संबंधी शर्तों और अन्य नियमों का पालन करें। इससे बैंकों को अचानक नकदी की जरूरत पड़ने पर धन का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिल सकती है।