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फिच, मूडीज और एसएंडपी की बादशाहत को चुनौती! क्रेडिट रेटिंग की दुनिया में ‘बिग-3’ के खिलाफ बड़ा मोर्चा​

दुनिया की दिग्गज रेटिंग एजेंसियां मूडीज, फिच और एसएंडपी के लिए बड़ी चुनौती सामने आ गई है. अफ्रीकी यूनियन ने एक ऐसी एजेंसी को लॉन्च कर दिया है, जो इन दिग्गजों को कड़ी चुनौती देगी. साथ ही दावा​ किया है कि ये एजेंसी महाद्वीप की आर्थिक हकीकत को इन दिग्गजों के मुकाबले में बेहतर ढंग […]

दुनिया की दिग्गज रेटिंग एजेंसियां मूडीज, फिच और एसएंडपी के लिए बड़ी चुनौती सामने आ गई है. अफ्रीकी यूनियन ने एक ऐसी एजेंसी को लॉन्च कर दिया है, जो इन दिग्गजों को कड़ी चुनौती देगी. साथ ही दावा​ किया है कि ये एजेंसी महाद्वीप की आर्थिक हकीकत को इन दिग्गजों के मुकाबले में बेहतर ढंग से सामने रख सकेगी. अफ्रीका और भारत दोनों की दुनिया की बड़ी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से शिकायत रही है. पॉलिसी मेकर्स का मानना है कि ग्लोबल रेटिंग एजेंसियां आर्थिक बुनियादी हालात में हुए सुधारों को नहीं समझ पातीं. जिसकी वजह से उनकी रेटिंग बेहतर होना मुश्किल होता है. नई एजेंसी इसका बेहतर तरीके से आंकलन कर सकेगी. सवाल फिर काफी बड़ा है. एक विकल्प खड़ा तो आसान है, लेकिन निवेशकों को उस पर भरोसा करने के लिए मनाना ज्यादा मुश्किल है. आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं.

एक शिकायत से बनी एक संस्था

यह शुरुआत अफ्रीकी सरकारों द्वारा यूं ही नहीं हुई है. मूडीज, S&P ग्लोबल और फिच पर बिना वजह रिस्क प्रीमियम थोपने के आरोप लगते रहे हैं. अफ्रीकी सरकार कई सालों से ऐसे आरोप लगाती आ रही है. जब कोई दूसरा विकल्प नहीं मिला तो इस एजेंसी की शुरुआत की गई. अफ्रीकी अधिकारियों का तर्क है कि ये एजेंसियां ​​पारंपरिक पैमानों पर बहुत ज्यादा निर्भर करती हैं और स्थानीय स्थितियों जैसे कि अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियां, घरेलू बचत और बाहरी झटकों को झेलने की क्षमता को नजरअंदाज कर देती हैं.

AfCRA को सपोर्ट करने वाली संस्थाओं में से एक, Afreximbank के एग्जीक्यूटिव वाइसप्रेसिडेंट डेनिस डेन्या ने रॉयटर्स को बताया कि जब कर्ज देने वालों को स्थिति साफ नहीं दिखती, तो वे अनिश्चितता के लिए ज्यादा कीमत वसूलते हैं. उनका तर्क है कि अफ्रीका पश्चिमीकेंद्रित आकलन से पैदा हुई धुंध की कीमत चुका रहा है.

इसके वित्तीय नतीजे बहुत बड़े हैं. 2023 की UN डेवलपमेंट प्रोग्राम की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि रेटिंग से जुड़े नुकसान के कारण अफ्रीकी देशों को ज्यादा ब्याज भुगतान और कर्ज न मिल पाने की वजह से 74.5 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. अफ्रीकन यूनियन का कहना है कि महाद्वीप का सालाना बाहरी कर्ज भुगतान 2010 में 61 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 163 अरब डॉलर हो गया है. अन्य उभरते क्षेत्रों की BB रेटिंग की तुलना में, अफ्रीका की औसत सॉवरेन रेटिंग B से Bमाइनस के आसपास बनी हुई है.

ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि सिर्फ रेटिंग की वजह से ही अफ्रीका को कर्ज लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा. कर्ज का स्तर, विदेशी मुद्रा की कमी, राजनीतिक अस्थिरता और डिफॉल्ट का इतिहास भी मायने रखते हैं. लेकिन रेटिंग पूंजी की कीमत और उपलब्धता पर असर डालती है, जिससे आकलन की गुणवत्ता आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है.

बेहतर जानकारी AfCRA के लिए सबसे मजबूत तर्क है

इस एजेंसी का मकसद अफ्रीकी देशों को सिर्फ इसलिए बेहतर रेटिंग देना नहीं है क्योंकि मौजूदा रेटिंग्स काफी टाइट है. इसका मकसद उनके कर्ज चुकाने की क्षमता का बेहतर आकलन करना है. जानकारी की कमी का दायरा चौंकाने वाला है. फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, अफ्रीकी यूनियन का अनुमान है कि महाद्वीप के लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर के कैपिटल बेस का एकचौथाई से भी कम हिस्सा क्रेडिट रेटिंग के दायरे में आता है.

2025 के अंत में, अफ्रीका में 4,000 से भी कम रेटिंग्स थीं, जबकि यूरोपीय यूनियन में 8,23,000 और अमेरिका में 20 लाख से ज्यादा रेटिंग्स थीं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, तेईस अफ्रीकी इकोनॉमीज के पास ‘बिग थ्री’ की रेटिंग नहीं है. AfCRA उन उधार लेने वालों का आकलन करके घरेलू कर्ज बाजार को विकसित करने में मदद कर सकती है जिन्हें अभी बहुत कम कवरेज मिलता है. एजेंसी लोकल करेंसी वाले सॉवरेन और कॉर्पोरेट कर्ज पर ध्यान केंद्रित कर सकती है, जहां रेटिंग की मांग अफ्रीकी सरकारों के विदेशी मुद्रा बॉन्ड के अपेक्षाकृत छोटे बाजार की तुलना में ज्यादा हो सकती है.

AfCRA के फाउंडर्स में से एक और क्रेडिट रेटिंग पर इसके मुख्य विशेषज्ञ, मिशेक मुटिजे ने फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में कहा कि संस्थान को अफ्रीकी कैपिटल मार्केट को मजबूत करने और इंफ़्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और मैन्युफैक्चरिंग की ओर फंड लगाने में मदद करनी चाहिए. बेहतर जानकारी घरेलू पेंशन फंड, बैंकों और अन्य निवेशकों को अपने पैसे को शॉर्टटर्म सरकारी बिलों में रखने के बजाय लंबे समय के निवेश का आकलन करने में मदद कर सकती है. ज्यादा रेटिंग्स का मतलब अपनेआप सस्ता क्रेडिट नहीं होगा. उनकी अहमियत इस बात पर निर्भर करती है कि क्या निवेशक यह मानते हैं कि वे मजबूत और कमजोर उधार लेने वालों के बीच सही फर्क करती हैं.

विश्वसनीयता की परीक्षा

यहीं पर AfCRA के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. अगर इसके आकलन लगातार अफ्रीकी कर्जदारों को Moodys, S&P और Fitch की रेटिंग से बेहतर रेटिंग देते हैं, तो निवेशक यह जानना चाहेंगे कि इसने ऐसी कौन सी खूबियों को पहचाना है जिन पर पहले ध्यान नहीं दिया गया था, या फिर इसने बस ज्यादा उदार पैमाना अपनाया है.

बर्लिन में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में फाइनेंस के लेक्चरर और Scope Ratings के पूर्व सॉवरेन एनालिस्ट डेनिस शेन ने रॉयटर्स को बताया कि कोई नई एजेंसी भले ही वादों के साथ शुरू हो, लेकिन आखिरकार निवेशक उसके पिछले कामकाज का रिकॉर्ड देखते हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि इसकी विश्वसनीयता की सबसे कड़ी परीक्षा बाजार के तनाव के समय होगी, जब इसके नतीजे शायद किसी को पसंद न आएं.

नाइजीरिया के पूर्व उपराष्ट्रपति येमी ओसिनबाजो ने रॉयटर्स से कहा कि AfCRA को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स पर खरा उतरना होगा और वह सिर्फ एक राष्ट्रवादी एजेंसी बनकर नहीं रह सकती. 2022 में, Moodys ने घाना की रेटिंग B3 से घटाकर Caa1 कर दी, जिससे पता चला कि डिफॉल्ट का जोखिम काफी ज्यादा है. घाना के वित्त मंत्रालय ने एजेंसी पर संस्थागत पक्षपात का आरोप लगाया और तर्क दिया कि उसने राजकोषीय सुधारों को नजरअंदाज़ किया और ऐसे एनालिस्ट पर भरोसा किया जिसने कभी देश का दौरा नहीं किया था. लेकिन इसके कुछ ही समय बाद, घाना अपने ज़्यादातर विदेशी कर्ज को चुकाने में नाकाम रहा. घाना के डिफॉल्ट होने से Moodys के काम करने के तरीके को लेकर सारे विवाद खत्म नहीं होते, लेकिन इससे यह पता चलता है कि कोई एजेंसी प्रतिकूल आकलनों को सिर्फ पक्षपात का सबूत बताकर खारिज क्यों नहीं कर सकती.

व्यापक रिसर्च दोनों ही पक्षों के लिए पूरी तरह से भरोसा दिलाने वाली नहीं है. FT ने जर्मनी के लाइबनिज इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च के टॉर्स्टन श्मिट का हवाला दिया, जिनका अनुमान है कि पक्षपात की वजह से अफ्रीकी देशों की रेटिंग औसतन एक पायदान नीचे रहती है. यह बात अहम है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि कई देश ‘स्पेक्युलेटिवग्रेड’ में क्यों बने हुए हैं.

इसलिए AfCRA को अपने काम करने के तरीके का खुलासा करना होगा, अपनी मान्यताओं को समझाना होगा और एनालिस्ट को राजनीतिक दबाव से बचाना होगा. इसकी आजादी को फैसलों के जरिए साबित करना होगा, खासकर तब जब कोई सरकार रेटिंग घटाने पर आपत्ति जताए. FT की रिपोर्ट के मुताबिक, AU चाहता है कि हितों के टकराव को कम करने के लिए इस एजेंसी में सरकार की कोई हिस्सेदारी न हो.

‘बिग 3’ के साथ भारत का अनुभव

भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि ‘बिग 3’ उसकी आर्थिक ताकत को तो मानती हैं, लेकिन उसे बेहतर सॉवरेन रेटिंग में बदलने से हिचकिचाती हैं. 202021 के इकोनॉमि सर्वे में एक पूरा अध्याय इस बात पर केंद्रित था कि क्या भारत की रेटिंग उसके बुनियादी आर्थिक आधार को सही ढंग से दिखाती है. सर्वे का निष्कर्ष था कि ऐसा नहीं है. देश की ग्रोथ रेट, बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता और राजनीतिक स्थिरता को इस बात का सबूत माना गया कि रेटिंग का आकलन असामान्य रूप से रूढ़िवादी था.

यह बहस तब और महत्वपूर्ण हो गई जब पिछले महीने जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को अपग्रेड करके ‘A‘ कर दिया, जिससे 35 से अधिक वर्षों के बाद ‘A‘ श्रेणी की रेटिंग बहाल हुई. इससे पहले 2025 में मॉर्निंगस्टार DBRS, S&P और जापान की R&I ने भी भारत की रेटिंग अपग्रेड की थी. फिर भी, मूडीज और फिच ने रेटिंग को सबसे निचले निवेशयोग्य स्तर पर ही बनाए रखा है, जबकि S&P ने पिछले साल जो अपग्रेड किया था, वह 2007 के बाद पहली बार था.

भारत की शिकायत बेबुनियाद नहीं है. पिछले दो दशकों में अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है, विदेशी मुद्रा भंडार बाहरी झटकों से सुरक्षा प्रदान करता है और बैंकिंग सिस्टम अधिक मजबूत हुआ है. महामारी के दौरान अपने हाइएस्ट लेवल पर पहुंचने के बाद सरकार के फिस्कल डेफिसिट में भी भारी कमी आई है. वहीं दूसरी ओर एजेंसियों का अपना अलग तर्क है. फिच ने भारत के उच्च सार्वजनिक कर्ज और ब्याज के बोझ के साथसाथ प्रति व्यक्ति आय का मुद्दा उठाया है, जो हाई रेटिंग वाली इकोनॉमीज की तुलना में कम है. तेज विकास से कर्ज चुकाने की क्षमता तो बढ़ती है, लेकिन राजकोषीय बाधाएं खत्म नहीं होतीं. इसलिए, भारत का अनुभव रेटिंग की उन सीमाओं को दिखाता है जो संरचनात्मक सुधारों को कम महत्व दे सकती हैं, और साथ ही यह भी बताता है कि केवल विकास को ही साख का प्रमाण मानने में क्या समस्या है.

सॉवरेन रेटिंग के असर केवल सरकारी कर्ज तक ही सीमित नहीं होते. 2025 में S&P द्वारा भारत की रेटिंग अपग्रेड करने के बाद सात बैंकों और तीन फाइनेंस कंपनियों की रेटिंग भी अपग्रेड की गई. बेहतर सॉवरेन रेटिंग से घरेलू कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के लिए अंतरराष्ट्रीय पूंजी तक पहुंच आसान हो सकती है, हालांकि कर्ज लेने की लागत पर इसका वास्तविक असर बाजार की स्थितियों पर निर्भर करता है.

BRICS के सामने भी वैसी ही समस्या?

ब्रिक्स भी काफी समय ये क्रेडिट रेटिंग एजेंसी बनाने पर विचार काफी समय से कीा रहा है. भारत ने भी इसका सपोर्ट किया है, ताकि रेटिंग को विकासशील देशों की परिस्थितियों के हिसाब से बेहतर बनाया जा सके. फिर भी, इस प्रस्ताव पर बहुत कम प्रगति हुई है. इसकी मुख्य कठिनाई वही है जिसका सामना अभी AfCRA कर रही है. अपनी रेटिंग से असंतुष्ट देशों द्वारा स्थापित एजेंसी के लिए निवेशकों का भरोसा जीतना मुश्किल होगा, जब तक कि वह यह साबित न कर दे कि उसका आकलन उन देशों के राजनीतिक हितों से स्वतंत्र है. न तो AfCRA और न ही भविष्य में बनने वाली BRICS एजेंसी निवेशकों को अपनी रेटिंग मानने के लिए मजबूर कर सकती है. यह स्वीकार्यता पारदर्शी तरीकों, तुलनात्मक मानकों और मुश्किल फैसलों को सही साबित करने के रिकॉर्ड के ज़रिए ही हासिल की जा सकती है.

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संपादकीय टीम

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