राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में परस्पर विरोधी गुटों के टकराव और उनके बीच जूतेचप्पल और लातघूंसे चलने की खबरें अब लोगों को चौंकाती नहीं. रविवार को लखनऊ में कांग्रेस की नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्र के पद ग्रहण के समय भी ऐसे ही मंजर सामने आए. उनके और निवर्तमान अध्यक्ष अजय राय के समर्थक आपस में भिड़ गए. लेकिन शायद इसमें कुछ नया नहीं. इतिहास के पन्ने पलटिए तो पता चलता है कि इसकी शुरुआत तो आजादी के आंदोलन के दौरान हो गई थी. कांग्रेस के 1907 के सूरत अधिवेशन में मंच पर तिलक की ओर फेंका गया जूता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के गाल पर लगते हुए फिरोज शाह मेहता तक पहुंचा.

1939 की कलकत्ता की एआईसीसी बैठक में सुभाष बोस के बंगाली समर्थकों ने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का कुर्ता फाड़ दिया. कृपलानी को उनकी बंगाली पत्नी और साली ने भीड़ के गुस्से से बचाया. जवाहर लाल नेहरू को भी शर्मशर्म के नारों का सामना करना पड़ा.
1907: कांग्रेस के मंच पर उड़ा जूता
कांग्रेस का इतिहास केवल त्याग, बलिदान और राष्ट्रीय एकता की गाथा नहीं है. उसके भीतर गुटबाजी, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और आपसी कटुता के प्रसंग भी दर्ज हैं. आजादी के लिए अंग्रेजी सत्ता से लड़ने वाले नेता कई बार अपनी ही पार्टी में एकदूसरे से उलझ गए. कभी बहस ने संगठन को बांटा. कभी चुनाव ने नेतृत्व का संकट खड़ा किया. कभी विरोध की मर्यादा टूटने के मौके आए. दिसंबर 1907 का सूरत कांग्रेस अधिवेशन नरम दल और गरम दल के टकराव के लिए याद किया जाता है. कांग्रेस के भीतर ब्रिटिश विरोधी संघर्ष के तरीकों को लेकर मतभेद इतने बढ़े कि अधिवेशन अफरातफरी के बीच खत्म हुआ.
इसी दौरान मंच एक जूता उछला. इसे किसी किस्से का हिस्सा न समझें. ब्रिटिश पत्रकार हेनरी वुड नेविन्सन खुद वहां मौजूद थे. उनकी किताब The New Spirit in India के चैप्टर A Mahratta Shoe में इसका ब्यौरा दर्ज है. नेविन्सन ने लिखा कि अचानक हवा में एक मराठा जूता उछला. वह सुरेंद्रनाथ बनर्जी के गाल पर लगा और उछलकर फिरोजशाह मेहता की ओर चला गया. इसके बाद भीड़ मंच पर चढ़ आई और कुर्सियां मिसाइलों की तरह इस्तेमाल होने लगीं. जूता तिलक को निशाना लेकर फेंका गया, इस पर विवाद हो सकता है लेकिन जूता फेंके जाने और इसके बाद अधिवेशन में हिंसक अव्यवस्था पूरी तौर पर सच है.
नरमगरम दल बीच टकराव
कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में विवाद की पृष्ठभूमि में 1905 का बंगाल विभाजन और उसके विरोध में उभरा स्वदेशी आंदोलन था. इस मुकाम पर कांग्रेस में गहरे मतभेद उभरे. एक ओर गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नरम दल के नेता संवैधानिक तरीकों, प्रार्थनापत्रों और क्रमिक सुधारों के पक्षधर थे. दूसरी ओर बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे गरम दल के नेता विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी उत्पादन, स्वदेशी शिक्षा और राजनीतिक संघर्ष को तेज करना चाहते थे. 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा से संबंधित प्रस्ताव पारित हुए थे. लेकिन अगले ही वर्ष इन प्रस्तावों के स्वरूप और क्रियान्वयन पर दोनों पक्षों का टकराव बढ़ गया.
जूता, कुर्सियां और लाठियां!
1907 का अधिवेशन पहले नागपुर में प्रस्तावित था. फिर इसे सूरत में कर दिया गया. अध्यक्ष पद पर भी विवाद हुआ. गरम दल लाला लाजपत राय या तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहता था, जबकि नरम दल ने रासबिहारी घोष का समर्थन किया. लाजपत राय ने स्वयं अध्यक्ष पद की दावेदारी से पीछे हटना स्वीकार किया. लेकिन घोष की अध्यक्षता और कांग्रेस की भावी नीति को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुआ. अधिवेशन 26 दिसंबर 1907 को शुरू हुआ. अगले दिन अध्यक्ष पद और कार्यवाही को लेकर टकराव खुलकर सामने आ गया.
तिलक ने मंच पर जाकर अपनी बात रखने की कोशिश की. लेकिन उन्हें इजाजत नहीं मिली. इसके बाद नारेबाजी, धक्कामुक्की और हंगामा शुरू हो गया. बात सिर्फ जूता और कुर्सियां फेंकने तक सीमित नहीं रही. लाठियां चलने की भी खबरें आईं. 28 दिसंबर को नरम दल ने अलग बैठक कर कांग्रेस संगठन पर अपना कब्जा बनाए रखा. गरम दल के नेताओं को कांग्रेस से बाहर कर दिया गया. फायदा ब्रिटिश सरकार को मिला. उसने उग्र राष्ट्रवादी नेताओं के विरुद्ध दमन तेज किया. 1908 में तिलक को राजद्रोह के मुकदमे में छह वर्ष की सजा देकर मांडले जेल भेज दिया. फिर नौ साल लगे कांग्रेस के दोनों धड़े को एक होने में. 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में दोनों धड़े फिर एकजुट हुए.
सुभाष बोस की जीत ने विवाद बढ़ाया
1939 में सुभाषचंद्र बोस दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष बने. चुनाव में उन्होंने महात्मा गांधी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को पराजित किया. महात्मा गांधी ने सीतारमैया की हार को अपनी हार बताया. इसके बाद कांग्रेस के भीतर संघर्ष बढ़ा. बोस और गांधीजी के निकट नेताओं के बीच कार्यसमिति के गठन, नीतियों और नेतृत्व के अधिकारों को लेकर टकराव हुआ. सुभाष बोस ने गांधी जी से आग्रह किया कि वे अपनी पसंद की वर्किंग कमेटी गठित कर दें. गांधी राजी नहीं हुए. सुलह समझौते की कोशिशें नाकाम हो जाने के बाद 29 अप्रैल 1939 को ए आई सी सी की कलकत्ता बैठक में बोस ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा वापस लेने की नेहरू की अपील को उन्होंने ठुकरा दिया. वहां उपस्थित पूर्व अध्यक्षों में सबसे वरिष्ठ सरोजिनी नायडू से उन्होंने कार्यवाहक अध्यक्ष का भार ग्रहण करने का आग्रह किया.
सुभाष का इस्तीफा,समर्थक हुए हिंसक
30 अप्रैल 1939 की सरोजिनी नायडू की अध्यक्षता में सम्पन्न ए.आई.सी.सी की बैठक में सुभाष चंद्र बोस के इस्तीफे को मंजूरी दे दी गई. सवाल था उनके बचे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष के चुनाव का. डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के नाम का प्रस्ताव हुआ. लेकिन इस पर सुभाष बोस के समर्थकों की प्रतिक्रिया हिंसक थी और अफरातफरी के बीच बैठक की कार्यवाही निपट गई.
कृपलानी ने अपनी आत्मकथा My Times: An Autobiography में लिखा, “राजेंद्र बाबू और जब मैं पंडाल से बाहर निकले, तो हम बंगाली भीड़ के आक्रोश के शिकार हो गए. राजेंद्र बाबू पर हमला किया गया और उनका कुर्ता फाड़ दिया गया. भीड़ ने मुझे भी घेर लिया. अगर सुचेता और मेरी साली ने सधी हुई बंगाली भाषा में अपने आसपास खड़े लोगों को जोरदार ढंग से न रोका होता, तो मेरे साथ इससे भी बुरा हो सकता था. मैं बिना चोट खाए बच निकला. यहां तक कि जवाहरलाल भी पंडाल से बाहर निकलते समय अपने विरुद्ध लगाए गए शर्मनाक नारों से पूरी तरह नहीं बच सके.
कैमरे में कैद हुआ लखनऊ में हुआ हंगामा
Congress office in Lucknow turned into a freeforall. Supporters of Ajay Rai and Aradhana Mishra Monas side exchanged blows and hurled shoes during the charge handover.
Same party preaching unity outside is throwing footwear at each other inside. https://t.co/MEu8enYHGC
— No Filter October 11, 2026
हर दौर की वही कहानी
1907 के सूरत अधिवेशन से 1926 की लखनऊ की घटना के बीच 119 साल का लंबा वक्त बीता है. इस दौरान भारत स्वतंत्र हुआ. संविधान बना. राजनीतिक दलों के भीतर चुनाव, नेतृत्व तथा संगठनात्मक अधिकारों की व्यवस्थाएं विकसित हुईं. फिर भी एक सवाल बना हुआ है कि क्या सत्ता की चाहत, विरोध को मर्यादा पर भारी पड़ती रहेगी ?
सूरत का जूता. त्रिपुरी के बाद का संघर्ष. लखनऊ में उछले जूतेचप्पल अपनेअपने समय की अलग घटना हैं. इनके कारण और राजनीतिक संदर्भ भी एक जैसे नहीं हैं. लेकिन इनसे एक बात जरूर समझ आती है कि हर दौर की राजनीति ऐसी घटनाओं को दोहराती रही है. यहां तक कि आजादी के आंदोलन के नेता भी विवादों और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा से मुक्त नहीं थे. उनके बीच गहरे मतभेद थे. उनके समर्थकों का आक्रोश भी मर्यादा तोड़ता था. क्या वे इसे रोक सकते थे? बड़े नामों के इतिहास का यह असहज पक्ष है.