भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में इस हफ्ते गिरावट दर्ज की गई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 22 मई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 7.51 अरब डॉलर घटकर 681.38 अरब डॉलर रह गया. इससे पहले वाले सप्ताह में भी रिजर्व में 8.09 अरब डॉलर की कमी आई थी. विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की मुख्य वजह फॉरेन करेंसी एसेट्स और गोल्ड रिजर्व में आई कमी को माना जा रहा है.

RBI की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह फॉरेन करेंसी एसेट्स (FCA) में आई कमी रही. फॉरेन करेंसी एसेट्स विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होता है और इसमें डॉलर समेत कई विदेशी मुद्राओं में रखी गई परिसंपत्तियां शामिल होती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, सप्ताह के दौरान FCA में 6.48 अरब डॉलर की गिरावट आई, जिसके बाद यह घटकर 545.90 अरब डॉलर पर पहुंच गया. विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती और विदेशी मुद्रा संपत्तियों के वैल्यूएशन में बदलाव का असर भारत के रिजर्व पर पड़ा है. इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता भी विदेशी मुद्रा भंडार को प्रभावित कर रही है.
गोल्ड रिजर्व में भी आई गिरावट
देश के गोल्ड रिजर्व में भी इस दौरान बड़ी कमी दर्ज की गई. RBI के अनुसार, 22 मई को समाप्त सप्ताह में गोल्ड रिजर्व 4.53 अरब डॉलर घटकर 114.78 अरब डॉलर रह गया. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैल्यूएशन में बदलाव के कारण गोल्ड रिजर्व के मूल्य में गिरावट देखी गई. हालांकि भारत लगातार अपने गोल्ड रिजर्व को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन वैश्विक कीमतों में बदलाव का सीधा असर इसके कुल मूल्य पर पड़ता है.
SDR और IMF रिजर्व पोजिशन भी घटी
विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य प्रमुख हिस्सों में भी कमी देखने को मिली. इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के साथ रखे गए स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDRs) 77 मिलियन डॉलर घटकर 18.74 अरब डॉलर रह गए. वहीं IMF के साथ भारत की रिजर्व पोजिशन भी 33 मिलियन डॉलर घटकर 4.81 अरब डॉलर पर पहुंच गई. हालांकि SDR और IMF रिजर्व पोजिशन में गिरावट अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन कुल विदेशी मुद्रा भंडार में इसका असर दिखाई दिया.
अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अहम है विदेशी मुद्रा भंडार
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है. इसका उपयोग इम्पोर्ट बिल के भुगतान, विदेशी कर्ज चुकाने और रुपये की स्थिरता बनाए रखने में किया जाता है. पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होने से किसी भी वैश्विक आर्थिक संकट या बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान देश को मजबूती मिलती है.
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