World Students Day 2026:डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को भारत ने मिसाइल मैन और जनप्रिय राष्ट्रपति के रूप में याद किया. उनकी पहचान विज्ञान, शिक्षा और युवाओं को प्रेरित करने से जुड़ी है. लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ भी आया था, जब वे निराश हुए. उनका सपना कुछ और था. उस ओर वे बढ़े लेकिन चूक गए. वे भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट बनना चाहते थे लेकिन नहीं बन पाए. यह और बात है कि राष्ट्रपति के रूप में वे सभी सेनाओं के प्रमुख जरूर बने. आइए, डॉ कलाम की जन्म जयंती पर जानते हैं उनकी फाइटर पायलट न बन पाने की कहानी. यह भी कैसे वे उस निराशा से उबरे?

अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था. उनका बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता. परिवार आर्थिक रूप से संपन्न नहीं था, लेकिन घर में मेहनत, अनुशासन और आत्मसम्मान का महत्व था. छोटे कलाम को आकाश और उड़ते हुए विमानों में गहरी रुचि थी. उन्हें विमान देखकर यह जानने की उत्सुकता होती कि वह कैसे उड़ता है. उड़ान का आकर्षण धीरेधीरे उनके मन में एक सपना बन गया.
वे बड़े होकर वायुसेना के पायलट बनना चाहते थे. उनका सपना केवल कल्पना तक सीमित नहीं था. उन्होंने पढ़ाई की, विज्ञान को समझा और अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़े. उनकी शिक्षा ने उन्हें विमानन और तकनीक से जुड़े क्षेत्र के करीब पहुंचाया. वे अपने सपने को पूरा करने के लिए तैयार थे.
देहरादून में मिली निराशा, टूट गया सपना
पायलट बनने की इच्छा उन्हें वायुसेना के चयन तक ले गई. चयन प्रक्रिया के लिए वे देहरादून पहुंचे. वहां उम्मीदवारों की योग्यता, क्षमता और व्यक्तित्व को परखा जा रहा था. यह उनके लिए केवल एक परीक्षा नहीं थी. यह उस भविष्य का दरवाजा था, जिसकी कल्पना उन्होंने वर्षों से की थी. कलाम चयन प्रक्रिया में शामिल हुए. परिणाम आया तो उन्हें पता चला कि वे चयन सूची में नौवें स्थान पर हैं.
वायुसेना में उस समय उपलब्ध स्थान आठ थे. वे मंजिल के बहुत करीब थे, लेकिन चयनित नहीं हो पाए. यह खबर उनके लिए निराशाजनक थी. एक स्थान का अंतर उनके पुराने सपने और वास्तविकता के बीच खड़ा था. उन्होंने मेहनत की थी. उम्मीद भी की थी. फिर भी परिणाम उनके पक्ष में नहीं आया.
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 2006 में Su30 MKI में उड़ान भरी थी, वे फाइटर जेट उड़ाने वाले भारत के पहले राष्ट्राध्यक्ष थे.
असफलता से हुआ पहला सामना
किसी लक्ष्य के लिए पूरी मेहनत करने के बाद सफलता न मिले, तो मन टूट सकता है. कलाम के साथ भी ऐसा हुआ. वे निराश थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या करें. उनका सपना स्पष्ट था, लेकिन उस समय वह रास्ता बंद दिखाई दे रहा था. यह अनुभव दिखाता है कि महान व्यक्ति भी असफलता और दुख से गुजरते हैं. उनकी खासियत यह नहीं कि उन्हें कभी निराशा नहीं होती.
खासियत यह है कि वे निराशा के बाद क्या करते हैं. कलाम ने अपने जीवन के इस प्रसंग को अपनी आत्मकथा में भी याद किया. उनके लिए यह घटना एक कठिन मोड़ थी. लेकिन यही मोड़ आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ.
डॉ. कलाम.
ऋषिकेश में मिली नई रोशनी
चयन में असफल होने के बाद कलाम ऋषिकेश गए. वहां उनकी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई. उन्होंने अपने मन की निराशा उनके सामने रखी. स्वामी शिवानंद ने उन्हें समझाया कि जीवन में हर घटना को स्वीकार करना और आगे बढ़ना जरूरी है. इस मुलाकात ने कलाम को अपने हालात पर नए नजरिए से सोचने में मदद की. वे यह मानने लगे कि पायलट न बन पाना उनकी क्षमता का अंत नहीं है. संभव है कि उनके लिए कोई दूसरा काम तय हो, जिसमें वे देश के लिए योगदान दे सकें.
यह विचार उनके लिए आसान नहीं रहा होगा. अपने सबसे बड़े सपने से पीछे हटना कठिन होता है. लेकिन उन्होंने धीरेधीरे अपने मन को संभाला. उन्होंने असफलता को अपनी पहचान नहीं बनने दिया.
एक सपना छूटा, दूसरा रास्ता खुला
कलाम ने विमानन और अंतरिक्ष से जुड़े तकनीकी क्षेत्र में अपना काम जारी रखा. उन्होंने रक्षा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे वैज्ञानिक बने और भारत के मिसाइल विकास कार्यक्रम से जुड़े. इसी योगदान के कारण उन्हें मिसाइल मैन के नाम से जाना गया. उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में भी काम किया. उपग्रह प्रक्षेपण यान के विकास से जुड़ी उनकी भूमिका ने देश की वैज्ञानिक क्षमता को आगे बढ़ाने में मदद की. बाद में वे भारत के राष्ट्रपति बने.
राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं से संवाद को विशेष महत्व दिया. उनके जीवन में शिक्षा, मेहनत, अवसर और अनेक लोगों के सहयोग की भूमिका थी. लेकिन वायुसेना का चयन न हो पाना उनके जीवन की एक अहम घटना जरूर थी. इसने उन्हें अपनी राह पर नए सिरे से विचार करने का अवसर दिया.
आंध्र प्रदेश में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का स्टैच्यू.
युवाओं के लिए प्रेरक हो सकती है यह कहानी
कलाम की कहानी युवाओं को कई बातें सिखाती है. पहली बात यह कि सपना देखना जरूरी है. दूसरी बात यह कि सपना पूरा करने के लिए मेहनत और तैयारी भी उतनी ही जरूरी है. तीसरी बात यह कि हर कोशिश का परिणाम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं आता. जब असफलता मिले, तो खुद को बेकार समझना सही नहीं है. एक परीक्षा या चयन प्रक्रिया किसी व्यक्ति की पूरी क्षमता का फैसला नहीं करती. वह केवल किसी विशेष समय और परिस्थिति का परिणाम बताती है. कलाम का उदाहरण यह भी बताता है कि लक्ष्य बदलना कमजोरी नहीं है. कभीकभी परिस्थितियों के अनुसार नई दिशा चुनना समझदारी होती है. अपने मूल उद्देश्य, यानी समाज और देश के लिए कुछ अच्छा करने की भावना, को बनाए रखते हुए रास्ता बदला जा सकता है.
कलाम को याद करना क्यों है जरूरी?
15 अक्टूबर को उनकी जन्म जयंती पर हम उनके वैज्ञानिक योगदान और राष्ट्रपति के रूप में उनकी सेवा को याद करते हैं. साथ ही, उनके जीवन का यह शुरुआती संघर्ष भी हमें प्रेरित करता है. फाइटर पायलट बनने का सपना पूरा नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने अपने भीतर की जिज्ञासा और सेवा की भावना को जीवित रखा. कलाम साहब की यात्रा हमें बताती है कि असफलता के बाद भी आगे बढ़ने के रास्ते होते हैं. कभीकभी बंद हुआ दरवाजा हमें किसी नए अवसर की ओर मोड़ देता है. जरूरी है कि हम निराशा में रुकें नहीं, अपनी क्षमता पर भरोसा रखें और नए रास्ते तलाशते रहें. जिस युवक को वायुसेना में नौवां स्थान मिलने के कारण चुना नहीं गया, वही आगे चलकर देश के सबसे सम्मानित वैज्ञानिकों और राष्ट्रपतियों में गिने गए. उनकी कहानी का सार यही है. एक सपना अधूरा रह सकता है, लेकिन जीवन की संभावनाएं कभी केवल उसी सपने तक सीमित नहीं होतीं.