पाकिस्तान और चीन के रणनीतिक और रक्षा संबंधों को लेकर एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। अमेरिकी खोजी समाचार वेबसाइट ‘ड्रॉप साइट’ (Drop Site) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अपने बेहद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘ग्वादर पोर्ट’ को चीनी मिलिट्री बेस (सैन्य अड्डा) में बदलने के लिए राजी हो गया था। हालांकि, इस सौदे के बदले पाकिस्तान ने चीन के सामने तीन ऐसी बड़ी शर्तें रख दीं, जिसे मानने से बीजिंग ने साफ इनकार कर दिया और दोनों देशों के बीच चल रही यह बेहद गोपनीय बातचीत कड़वाहट के साथ खत्म हो गई। गौर करने वाली बात यह है कि चीन ने यह डील भारत के प्रति सद्भावना के कारण नहीं, बल्कि खुद को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों और बदनामी से बचाने के लिए ठुकराई।

पहले क्यों कतरा रहा था पाकिस्तान?
ग्वादर पोर्ट को लेकर पाकिस्तान का रुख हमेशा से दोहरा रहा है। एक दशक से भी अधिक समय तक चीन लगातार ग्वादर को एक नौसैनिक ठिकाने के रूप में विकसित करना चाहता था, लेकिन पाकिस्तान लगातार इस मांग को टाल रहा था। इस्लामाबाद को डर था कि अगर उसने चीन को खुले तौर पर सैन्य अड्डा दे दिया, तो उसे अमेरिका और पश्चिमी देशों की सीधी नाराजगी झेलनी पड़ेगी। इससे पाकिस्तान पर वैश्विक प्रतिबंधों और आर्थिक कूटनीतिक दबाव का खतरा बढ़ जाता। इसीलिए सालों तक पाकिस्तान इसे सिर्फ एक आर्थिक और व्यापारिक प्रोजेक्ट (CPEC) के रूप में ही दिखाता रहा।
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अचानक सैन्य अड्डा देने को कैसे मान गया इस्लामाबाद?
समय बदलने के साथ पाकिस्तान की आर्थिक और आंतरिक स्थिति बदतर होती गई। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत चल रहे प्रोजेक्ट्स पर फंडिंग धीमी हो गई। साथ ही, पाकिस्तान में चीनी नागरिकों और इंजीनियरों पर लगातार आतंकी हमले होने लगे, जिससे चीन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। साल 2024 में चीन के राजदूत ने सार्वजनिक मंच से पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा दिए। इसके अलावा, पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुका था और वह कर्ज के लिए पूरी तरह आईएमएफ (IMF) पर निर्भर हो गया। ऐसे में चीन को मनाने और अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए पाकिस्तान ने गुप्त रूप से ग्वादर बंदरगाह को स्थायी चीनी सैन्य ठिकाने में बदलने की पेशकश कर दी।
पाकिस्तान की 3 खतरनाक शर्तें, जो भारत के खिलाफ थीं:
लेकिन यह सौदा मुफ्त नहीं था। पाकिस्तान ने इसके बदले तीन ऐसी शर्तें रखीं जो सीधे तौर पर वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा थीं:
- अमेरिकी प्रतिबंधों से सुरक्षा: पहली शर्त यह थी कि अगर ग्वादर में चीनी बेस बनने के कारण अमेरिका पाकिस्तान पर कोई आर्थिक, राजनीतिक या कूटनीतिक कार्रवाई करता है, तो चीन उसकी ढाल बनेगा।
- भारत के खिलाफ सैन्य संतुलन: पाकिस्तान चाहता था कि चीन उसकी सेना और खुफिया एजेंसियों (ISI) को इस हद तक आधुनिक और मजबूत बना दे कि वह भारतीय सेना के मुकाबले हर मोर्चे पर डटा रहे।
- समुद्र से परमाणु जवाबी हमला (Second Strike Capability): यह सबसे संवेदनशील मांग थी। पाकिस्तान ने चीन से समुद्र-आधारित ‘सेकंड स्ट्राइक’ परमाणु क्षमता मांगी। यानी एक ऐसी प्रणाली (जैसे परमाणु पनडुब्बी), जिससे अगर पाकिस्तान पर कोई परमाणु हमला हो भी जाए, तो वह समुद्र के भीतर से भारत पर दोबारा जवाबी परमाणु हमला कर सके।
चीन ने क्यों कहा- ‘नो डील’?
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन पाकिस्तान की तीसरी मांग को देखकर चौंक गया। बीजिंग को अच्छी तरह समझ आ गया कि पाकिस्तान को समुद्र आधारित परमाणु हथियार देने का सीधा मतलब होगा- दक्षिण एशिया में परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Proliferation) का खुला उल्लंघन करना। इससे चीन सीधे तौर पर कटघरे में आ जाता और वैश्विक स्तर पर उस पर गंभीर प्रतिबंध लग सकते थे। चीन ने पाकिस्तान की इन मांगों को ‘अनुचित’ और बेहद खतरनाक करार देते हुए इस पूरी बातचीत को वहीं ठप कर दिया।





