दिल्ली में वायु प्रदूषण कम करने के लिए कई तरह के उपाय किए जाते रहे हैं. इस साल भी सरकार अनेक उपाय करती हुई दिखाई दे रही है. प्रदूषण फिर भी बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. ठंड और प्रदूषण बढ़ने के साथ ही उस पहले स्मॉग टावर की भी चर्चा तेज हो चली है, जिसे इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए लगाने का दावा किया गया था. इसे बड़े एयर प्यूरीफायर की तरह बनाया गया था.

उम्मीद थी कि यह आसपास की हवा से प्रदूषक कणों को छानकर हवा की गुणवत्ता बेहतर करेगा. लेकिन कुछ साल बाद इसके कामकाज, असर और रखरखाव को लेकर सवाल उठने लगे. आइए, ताजा संदर्भों में जानते हैं कि यह स्मॉग टावर कहां लगा है, कैसे काम करता है और अब उसकी क्या स्थिति है?
कहां लगाया गया देश का पहला स्मॉग टावर?
देश का पहला बड़े आकार वाला स्मॉग टावर दिल्ली के कनॉट प्लेस में लगाया गया था. यह शिवाजी स्टेडियम मेट्रो स्टेशन के पीछे स्थित है. टावर करीब 24 मीटर ऊंचा है. इसका उद्घाटन 23 अगस्त 2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया था. इस परियोजना को पायलट यानी प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया था. इसका मकसद यह जांचना था कि बड़े स्तर पर हवा को छानने वाली मशीन दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर में कितनी उपयोगी हो सकती है. शुरुआत में अधिकारियों ने कहा था कि इसके असर का अध्ययन किया जाएगा. इसके बाद ही ऐसे और टावर लगाने पर फैसला होगा.
कनॉट प्लेस में लगा स्मॉग टावर करीब 24 मीटर ऊंचा है. फोटो: X/ArvindKejriwal
किसने लगवाया और लागत कितनी थी?
कनॉट प्लेस का टावर दिल्ली सरकार की परियोजना थी. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति यानी डीपीसीसी इसकी नोडल एजेंसी थी. निर्माण और परियोजना प्रबंधन में एनबीसीसी की भूमिका थी. टाटा प्रोजेक्ट्स ने इसका निर्माण किया. इसकी लागत को लेकर खबरों में अलगअलग आंकड़े दिए गए हैं.
2021 की एक रिपोर्ट में निर्माण और दो साल के संचालन की कुल लागत लगभग 20 करोड़ रुपये बताई गई थी. बाद की रिपोर्टस में खर्च करीब 21 से 23 करोड़ रुपये तक बताया गया. अंतर की वजह यह हो सकती है कि कुछ आंकड़ों में निर्माण लागत शामिल है, जबकि कुछ में संचालन और अन्य परियोजना खर्च भी जोड़े गए हैं. इसलिए 23 करोड़ रुपये को परियोजना से जुड़ी खबरों में सामने आया खर्च समझना चाहिए.
स्मॉग टावर कैसे काम करता है?
कनॉट प्लेस का टावर हवा को ऊपर से खींचने और नीचे की तरफ साफ हवा छोड़ने वाली प्रणाली पर आधारित था. इसे डाउनड्राफ्ट तकनीक कहा जाता है. टावर के निचले हिस्से में 40 पंखे लगाए गए हैं. ये पंखे हवा के प्रवाह में मदद करते थे. टावर के अंदर करीब पांच हजार फिल्टर लगाए गए थे. हवा फिल्टरों से गुजरती थी. इनका उद्देश्य हवा में मौजूद धूल और सूक्ष्म कणों को रोकना था. इसकी डिजाइन क्षमता लगभग एक हजार घन मीटर हवा प्रति सेकंड की थी. अधिकारियों ने शुरुआती दौर में दावा किया था कि टावर का असर इसके आसपास के क्षेत्र में देखा जा सकता है. लेकिन कितनी दूरी तक और कितनी मात्रा में हवा साफ होगी, इसका भरोसेमंद जवाब केवल दावे से नहीं मिल सकता. इसके लिए लगातार माप और स्वतंत्र अध्ययन जरूरी था.
क्या टावर पूरी दिल्ली की हवा साफ कर सकता था?
ऐसे टावर पूरे शहर की हवा साफ करने के समुचित उपाय नहीं है. यह एक सीमित स्थान पर हवा को छानने के लिए बनाया गया था. दिल्ली का प्रदूषण कई स्रोतों से आता है. इनमें वाहन, निर्माण कार्य, उद्योग, सड़क की धूल, कचरा जलाना और मौसम की परिस्थितियां शामिल हैं. बाहरी हवा लगातार चलती और फैलती रहती है. इसलिए एक टावर के आसपास की हवा पर उसका असर सीमित हो सकता है. विशेषज्ञों ने भी सवाल उठाया था कि इतने बड़े शहर में कुछ टावर लगाने से कुल प्रदूषण कितना घटेगा. हवा को साफ करने वाली मशीनें प्रदूषण के स्रोतों को खत्म नहीं करतीं. वे केवल अपने आसपास से गुजरने वाली हवा के कुछ कणों को छान सकती हैं.
इसके असर की जांच कैसे होनी थी?
इस परियोजना के साथ आईआईटी दिल्ली और आईआईटी बॉम्बे को अध्ययन से जोड़ा गया था. योजना यह थी कि टावर के पास और अलगअलग दूरी पर वायु गुणवत्ता मापी जाए. पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे कणों के स्तर को देखा जाए. मौसम और हवा की दिशा का असर भी जांचा जाए. ऐसी जांच जरूरी है, क्योंकि टावर के पंखे चलते दिखना और शहर की हवा साफ होना एक ही बात नहीं है. यह जानना जरूरी है कि आसपास के प्रदूषण स्तर में वास्तविक बदलाव हुआ या नहीं. साथ ही यह भी देखना पड़ता है कि बदलाव टावर की वजह से आया या मौसम और हवा के बहाव से.
दिल्ली की हवा हुई जहरीली
#WATCH | Delhi: The Air Quality Index in the area around India Gate and Janpath is at 335, categorised as ‘Very Poor’, as per the CPCB .
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— ANI November 2, 2026
अब कैसी हालत में है कनॉट प्लेस का टावर?
टीवी18 की एक ताजी रिपोर्ट के मुताबिक कनॉट प्लेस का स्मॉग टावर बंद पड़ा है. इस टावर के बंद होने की खबरें पहले भी आई थीं. जनवरी 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारियों ने वेतन भुगतान में देरी के बाद इसे बंद किया था. उस रिपोर्ट में टावर के संचालन और रखरखाव से जुड़ी दिक्कतों का भी उल्लेख था. साल 2023 में इसके संचालन में रुकावट की खबरें भी आईं. कर्मचारियों ने वेतन में देरी और काम से जुड़ी अनिश्चितता को बंद होने की वजह बताया. रिपोर्ट में फिल्टरों और रखरखाव को लेकर भी चिंताएं सामने आईं. अक्टूबर 2024 में भी टावर के बंद होने की बात कही गई. इसलिए यह कहना सही होगा कि उसके संचालन में लंबे समय तक समस्याएं सामने आती रहीं. इसलिए इस बहुप्रचारित प्रोजेक्ट पर सवाल पहले की ही तरह आज भी खड़े हैं क्योंकि दिल्ली के प्रदूषण पर इसके असर की कोई सकारात्मक रिपोर्ट सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध नहीं है.
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परियोजना से क्या सीख मिलती है?
स्मॉग टावर की कहानी केवल एक मशीन की कहानी नहीं है. यह दिखाती है कि प्रदूषण नियंत्रण के नए प्रयोगों के साथ स्पष्ट योजना, नियमित रखरखाव और पारदर्शी नतीजे भी जरूरी हैं. किसी परियोजना को शुरू करते समय उसकी लागत और अपेक्षित लाभ की जानकारी भी जरूरी है. उसके बाद उसके प्रदर्शन का सार्वजनिक डेटा भी उपलब्ध होना चाहिए. टावर कितनी हवा छानता है, फिल्टर कितनी बार बदले जाते हैं, बिजली और रखरखाव पर कितना खर्च आता है और हवा की गुणवत्ता में कितना बदलाव आता है, इन सवालों के जवाब नियमित रूप से सामने आने चाहिए. दिल्ली के लिए दीर्घकालीन समाधान प्रदूषण के स्रोतों को घटाने से जुड़े हैं. स्वच्छ सार्वजनिक परिवहन, निर्माण की धूल पर नियंत्रण, कचरा न जलाना, उद्योगों की निगरानी और पड़ोसी क्षेत्रों के साथ समन्वय ऐसे कदम हैं जिनकी भूमिका अहम है. स्मॉग टावर इन प्रयासों का विकल्प नहीं हो सकता.