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टीआरपी ही नहीं, महिलाओं की फीलिंग्स भी जीत रहा है ‘अनुपमा’, आखिर कैसे सास-बहू ड्रामे से अलग निकला ये शो

छोटे पर्दे के टॉप सीरियल्स का जिक्र हो और उसमें टीवी शो ‘अनुपमा’ का नाम शामिल न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। राजन शाही द्वारा निर्मित और रूपाली गांगुली स्टारर इस शो को आते हुए 5 साल से ज्यादा का समय हो गया है। पांच साल बाद भी ‘अनुपमा’ टीआरपी लिस्ट के टॉप तीन में हर बार अपनी जगह बना ही लेता है। इसकी वजह सिर्फ कास्ट या कहानी ही नहीं, बल्कि यह अब लाखों महिलाओं की भावनाओं, संघर्षों और दबे हुए सपनों की आवाज बन चुका है।

टीआरपी ही नहीं, महिलाओं की फीलिंग्स भी जीत रहा है ‘अनुपमा’, आखिर कैसे सास-बहू ड्रामे से अलग निकला ये शो
टीआरपी ही नहीं, महिलाओं की फीलिंग्स भी जीत रहा है ‘अनुपमा’, आखिर कैसे सास-बहू ड्रामे से अलग निकला ये शो

जहां एक तरफ टीवी इंडस्ट्री लंबे समय तक वही घिसे-पिटे सास-बहू फॉर्मूले, भारी मेकअप, षड्यंत्र और आदर्श बहू की इमेज पर टिकी रही, वहीं ‘अनुपमा’ ने उस दुनिया में एक अलग रास्ता चुना। इस शो ने महिलाओं को त्याग की देवी नहीं, बल्कि खुद की पहचान तलाशती इंसान के रूप में पेश किया। यही वजह है कि इसकी टीआरपी सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि इमोशनल कनेक्शन का पैमाना भी बन गई है।

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एक साधारण गृहिणी की असाधारण कहानी

शो में ‘अनुपमा’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी दिखाई गई। वहीं, शो की शुरुआत किसी बड़ी हवेली, बिजनेस टायकून या ट्विस्ट के साथ नहीं हुई, बल्कि कहानी शुरू हुई एक मिडिल क्लास गुजराती परिवार से, जहां अनुपमा (रुपाली गांगुली) पूरे घर की जिम्मेदारियां निभाती है। सुबह की चाय से लेकर बच्चों की पसंद तक, हर चीज उसकी जिंदगी का हिस्सा है।

लेकिन समस्या यहां से शुरू होती है कि परिवार उसे काम करने वाली मशीन की तरह देखता है, इंसान की तरह नहीं। न उसे पति का सम्मान मिला, न ही वह बच्चों की प्राथमिकता रही और उसके खुद के सपनों के लिए कोई जगह नहीं दिखी। यही वह पॉइंट है, जहां भारतीय महिलाएं खुद को अनुपमा में देखने लगती हैं। क्योंकि भारत के लाखों घरों में आज भी महिलाएं घर को संभालते-संभालते खुद को खो देती हैं। ‘अनुपमा’ ने इस दर्द को ओवरड्रामेटिक तरीके से नहीं, बल्कि बेहद रियल अंदाज में दिखाया और यही उसकी सबसे बड़ी जीत बनी।

परफेक्ट बहू नहीं, रियल वुमन का चेहरा

टीवी पर लंबे समय तक महिला किरदार दो हिस्सों में बंटते रहे है, जिसमें या तो वह त्याग की मूर्ति होती थी, या फिर चालाक वैम्प। लेकिन ‘अनुपमा’ इन दोनों कैटेगरी से बाहर निकलती है। वह रोती है, टूटती है, गलती करती है, गुस्सा होती है, सवाल पूछती है और सबसे जरूरी- अपने लिए खड़ा होना सीखती है। यहां शो महिलाओं को यह मैसेज देता है कि अच्छी औरत बनने के लिए अपनी खुशी मारना जरूरी नहीं है। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर कई महिलाओं ने लिखा कि उन्हें पहली बार लगा कि टीवी पर कोई किरदार उनकी असली जिंदगी जैसा है। वहीं, ‘अनुपमा’ सिर्फ प्रेरणा नहीं, बल्कि उन महिलाओं की रिप्रेजेंटेशन बन गई।

तलाक को अंत नहीं, नई शुरुआत की तरह दिखाना

भारतीय टीवी में तलाक को अक्सर ट्रैजेडी की तरह दिखाया जाता था। लेकिन ‘अनुपमा’ ने इसे महिला की हार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की जीत के रूप में पेश किया। जब अनुपमा अपने पति से अलग होने का फैसला लेती है, तो वह सिर्फ रिश्ता नहीं छोड़ती- वह अपनी पुरानी पहचान तोड़ती है। यह ट्रैक भारतीय टेलीविजन के लिए बहुत बड़ा मोमेंट था, क्योंकि यहां पहली बार एक मिडिल एज महिला की जिंदगी को शादी के बाद नहीं, बल्कि शादी टूटने के बाद नई दिशा मिलती है। यहां शो ने समाज के उस डर को चुनौती दी, जो महिलाओं को हमेशा लोग क्या कहेंगे के पिंजरे में कैद रखता है।

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प्रेम कहानी से ज्यादा सेल्फ-लव की कहानी

दिलचस्प बात यह है कि शो की असली ताकत रोमांस नहीं है। हालांकि, अनुपमा और अनुज की जोड़ी को लोगों ने खूब पसंद किया, लेकिन दर्शकों का इमोशनल कनेक्शन सिर्फ प्रेम कहानी से नहीं बना। असल में लोग अनुपमा की उस यात्रा से जुड़े, जहां वह खुद से प्यार करना सीखती है। टीवी पर अक्सर महिला किरदार की खुशी किसी पुरुष से जुड़ी होती थी, लेकिन यहां खुशी का केंद्र खुद की पहचान है। यह बदलाव छोटा नहीं था। इसी वजह से मिडिल एज महिलाओं से लेकर युवा लड़कियों तक, हर उम्र की ऑडियंस इस शो से जुड़ गई।

मां की इमेज को भी बदला

भारतीय टीवी में मां को हमेशा त्याग और सहनशीलता की प्रतिमा के रूप में दिखाया गया।
लेकिन ‘अनुपमा’ ने मां को इंसान की तरह पेश किया। वह अपने बच्चों से प्यार करती है, लेकिन उनसे सवाल भी पूछती है। उनकी गलतियों पर चुप नहीं रहती। यह एक बड़ा सामाजिक बदलाव था। अनुपमा ने दिखाया कि मां की अपनी इच्छाएं, सपने और सीमाएं भी होती हैं।

महिलाओं की भावनात्मक भाषा को समझना

इस शो की सबसे बड़ी सफलता उसकी इमोशनल राइटिंग है। यह सिर्फ कहानी नहीं दिखाता, बल्कि महिलाओं की उस भावनात्मक थकान को शब्द देता है, जिसे समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। घर में सबकी पसंद याद रखना, सबके मूड संभालना, खुद बीमार होने पर भी काम करना और बदले में सिर्फ ये तो तुम्हारा फर्ज है सुनना- ‘अनुपमा’ ने इन छोटी-छोटी चीजों को बड़े इमोशनल मोमेंट्स में बदला।

तारीफ के साथ आलोचनाएं भी हुईं

हालांकि, शो को लेकर आलोचनाएं भी कम नहीं रहीं। कई लोगों का मानना है कि समय के साथ कहानी जरूरत से ज्यादा खिंच गई। कई बार वही पारंपरिक टीवी ड्रामा लौट आया, जिससे शो शुरुआत में अलग दिखता था। बार-बार होने वाले इमोशनल ब्रेकडाउन, लंबे भाषण और फैमिली कॉन्फ्लिक्ट्स को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना भी हुई। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि इन कमियों के बावजूद दर्शकों का कनेक्शन टूटा नहीं, क्योंकि लोग सिर्फ कहानी नहीं, किरदार के संघर्ष से जुड़े हुए थे।

आखिर क्यों महिलाओं की फीलिंग्स जीत गया ‘अनुपमा’?

यह शो महिलाओं को सुपरवुमन नहीं बनाता, बल्कि उन्हें इंसान की तरह ही दिखाता है। यह कहता है कि अगर एक महिला अपने लिए खड़ी होती है, तो वह स्वार्थी नहीं हो जाती। अगर वह सम्मान मांगती है, तो वह गलत नहीं है। अगर वह जिंदगी को दूसरी बार जीना चाहती है, तो उसे मौका मिलना चाहिए। टीवी की दुनिया में जहां अक्सर महिलाओं की कहानियां सिर्फ आंसुओं और त्याग तक सीमित रहती थीं, वहां ‘अनुपमा’ ने उन्हें आवाज दी। शायद इसी वजह से यह शो सिर्फ एक सीरियल नहीं, बल्कि लाखों महिलाओं का इमोशनल मिरर बन गया।

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