Shravasti Floods: श्रावस्ती जिले में उफनती राप्ती नदी ने एक बार फिर लोगों की चिंता बढ़ा दी है. सिसवारा घाट पर बने पुल का एप्रोच मार्ग नदी के तेज कटान की चपेट में आ गया. हालात इतने गंभीर हो गए थे कि अगर समय रहते बचाव कार्य शुरू नहीं किया जाता तो पुल तक पहुंचने वाला रास्ता नदी में समा सकता था. प्रशासन ने रातोंरात 500 से अधिक मजदूरों को मौके पर उतारा और कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद फिलहाल कटान को रोकने में सफलता हासिल की.

10 दिनों से हो रही थी कटान
सिसवारा घाट के पास राप्ती नदी पिछले करीब 10 दिनों से लगातार किनारों का कटान कर रही थी. धीरेधीरे नदी का पानी और तेज धार पुल के एप्रोच मार्ग की तरफ बढ़ने लगी. बीती रात अचानक कटान तेजी से बढ़ गया और नदी की धारा सड़क के बेहद करीब पहुंच गई. जैसे ही प्रशासन को इसकी जानकारी मिली, अधिकारियों में हड़कंप मच गया. आननफानन में बचाव कार्य शुरू करने का फैसला लिया गया.
रातभर चला बचाव अभियान
रात के अंधेरे में जनरेटर और सर्च लाइट की व्यवस्था की गई. इसके बाद 500 से ज्यादा मजदूरों को मौके पर लगाया गया. मजदूरों ने तेज बहाव के बीच मिट्टी और बालू से भरे जिओबैग व बोल्डर नदी किनारे डालना शुरू किया. मजदूरों ने कतार बनाकर लगातार बोरियां नदी किनारे पहुंचाईं. पूरी रात नदी के कटान को रोकने की कोशिश चलती रही. प्रशासनिक अधिकारी भी मौके पर मौजूद रहे और बचाव कार्य की निगरानी करते रहे. कई घंटों की मेहनत के बाद सुबह तक नदी के कटान से एप्रोच मार्ग को फिलहाल बचा लिया गया. हालांकि राप्ती नदी का जलस्तर और तेज धार अभी भी चिंता का कारण बनी हुई है.
37 करोड़ रुपए से बना है पुल
सिसवारा घाट पर बने इस पुल और एप्रोच मार्ग का निर्माण करीब तीन साल पहले कराया गया था. इस परियोजना पर लगभग 37 करोड़ 51 लाख रुपए खर्च किए गए थे. पुल बनने के बाद आसपास के सैकड़ों गांवों के लोगों को जिला मुख्यालय भिनगा आनेजाने में काफी सुविधा हुई थी. यह मार्ग इलाके के लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन नदी के कटान से एप्रोच मार्ग पर मंडराए खतरे ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है. लोगों का कहना है कि अगर यह रास्ता कट जाता है तो पूरे इलाके की आवाजाही प्रभावित हो जाएगी.
25 किलोमीटर की दूरी हो जाएगी 50 किलोमीटर
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह पुल जिला मुख्यालय भिनगा तक पहुंचने का सबसे सीधा और आसान रास्ता है. एप्रोच मार्ग कटने की स्थिति में लोगों को लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा. वर्तमान में जो दूरी करीब 25 किलोमीटर में पूरी हो जाती है, वह बढ़कर लगभग 50 किलोमीटर हो सकती है. इसका सबसे ज्यादा असर मरीजों, छात्रों, व्यापारियों और रोजाना आनेजाने वाले लोगों पर पड़ेगा. स्थानीय निवासियों का कहना है कि रात में जिस तेजी से नदी सड़क की तरफ बढ़ रही थी, उसे देखकर सभी लोग डर गए थे. अगर मजदूरों ने समय रहते बचाव कार्य नहीं किया होता तो सुबह तक सड़क का बड़ा हिस्सा नदी में समा सकता था.
ग्रामीणों की सांसें अटकीं
रातभर चले बचाव अभियान के दौरान आसपास के गांवों के लोग भी चिंतित नजर आए. लोगों का कहना है कि यह पुल और एप्रोच मार्ग केवल एक सड़क नहीं, बल्कि सैकड़ों गांवों की लाइफलाइन है. रास्ता कटने से लोगों को अस्पताल पहुंचने में परेशानी होगी. बच्चों की स्कूल जाने की राह भी मुश्किल हो जाएगी. बाजार और अन्य जरूरी सुविधाओं तक पहुंचने के लिए लोगों को कई किलोमीटर अतिरिक्त सफर करना पड़ेगा.
टल गया संकट, लेकिन खतरा अभी बाकी
500 से अधिक मजदूरों की रातभर की मेहनत ने फिलहाल एक बड़ा संकट टाल दिया है, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. राप्ती नदी की तेज धारा लगातार किनारों पर दबाव बना रही है. प्रशासन ने बोरियों और अन्य अस्थायी उपायों के जरिए कटान को रोकने की कोशिश की है, लेकिन स्थानीय लोगों को आशंका है कि अगर नदी का बहाव इसी तरह बना रहा तो आगे फिर संकट खड़ा हो सकता है.