क्या यूपी चुनाव और अखिलेश यादव की दोस्ती ने राहुल गांधी की ओबीसी पॉलिटिक्स पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है? क्या राहुल ओबीसी पॉलिटिक्स को किनारे रख सिर्फ दलित पॉलिटिक्स कर रहे हैं? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि यूपी में सपा से गठबंधन की बात शुरू होते ही राहुल गांधी ने ओबीसी मुद्दों की बजाय दलित मुद्दों पर जोर देना शुरू कर दिया है. इन्हीं सवालों पर पेश है खास रिपोर्ट.

दरअसल, मायावती के वोट बैंक पर नजर ने राहुल गांधी को एक तीर से दो निशाने साधने का मौका दे दिया है. राहुल इन दिनों दलित वोटरों के मुद्दे जोर शोर से उठा रहे हैं. जबकि 6 महीने पहले वो ओबीसी की बातें करते नजर आते थे. यूपी चुनाव में सपा कांग्रेस का गठबंधन लगभग फाइनल है. संसद भवन में राहुल गांधी के कमरे में अखिलेश और राहुल गांधी के बीच पहले दौर की वार्ता हो भी चुकी है.
अखिलेश भी खुश और कांग्रेस का भी भला
अब सवाल अपने अपने वोट बैंक के कील कांटे दुरुस्त करने का है. लिहाजा राहुल गांधी ने अखिलेश के ओबीसी वोट बैंक को किनारे कर पूरा फोकस दलित वोटरों पर कर लिया है. राहुल गांधी अगर ओबीसी जो परंपरागत रूप से सपा का बेस वोट बैंक है पर फोकस करते तो अखिलेश यादव को मुश्किल होती. लिहाजा गठबंधन धर्म की मांग के मुताबिक राहुल गांधी मायावती के वोट बैंक पर नजर बनाए हुए हैं और उनके पास यही मौका है जब वो अपनी पार्टी के पुराने वोट बैंक की घर वापसी करवा सकें. यानी अखिलेश भी खुश और कांग्रेस का भी भला.
यूपी में 21 फीसदी दलित वोटर
राहुल गांधी ने मायावती के वोटरों को तोड़ने के लिए राजेंद्र पाल गौतम जो खुद पूर्व विधायक और एक दलित नेता है को यूपी का प्रभारी बना दिया है. मायावती का वोट बैंक चुनाव दर चुनाव छिटक रहा है. 2017 विधानसभा चुनाव में मायवती को 22.23 फीसदी वोट मिले थे और 19 सीटें जबकि 2022 में 12.88 फीसदी वोट मिले और सिर्फ एक MLA बना था.
मायावती के वोटरों ने संविधान बचाओ के नाम पर 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सपा गठबंधन को अच्छी खासी संख्या में वोट दिया था. राहुल 2024 को ही 2027 में दोहराना चाहते हैं.
राहुल गांधी की पहल पर कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी ने देश में दलित मुस्लिम सम्मेलन की शुरूआत कर दी है. यही नहीं राहुल गांधी ने राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का इंचार्ज बनाकर साफ कर दिया है कि उनकी नजर मायावती के दलित वोट बैंक पर है और इस बार कांग्रेस अपने पुराने खोए जनाधार को वापस पाने की पुरजोर कोशिश करेगी.