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World Mental Health Day: स्क्रीन के पीछे खोता बचपन…ई-गेमिंग की लत कैसे खराब कर रही बच्चों की मानसिक सेहत?​

मोबाईल की लत तो बच्चों से लेकर बड़ों तक में आज के समय में देखने को मिलती ही है. अब डिजिटल प्लेटफार्म पर बहुत सारे गेम आने लगे हैं जिनमें टास्क पूरे करने होते हैं. बच्चे इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं. कई ऐसे मामले भी देखने में आते हैं जब ईगेमिंग की लत की […]

मोबाईल की लत तो बच्चों से लेकर बड़ों तक में आज के समय में देखने को मिलती ही है. अब डिजिटल प्लेटफार्म पर बहुत सारे गेम आने लगे हैं जिनमें टास्क पूरे करने होते हैं. बच्चे इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं. कई ऐसे मामले भी देखने में आते हैं जब ईगेमिंग की लत की वजह से बच्चा बहुत ही असामान्य व्यवहार करने लगता है. इससे पेरेंट्स काफी ज्यादा परेशान हो जाते हैं और ऐसे में ट्रीटमेंट ही उनके पास एक तरीका बचता है. ऑनलाइन गेमिंग की लत किस तरह से आपके बच्चे के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है और मातापिता कैसे इससे निपट सकते हैं. इस बारे में जानेंगे एक्सपर्ट से.

ईगेमिंग या ऑनलाइन गेम…आज के टाइम में टीनएज से लेकर युवाओं और कम उम्र के बच्चों को भी घंटों इसमें लगे देखा जाता है. इससे खराब पोस्चर, मसल्स में दर्द जैसी समस्याएं तो होती ही हैं. इसके अलावा बच्चों में टास्क कंप्लीट करने का प्रेशर से लेकर वर्चुअल वर्ल्ड में ही खोए रहना जैसी कई दिक्कतें होने लगती हैं. चलिए डिटेल में जान लेते हैं.

असल दुनिया से दूर होते बच्चे

साइकियाट्री यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. सारस प्रसाद कहते हैं कि आजकल बच्चों में ऑनलाइन गेम खेलने का शौक आम है, लेकिन परेशानी तब शुरू होती है. जब ये असल जिंदगी पर भारी पड़ने लगे. कई बार ऐसा होता है, गेम उनकी जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा बन जाता है कि वो पढ़ाई, नींद, परिवार और यहां तक कि दोस्तों से भी दूरी बढ़ाने लगते हैं और घंटों बस स्क्रीन पर ही बिताते रहते हैं.

व्यवहार में आ सकता है बदलाव

एक्सपर्ट कहते हैं कि ऑनलाइन ज्यादा गेम खेलने से बच्चों के व्यवहार में बदलाव आ सकता है. जैसे वे चिड़चिड़े रहने लगतें, ज्यादा गुस्सा करने लगना या फिर वो अकेले रहना पसंद करने लगते हैं. इसे लेकर डॉक्टर सारस प्रसाद ने अपने पास आया एक मामला भी बताया है.

उन्होंने कहा, “हमारे पास 13 साल का एक बच्चा आया, जो रोजाना 1012 घंटे गेम खेलता था. धीरेधीरे उसने लोगों से मिलनाजुलना बंद कर दिया और उसे यह शक होने लगा कि दूसरे लोग उसे नुकसान पहुंचाना चाहते हैं. उसकी हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कर इलाज देना पड़ा. दवाओं, गेमिंग से दूरी और काउंसलिंग के जरिए उसकी मदद की गई.”

Getty Images

डॉक्टर कहते हैं कि यह मामला हमें समझाता है कि गेमिंग की लत को सिर्फ बच्चों की आदत समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसका असर उनकी सोच, व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है.

पेरेंट्स कैसे करें बच्चे को हैंडल?

डॉक्टर सारस प्रसाद का कहना है कि मातापिता को चाहिए कि वो बच्चों को केवल गेम खेलने से रोकने की कोशिश न करें. इससे वो आक्रामक हो सकते हैं. इसकी बजाय उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए कि वे गेम में इतना समय क्यों बिता रहे हैं. इसके बाद बच्चों से डांटकर नहीं बल्कि प्यार से बात करें. उनका रूटीन क्या है इस पर भी खास ध्यान दें. ऑनलाइन गेम की जगह उन्हें खेलकूद व दूसरी फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करें. इससे उनका मन बाकी चीजों में लगेगा तो वो स्क्रीन की तरफ कम आकर्षित होंगे.

डॉक्टर से कब करें बात?

एक्सपर्ट कहते हैं कि पेरेंट्स को सही समय पर बच्चे को समझाना जरूरी है, लेकिन अगर बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव दिखने लगे, जैसे क्या वो लोगों से कटने लगा है, अकेले रहना पसंद करता है, छोटीछोटी बातों पर आक्रामक हो जाता है? ऐसे में विशेषज्ञ की मदद लेने में देर न करें, क्योंकि सही समय पर मिला साथ और इलाज बच्चे को फिर से सामान्य और खुशहाल जिंदगी की तरफ लौटने में मदद कर सकता है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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