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Women in Politics: किस्सा ‘मर्दाना सरकार’ और ‘महारानी’ का, फिल्मी पर्दे पर कब और कैसी दिखीं वूमेन पॉलिटिशियन?

आगे बढ़ें और उन महिला किरदारों की चर्चा करें, जिन्होंने फिल्मी पर्दे पर राजनीतिक पारी खेली लेकिन उससे पहले चर्चित वेब सीरीज महारानी के दो डायलॉग याद कीजिए. ये डायलॉग शुरुआती भाग के हैं. रानी भारती बनीं हुमा कुरैशी एक जगह कहती हैं- “यहां इतने मर्द लोग काहे हैं, हमको ऐसी मर्दाना सरकार का मुख्यमंत्री क्यों बना दिए?” मर्दाना सरकार जी हां, शब्दों पर गौर कीजिए. राजनीति में आने के बाद रानी भारती को ऐसा मजबूरी में कहना पड़़ता है. दरअसल रानी भारती को सियासत के स्कूल में दाखिला कराया जाता है, सत्ता की कुर्सी पर बिठाया जाता है, और तब उसे अपने आस-पास पुरुषों की भीड़ देखकर बहुत ही अटपटा लगता है.

Women in Politics: किस्सा ‘मर्दाना सरकार’ और ‘महारानी’ का, फिल्मी पर्दे पर कब और कैसी दिखीं वूमेन पॉलिटिशियन?
Women in Politics: किस्सा ‘मर्दाना सरकार’ और ‘महारानी’ का, फिल्मी पर्दे पर कब और कैसी दिखीं वूमेन पॉलिटिशियन?

रानी भारती को महसूस होता है कि वह केवल इस्तेमाल हो रही हैं, उसे केवल चेहरा और मोहरा बनाकर सामने रखा जा रहा है, सारे महत्वपूर्ण फैसले उसके ईर्द-गिर्द मौजूद पुरुष ले रहे हैं. लेकिन एक समय के बाद वह उस परिस्थिति का शिकार हो चुकी होती हैं जहां एक तरफ राजनीति के दांव पेच हैं, और दूसरी तरफ परिवार में बच्चों की जरूरत. वह राजनीति में आकर भी के तौर पर खुद बहुत परफेक्ट नहीं पातीं. क्या रानी भारती का यह किरदार ज्यादातर महिला राजनीतिज्ञ का प्रतिनिधित्व करती हैं? अगर हां, तो आखिर क्यों? इस सवाल के आलोक में मंथन किया जाना चाहिए.

राजनीति में रानी भारती खुद को साबित करती हैं

एक समय तो यही रानी भारती बहुत परेशान होकर यह भी कहती हैं- “हमसे पचास लीटर दूध दुहवा लो, पांच सौ गोइंठा बनवा लो- लेकिन एक दिन में इतनी फाइलों पर अंगूठा लगाना हमसे संभव नहीं”. हालांकि सीजन-दर-सीजन महारानी की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, यही रानी भारती बड़े-बडे़ सियासतदां के आगे बड़ी चुनौती बन जाती हैं और दिल्ली की सत्ता को ललकारने लगती हैं. भले ही उसे तमाम दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है लेकिन वह साबित करने में कामयाब होती हैं कि राजनीति में महिलाएं अपने बुद्धि कौशल से शिखर को हासिल कर सकती हैं.

वास्तव में यह विचार कोरी कल्पना नहीं. इंदिरा गांधी, जयललिता, शीला दीक्षित, मायावती और सुषमा स्वराज जैसी दिग्गज महिला राजनीतिज्ञों ने अपने इरादों के मुताबिक मंजिल हासिल की हैं और तमाम महिलाओं की प्रेरणा का स्रोत बनी हैं. गौरतलब है कि समाज में महिलाओं को लेकर पुरुषों में जो नजरिया रहा है, सिनेमा के पर्दे पर भी उसे कमोबेश वैसा ही दिखाने का प्रयास किया गया है. और अगर महिलाएं राजनीति या समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हों तो उसे बाहर और भीतर कितने संघर्ष का सामना करना पड़ा है, उसे प्रेमचंद या फणीश्वरनाथ रेणु जैसे लेखकों के कथा साहित्य से लेकर फिल्मी पर्दे की कहानियों तक में बखूबी देखा जा सकता है.

पुरुषों का वर्चस्व तोड़ती आंधी की आरती

हालांकि इसी के बरअक्स एक सचाई यह भी है कि राजनीति के मंच पर संबोधन करने वाली महिलाओं की ताकत के पीछे कोई और नहीं बल्कि पुरुष वर्ग का सहयोग ही देखने में आया है. फिल्मी पर्दे पर वूमेन पॉलिटिशियन्स के चर्चित किरदारों की जब भी बात की जाती है- जिन कुछ फिल्मों की सबसे ऊपर चर्चा होती है, उनमें हैं- गुलजार की आंधी. इस फिल्म की कहानी प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर के नॉवेल काली आंधी पर आधारित थी. आंधी में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन ने मुख्य किरदार निभाये थे. सुचित्रा सेन के किरदार का नाम आरती था. वह राजनीतिक महत्वाकांक्षा से युक्त आधुनिक महिला है. लेकिन राजनीति में जैसे ही सीढ़ियां तय करने लगती हैं, उसके ईर्द-गिर्द मौजूद पुरुषों का वर्चस्व उसे सत्ता से दूर रखने की रणनीतियां तैयार करने लगता है, जिसके बाद उसके भीतर पति और परिवार के लिए प्रेम उमड़ने लगता है- वह मुख्यधारा की राजनीति से अलग हो जाती है.

प्रतिघात में बदला लेने वाली नेता

वह सन् 1975 का आपातकालीन दौर था. तब के हालात के मुताबिक वह किरदार अंतर्मुखी बन जाती है लेकिन बाद के सालों में पर्दे पर दिखाए गए महिला राजनीतिज्ञ के किरदार इस मिजाज के नहीं रहे. बिल्कुल उलट हो गए. लंबे समय के बाद 1987 में डायरेक्टर एन. चंद्रा निर्देशित प्रतिघात में सुजाता मेहता और 1999 में विनय शुक्ला निर्देशित गॉडमदर में शबाना आजमी ने ऐसा किरदार निभाया, जिसने दर्शकों को दहला दिया. वे किरदार आज भी मिसाल हैं. अस्सी के दशक की फिल्मों में जुल्म का बदला लेने वाले नायकों की कहानियों का चलन तेजी से बढ़ा था, उससे प्रेरित बदला लेने वाली नायिकाओं को भी फिल्मों का मुख्य विषय बनाया गया. वैसे गॉडमदर की कहानी गुजरात के पोरबंदर की कुख्यात लेडी डॉन संतोषबेन जडेजा की जिंदगी पर आधारित थी.

रिवॉल्वर रानी और गुलाब गैंग

आगे चलकर रील और रियल का मिक्स टेक्सचर खूब दिखे. प्रकाश झा की फिल्मों की पृष्ठभूमि सामाजिक और राजनीतिक तौर गुंथी रहती है. उन्होंने अपनी फिल्मों में महिला, अपराध और सियासत को बखूबी दिखाया है. इसी कड़ी की एक फिल्म थी- राजनीति. साल 2010 में आई इस फिल्म में कैटरीना कैफ ने मुख्य भूमिका निभाई थी. वह परिस्थितिवश राजनीति में आने को मजबूर होती हैं और बाद में सशक्त भी बनती हैं. इनके अलावा कंगना रनौत की चर्चा लाजिमी हैं, जिन्होंने थलैवी, इमरजेंसी से पहले साल 2014 में ही रिवॉल्वर रानी में बहुत ही आक्रामक महिला राजनेता का रोल निभाया था. तो 2014 में ही गुलाब गैंग में माधुरी दीक्षित, 2021 की मैडम चीफ मिनिस्टर में ऋचा चड्ढा और गंगूबाई काठियाबाड़ी में आलिया भट्ट पब्लिक में दबे कुचले समाज और पीड़ित महिलाओं की आवाज बनती हैं.

इन फिल्मों में सभी महिला किरदारों ने जब जब मौका मिला खुद को साबित करने का पूरा दमखम दिखाया. आज मुख्यधारा की राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. यह प्रशंसनीय है और वंदनीय भी. बशर्त कि उसे पुरुषों की बराबरी करने का ईमानदार मौका मिले.

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