Toaster Movie Review In Hindi: जब भी पर्दे पर राजकुमार राव का नाम आता है, तब दर्शकों को उम्मीद होती है कि कुछ ‘अलग’ और ‘हटके’ देखने को मिलेगा. उनके साथ अगर सान्या मल्होत्रा जैसी टैलेंटेड अदाकारा हो, फिर तो सोने पर सुहागा. नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘टोस्टर’ कुछ ऐसी ही उम्मीदें लेकर आई थी. लेकिन क्या ये फिल्म वाकई आपके वीकेंड को मजेदार बनाने वाली है या फिर ये भी ओटीटी पर हर हफ्ते रिलीज होने वाले कंटेंट का हिस्सा बन गई है, जिन्हें 2 मिनट के नूडल की तरह हजम करना मुश्किल होता है. आइए जानते हैं इस रिव्यू में.

ये कहानी है रमाकांत (राजकुमार राव) की, जो कंजूसी के मामले में पीएचडी कर चुके हैं. वो ऐसे शख्स हैं जिन्हें अगर टेलीफोन कंपनी 6 रुपये वापस कर दे, तो उन्हें लगता है कि उनकी लॉटरी लग गई है. उनकी पत्नी शिल्पा (सान्या मल्होत्रा) क्राइम शो देखने की शौकीन हैं और अपनी इस बोरियत भरी जिंदगी से परेशान हैं.
कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब एक शादी में तोहफे के तौर पर दिया गया ‘टोस्टर’ वापस रमाकांत के पास आ जाता है क्योंकि शादी टूट गई है. अब रमाकांत उस महंगे टोस्टर को दुकान पर वापस कर पैसे ऐंठना चाहता है. लेकिन भैया, ये सीधा-सादा टोस्टर नहीं है. इस टोस्टर के अंदर छिपे हैं एक बड़े राजनेता (जितेंद्र जोशी) के कुछ ऐसे राज, जो वीडियो क्लिप में कैद हैं. बस यहीं से शुरू होता है वो खेल, जिसमें रमाकांत और शिल्पा बुरी तरह फंस जाते हैं. आगे की कहानी जानने के लिए आपको थिएटर की तरफ रुख करना होगा.
कैसी है फिल्म?
फिल्म की शुरुआत काफी प्रॉमिसिंग है. राजकुमार राव का वो ‘मिडिल क्लास’ वाला अंदाज और उनकी छोटी-छोटी चीजों में बचत करने वाली हरकतें आपको हंसाती हैं. लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, ‘टोस्टर’ की गर्माहट कम होने लगती है. फिल्म का कॉन्सेप्ट ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ जैसा है, लेकिन अफसोस कि इसमें ‘गलतियां’ ज्यादा हैं और ‘कॉमेडी’ कम.
फिल्म एक डार्क कॉमेडी बनने की कोशिश करती है, लेकिन इसकी राइटिंग इतनी ढीली है कि कई जगह आपको लगता है कि मेकर्स खुद कन्फ्यूज हैं कि वो बनाना क्या चाहते थे. इंटरवल के आसपास फिल्म का मिड-पॉइंट एक ऐसा मोड़ लेता है, जहां से इसे संभलना चाहिए था, लेकिन ये कहानी और ज्यादा उलझती चली जाती है.
डायरेक्शन और राइटिंग
विवेक दासचौधरी का निर्देशन कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाया. एक डार्क कॉमेडी के लिए जो ‘पंची डायलॉग्स’ और ‘शार्प एडिटिंग’ चाहिए होती है, उसकी यहां भारी कमी है. फिल्म का विजुअल स्टाइल बहुत ही ‘नेटफ्लिक्स वाला’ है, वही नीले और पीले टिंट वाले फ्रेम, जो अब आंखों को चुभने लगे हैं. राइटिंग के मामले में फिल्म काफी फीकी है. जिस तरह के सिचुएशनल जोक्स राजकुमार राव की पिछली फिल्मों (जैसे ‘स्त्री’ या ‘लूडो’) में थे, वो यहां नदारद हैं. ऐसा लगता है कि कागज पर ये आइडिया बहुत जबरदस्त रहा होगा, लेकिन पर्दे पर आते-आते इसका ‘जला हुआ टोस्ट’ बन गया.
एक्टिंग
राजकुमार राव ने हमेशा की तरह जान लगाने की कोशिश की है. वो इस फिल्म के प्रोड्यूसर भी हैं, तो उनकी मेहनत साफ दिखती है. एक कंजूस पति के रूप में उनका लहजा और कॉमिक टाइमिंग लाजवाब है. सान्या मल्होत्रा को यहां थोड़ा कम स्पेस मिला है, लेकिन वो जितनी देर स्क्रीन पर रहती हैं, अपनी चमक छोड़ जाती हैं.
हैरानी की बात है कि फिल्म में बाजी मार ले जाती हैं अर्चना पूरन सिंह. उनका किरदार और उनकी परफॉरमेंस आपका खूब मनोरंजन करती है. अभिषेक बनर्जी अपने ‘नशेड़ी’ वाले अंदाज में ठीक-ठाक हैं, लेकिन अब वो एक ही तरह के रोल में टाइपकास्ट होते जा रहे हैं. फराह खान का कैमियो मजेदार तो है, पर कहानी में कुछ खास वैल्यू नहीं जोड़ता.
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देखें या नहीं
इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टारकास्ट है. राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा जैसे मंझे हुए कलाकारों की दमदार एक्टिंग के लिए इसे देख सकते हैं. लेकिन मेकर्स ने इसे डार्क कॉमेडी बनाने के चक्कर में कहानी में जबरदस्ती के ट्विस्ट ठूंस दिए हैं, जो फिल्म के फ्लो को बिगाड़ते हैं. 2 घंटे की लंबाई होने के बावजूद फिल्म बीच-बीच में काफी बोझिल लगने लगती है और ऐसा महसूस होता है कि इसे बेवजह खींचा गया है.
कुल मिलाकर ‘टोस्टर’ एक ऐसी फिल्म है जिसे आप तब देख सकते हैं जब आपके पास नेटफ्लिक्स पर देखने के लिए और कुछ न बचा हो. कलाकारों ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है कि वो इस ‘ढली हुई पटकथा’ को सहारा दे सकें, लेकिन कमजोर राइटिंग की वजह से फिल्म आखिर में डूब ही जाती है. अगर आप राजकुमार राव के कट्टर फैन हैं, तो एक बार इसे उनकी एक्टिंग के लिए झेल सकते हैं, वरना ये फिल्म सिर्फ एक बार देखने लायक भी मुश्किल से बनती है.





