: एससीएसटी एक्ट में FIR दर्ज होने के बाद आरोपी को अग्रिम जमानत क्यों नहीं मिलनी चाहिए ? याचिकाकर्ता के इस सवाल पर ने कहा कि ऐसे प्रावधान तय करना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में है। 22 सितंबर 2026 को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी।

अग्रिम जमानत पर रोक फिर की गई थी लागू
के 2018 संशोधन के तहत FIR से पहले प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी के लिए पूर्व मंजूरी की जरूरत खत्म की गई थी और अग्रिम जमानत पर रोक फिर लागू की गई थी।
‘यह विधायिका का फैसला था’
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने बृजभूषण सैनी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ’ मामले में 2018 के संशोधन को पहले ही सही ठहराया था। वहीं, SC/ST एक्ट में आरोपी को अग्रिम जमानत के सवाल पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह विधायिका का फैसला था। बेंच ने कहा कि 2020 के फैसले में पर्याप्त सुरक्षा उपाय बताए गए हैं।
‘इसका मतलब यह नहीं कि कानून ही खराब है’
SCST एक्ट को लेकर जस्टिस बागची ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ हुई कार्रवाई उस कानून पर दोबारा विचार करने का सही आधार नहीं हो सकतीं, जिसे 3 जजों की बेंच ने सही ठहराया है। 3 जजों ने उस कानून को मंजूरी दी है। हम 5 साल के अंदर ही उस पर दोबारा विचार क्यों करें ? वहीं, CJI ने कहा कि प्रावधानों के गलत इस्तेमाल के मामले को न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करके सुलझाया जा सकता है। उन्होंने टिप्पणी की कि इसका मतलब यह नहीं है कि कानून ही खराब है।
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SCST एक्ट को लेकर क्या थी चुनौती ?
संसद ने 2018 में SCST एक्ट में बदलाव किया और इसमें धारा 18A जोड़ी। इस धारा के तहत FIR दर्ज करने से पहले किसी शुरुआती जांच की जरूरत नहीं रखी गई। साथ ही आरोपी को गिरफ्तार करने से पहले किसी अधिकारी से अनुमति लेने की शर्त भी हटा दी गई। इस बदलाव के बाद SCST एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत पर लगी रोक भी फिर से लागू हो गई। बाद में 2020 में ‘पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को संवैधानिक माना और इसकी वैधता बरकरार रखी।