भारत के महान इंजीनियर, नीतिनिर्माता और आधुनिक भारत के शिल्पी सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम देश के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है. उनका जन्म 15 सितंबर 1861 को कर्नाटक के कोलार जिले के मुद्देनहल्ली गांव में हुआ था. उनके इसी जन्मदिवस को पूरे भारत में हर साल इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है. वे एक दूरदर्शी नेता, योग्य प्रशासक और देशभक्त इंजीनियर थे. उन्होंने भारत की आजादी से पहले ही देश को आधुनिक, औद्योगिक और तकनीकी रूप से समृद्ध बनाने का मार्ग प्रशस्त किया था.

वर्ष 1955 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा था. उन्होंने देश को विज्ञान, उद्योग, शिक्षा, सिंचाई और वित्त के क्षेत्र में ऐसी अनमोल सौगातें दीं, जो आज भी राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव बनी हुई हैं. आइए, इस इंजीनियर्स डे विस्तार से जानते हैं कि सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने देश को क्याक्या दिया?
ऑटोमेटिक फ्लडगेट और आधुनिक सिंचाई क्रांति
सर विश्वेश्वरैया ने भारत की सिंचाई व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया. उस समय बांधों में जल भंडारण और बाढ़ नियंत्रण बहुत बड़ी चुनौती हुआ करती थी. वर्ष 1903 में उन्होंने स्वचालित फ्लड गेट्स का आविष्कार किया और इसका पेटेंट कराया. यह गेट जलाशय का जल स्तर सुरक्षित सीमा से ऊपर जाते ही अपने आप खुल जाते थे और पानी सामान्य होते ही बंद हो जाते थे.
इस प्रणाली का पहला सफल प्रयोग पुणे के खड़कवासला जलाशय में किया गया. इसके बाद मध्य प्रदेश के तिघरा बांध में भी इसका उपयोग हुआ. उन्होंने पानी की बर्बादी रोकने के लिए ‘ब्लॉक सिस्टम’ लागू किया. इससे सीमित पानी का सही वितरण किसानों के खेतों तक संभव हुआ. उनकी इस तकनीक ने लाखों किसानों को सूखे और अकाल से बचाया.
कृष्णराज सागर बांध.
कृष्णराज सागर बांध और वृंदावन गार्डन
कर्नाटक में कावेरी नदी पर बना कृष्णराज सागर बांध सर विश्वेश्वरैया की सबसे अमर देन है. जब इस बांध की योजना बनी, तब यह एशिया के सबसे बड़े जलाशयों में से एक था. इस परियोजना के माध्यम से उन्होंने मांड्या और मैसूर के बंजर इलाकों में हरियाली ला दी.
किसानों की पैदावार कई गुना बढ़ गई और क्षेत्र में गन्ने की खेती को नया जीवन मिला. इसी बांध से बंगलुरु और मैसूर शहरों को पीने का साफ पानी उपलब्ध कराया गया. इसके साथ ही शिवनसमुद्र पनबिजली केंद्र को निरंतर पानी मिलना तय हुआ, जिससे उद्योगों को बिजली मिली. उन्होंने बांध के समीप विश्व प्रसिद्ध वृंदावन गार्डन का निर्माण कराया. यह उद्यान आज भी पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है.
उस्मान सागर.
हैदराबाद को बाढ़ से सुरक्षा और नगर नियोजन
वर्ष 1908 में हैदराबाद में मूसी नदी में भीषण बाढ़ आई थी. इस आपदा ने भारी तबाही मचाई और हजारों लोग बेघर हो गए. हैदराबाद के निजाम ने शहर को बचाने के लिए सर विश्वेश्वरैया से सहायता मांगी. उन्होंने शहर का विस्तृत सर्वेक्षण किया और एक स्थायी जल निकासी योजना तैयार की. उन्होंने मूसी और ईसी नदियों पर दो विशाल जलाशय—उस्मान सागर और हिमायत सागर बनवाने की योजना दी. इन जलाशयों ने न केवल बाढ़ के खतरे को पूरी तरह समाप्त किया, बल्कि हैदराबाद के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था भी की. उन्होंने शहर के लिए आधुनिक सीवेज और ड्रेनेज सिस्टम डिजाइन किया, जिससे हैदराबाद महामारी और जलभराव से मुक्त हुआ.
बंदरगाहों और रेलवे के लिए तकनीकी योगदान
सर विश्वेश्वरैया ने देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में कभी हार नहीं मानी. जब विशाखापट्टनम बंदरगाह समुद्री कटाव और गाद की समस्या से जूझ रहा था, तब उन्होंने समुद्री लहरों को नियंत्रित करने का अनूठा तरीका सुझाया. उनके डिजाइन ने बंदरगाह को जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के अनुकूल बनाया. इसके अलावा उन्होंने देश में रेलवे नेटवर्क के विस्तार और दक्षता पर काम किया. उन्होंने मैसूर राज्य में रेलवे नेटवर्क का आधुनिकीकरण किया और नई पटरियां बिछवाईं. असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर पुल निर्माण की तकनीकी जांच भी उन्होंने की थी. उनकी सलाह से भारतीय रेलवे को कई संरचनात्मक सुधार मिले.
सर विश्वेश्वरैया ने मैसूर सोप फैक्ट्री की शुरुआत की.
मैसूर के दीवान के रूप में औद्योगिक क्रांति
वर्ष 1912 से 1918 तक सर विश्वेश्वरैया मैसूर रियासत के दीवान रहे. इस दौरान उन्होंने औद्योगीकरण करो या नष्ट हो जाओ का नारा दिया. उनका मानना था कि कृषि के साथसाथ उद्योग ही देश को गरीबी से बाहर निकाल सकते हैं. उन्होंने भद्रावती में मैसूर आयरन एंड स्टील वर्क्स की स्थापना की, जिसे आज विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील प्लांट कहा जाता है. उन्होंने प्रसिद्ध मैसूर सोप फैक्ट्री की शुरुआत की, जिसने दुनिया भर में मशहूर मैसूर सैंडल सोप का निर्माण किया. इसके अलावा उन्होंने श्री जयचामराजेंद्र पॉलिटेक्निक, मैसूर पेपर मिल्स, चमड़ा कारखाना और सरकारी कताई व बुनाई मिलों की नींव रखी.
शिक्षा और कौशल विकास का विस्तार
सर विश्वेश्वरैया मानते थे कि निरक्षरता देश की प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा है. दीवान रहते हुए उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए व्यापक नीतियां बनाईं. उन्होंने वर्ष 1916 में मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई, जो भारत के सबसे प्रतिष्ठित पुराने विश्वविद्यालयों में शामिल है. उन्होंने तकनीकी शिक्षा पर विशेष बल दिया. वर्ष 1917 में उन्होंने बंगलुरु में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की, जिसे आज यूनिवर्सिटी विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के नाम से जाना जाता है. उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया, बालिकाओं की शिक्षा के लिए विशेष अनुदान दिए और पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए छात्रवृत्तियों की शुरुआत की.
आर्थिक और बैंकिंग सुधार
देश की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मजबूत वित्तीय प्रणाली आवश्यक थी. सर विश्वेश्वरैया ने उद्योगपतियों और व्यापारियों को वित्तीय सहायता देने के लिए वर्ष 1913 में बैंक ऑफ मैसूर, जो बाद में स्टेट बैंक ऑफ मैसूर के नाम से जाना गया, की स्थापना की. इस बैंक ने स्थानीय उद्योगों और कृषि को आसान ऋण मुहैया कराया. उन्होंने उद्योग और व्यापार को एक मंच पर लाने के लिए वर्ष 1916 में मैसूर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज की स्थापना की. इसके साथ ही उन्होंने भारत के लिए आर्थिक योजना की अवधारणा पेश की. वर्ष 1934 में उन्होंने प्लांड इकोनॉमी फॉर इंडिया नामक ऐतिहासिक पुस्तक लिखी. यह भारत के आर्थिक नियोजन का पहला व्यवस्थित दस्तावेज था, जिसने आजादी के बाद के योजना आयोग का खाका तैयार किया.
चारित्रिक ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा
सर विश्वेश्वरैया ने देश को केवल भौतिक संरचनाएं ही नहीं दीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की मिसाल भी दी. वे काम के प्रति अत्यधिक समर्पित और समय के पाबंद थे. उनके जीवन का प्रसिद्ध प्रसंग है कि वे सरकारी काम के लिए सरकारी मोमबत्ती और निजी काम के लिए अपने पैसों से खरीदी मोमबत्ती जलाते थे. वे 100 वर्ष से अधिक आयु तक जिए और अंतिम सांस तक देश के विकास के बारे में सोचते रहे. उन्होंने सिखाया कि ज्ञान का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सेवा के लिए होना चाहिए. उनका पूरा जीवन अनुशासन, सादगी और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक था.
राष्ट्र के लिए उनकी अमर विरासत
सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने उस दौर में भारत को आत्मनिर्भरता का सपना दिखाया, जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था. उन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा से दिखाया कि भारतीय इंजीनियर दुनिया के किसी भी विशेषज्ञ से बेहतर काम कर सकते हैं. उन्होंने देश को जल प्रबंधन, उन्नत उद्योग, तकनीकी शिक्षा, सुनियोजित नगर और आर्थिक सोच का अनमोल उपहार दिया. आज का विकसित और आधुनिक भारत उनके दिखाए रास्ते पर ही आगे बढ़ रहा है. उनकी कार्यशैली, देशभक्ति और तकनीकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के इंजीनियरों और नीतिनिर्माताओं को सदैव प्रेरित करती रहेंगी.