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Manna Dey Name Story: ‘मन्ना डे’ जितना प्यारा नाम, उतनी ही मीठी आवाज, रफी-मुकेश के बीच कैसे बनाई अलग पहचान?

गायक मन्ना डे कोलकाता से मुंबई आए और हिंदी फिल्मों की अमर आवाज़ बन गए. बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि मन्ना डे फिल्मों में गायक बनने से पहले पहलवान थे. उन्होंने नेशनल लेवल की प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी लिया था. उन्हें पतंगें उड़ाने का भी खूब शौक था. मुंबई में मोहम्मद रफी साहब से पतंगें लड़ाया करते थे. लेकिन उनके नाम की कहानी उनके नाम की तरह ही बहुत प्यारी है. इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है. वह किस्सा हम आपको आगे बताएंगे. आखिर प्रबोध चंद्र डे मन्ना डे कैसे बन गए.

Manna Dey Name Story: ‘मन्ना डे’ जितना प्यारा नाम, उतनी ही मीठी आवाज, रफी-मुकेश के बीच कैसे बनाई अलग पहचान?
Manna Dey Name Story: ‘मन्ना डे’ जितना प्यारा नाम, उतनी ही मीठी आवाज, रफी-मुकेश के बीच कैसे बनाई अलग पहचान?

बतौर की सफलता की कहानी भी बहुत चौंकाने वाली है. मन्ना ने फिल्मों में गायकी की शुरुआत सन् 1942-1943 से की थी. उनकी शुरुआती फिल्मों में शामिल हैं- तमन्ना और राम राज्य. तमन्ना में उन्होंने जागो आई उषा पंछी बोले… गाना गाया था. उस गाने में मन्ना डे के साथ तब की मशहूर गायिका सुरैया ने साथ दिया था. वहीं राम राज्य में उन्हें पहली बार एकल स्वर देने का अवसर मिला. राम राज्य के बारे में माना जाता है कि यही एकमात्र फिल्म है, जिसे महात्मा गांधी ने पहली और आखिरी बार देखा. गीत के बोल थे- गई तू गई सीता सती…

मुकेश और रफी के बीच आए

इस प्रकार मन्ना डे की शुरुआत तो हो गई लेकिन सफलता अब भी इंतजार कर रही थी. मन्ना ने जिस वक्त फिल्मों में गाना शुरू किया, उस वक्त केएल सहगल के बाद मुकेश और मो. रफी साहब का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा था. लता मंगेशकर के साथ या एकल- दोनों ही स्तरों पर मो. रफी और मुकेश की मांग तेजी से बढ़ी. जाहिर है कि उस वक्त के नए गायकों में मन्ना डे, महेंद्र कपूर या फिर किशोर कुमार के लिए सफलता हासिल करना बहुत आसान नहीं था. जबकि मो. रफी का पहला गाना सन् 1944 में गांव की गोरी फिल्म से आता है और मुकेश ने 1941 में ही निर्दोष फिल्म से पहली बार गाना प्रारंभ कर दिया था. मन्ना डे इन दोनों के बीच आते हैं.

यानी मुकेश, रफी और मन्ना डे तकरीबन समकालीन गायक थे. मन्ना को मुकेश और रफी के लाइमलाइट में आने से सफलता जरा देरी से मिली. वह सन् 1950 की फिल्म थी- मशाल. जिसमें ऊपर गगन विशाल… गाने में उनकी गायकी निखरकर सामने आई और संगीतकारों को उसकी खासियत और जरूरत के बारे में ठीक से पता चल सका.

राजकपूर की फिल्मों में एक गाना जरूर गाते

राजकपूर को फिल्म के विषय, कलाकार, कहानी और गीत-संगीत पक्ष से खास प्रेम था और अच्छा खासा ज्ञान भी था. उनके प्रिय संगीतकार थे-शंकर जयकिशन, चहेते गायक कलाकार थे- मुकेश और गीतकार- शैलेंद्र तथा हसरत जयपुरी. लेकिन मन्ना डे की गायकी भी उनको विशेष तौर पर प्रभावित करती थी. यही वजह है कि राज कपूर अपनी अधिकतम फिल्मों में तमाम गाने भले ही मुकेश और लता मंगेशकर से गवाते थे लेकिन एक गाना मन्ना डे की आवाज में जरूर रखते थे. प्यार हुआ इकरार हुआ… ये रात भीगी भीगी… लागा चुनरी में दाग… से लेकर चलत मुसाफिर मोह लिया रे… आदि तक. मनोज कुमार ने भी मन्ना डे की आवाज को फिल्म में वजन प्रदान करने के लिए बखूबी इस्तेमाल किया- मसलन उपकार में कस्मे वादे प्यार वफा सब… आदि.

मन्ना डे ने मधुशाला को भी दी है आवाज

वास्तव में मन्ना डे की आवाज ही ऐसी थी कि वह किसी फिल्म के मुख्य नायक से ज्यादा थीम सांग या टायटल सांग के लिए इस्तेमाल की गई. मन्ना डे को इसमे आनंद भी आता था. उन्होंने एक बातचीत में बताया था कि यह जानकर अच्छा लगता है कि संगीतकार या फिल्म निर्देशक उनकी आवाज या गायकी को विशिष्ठ मानते हैं और उसी गरिमा के साथ गाने का चुनाव करते हैं. लेकिन अस्सी के दशक के बाद के दौर में जब फिल्म गीत-संगीत का मिजाज बदलने लगा तब इसी वजह से मन्ना डे के पास गाने के ऑफर कम होने लगे. लेकिन इससे पहले उन्होंने फिल्मी या गैर फिल्मी जितने भी गाने गाये हैं, वे अमर हैं. इन्हीं में एक हरिवंश राय बच्चन लिखित मधुशाला भी है.

मन्ना डे नाम कैसे और कब रखा गया?

अब आपको बताते हैं मन्ना डे नाम की वो खास कहानी. जैसा कि शुरुआत में ही मैंने बताया कि मन्ना डे को गाने और स्टेज शो के साथ-साथ पहलवानी का भी खास शौक था. वह कोलकाता में अखाड़े पर पहलवानी सीखने जाते थे. बाद में पहलवानी में पारंगत होकर नेशनल लेवल की पहलवानी प्रतियोगिता में हिस्सा भी लिया था. लेकिन किस्मत ने उन्हें मुंबई के फिल्म जगत में पहुंचा दिया.

दरअसल मन्ना कोलकाता में संघर्ष कर रहे थे. तभी उन्हें अपने चाचा के पास मुंबई जाने का मौका मिला. उस दौर में मन्ना के चाचा कृष्ण चंद्र डे एक प्रसिद्ध संगीतकार के तौर पर जाने जाते थे. उन्हें केसी डे भी कहा जाता था. चाचा को मालूम था कि मन्ना को गाने का भी शौक है, उसकी आवाज में सुर है, जिसे निखारा जा सकता है. मुंबई में अपने चाचा के पास आने के बाद मन्ना डे ने बकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली. शास्त्रीय संगीत को सीखकर भी कैसे लोकप्रिय गायक हुआ जा सकता है, उस पक्ष पर उन्होंने जोर दिया. इसीलिए मन्ना डे की गायकी को देखिए तो वह अर्धशास्त्रीय श्रेणी की है. जो लोकप्रिय भी है और कलात्मक भी.

बचपन में ‘माना’ कहकर पुकारा जाता था

गौरतलब है कि मन्ना डे का मूल नाम प्रबोध चंद्र डे है. लेकिन जैसा कि आमतौर पर संयुक्त परंपरागत परिवार में बच्चों के पुकार के भी नाम रखे जाते हैं. मन्ना डे को घर वाले प्यार से ‘माना’ कहा करते थे. इसी नाम से सभी उनको पुकारा करते थे. लेकिन जब वो मुंबई आए तो उनके चाचा केसी डे ने उन्हें सुझाव दिया कि वह अपना नाम मन्ना डे रख ले. यह सुनने में प्यारा लगता है और छोटा भी है, यह किसी की भी जुबान पर चढ़ जा सकता है. इसमें पुकार का नाम भी बना रहेगा. चाचा ने मन्ना डे को कई ऐसे कलाकारों के नाम के बारे में बताया, जिनका मूल नाम कुछ और है फिल्म जगत में कुछ और. चाचा के दिए नाम से मन्ना डे अमर हो गए.

उनके गाये कुछ प्रमुख गाने हैं- तू प्यार का सागर है… जिंदगी कैसी है पहेली… झनक झनक तोरी बाजे पायलिया… आदि.

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