विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में अपना निवेश कम करना जारी रखा है, और इस महीने अब तक 27,048 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं. यह बदल रहे वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक माहौल के बीच वैश्विक निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है. NSDL के आंकड़ों के अनुसार, इसके साथ ही, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा इक्विटी बाजार से कुल निकासी 2026 में 2.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है, जो पूरे 2025 के दौरान निकाले गए 1.66 लाख करोड़ रुपए से अधिक है.

FPIs फरवरी को छोड़कर, 2026 के सभी महीनों में शुद्ध विक्रेता रहे. उन्होंने जनवरी में 35,962 करोड़ रुपये निकाले, जिसके बाद फरवरी में वे शुद्ध खरीदार बन गए, जब उन्होंने 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया—जो 17 महीनों में सबसे अधिक मासिक निवेश था. हालांकि, मार्च में यह रुझान उलट गया, जब विदेशी निवेशकों ने रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए. अप्रैल में भी बिकवाली जारी रही, जिसमें 60,847 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी हुई, और मई में भी यह सिलसिला जारी रहा, जिसमें अब तक 27,000 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी हो चुकी है.
क्यों हो रही है बिकवाली?
मॉर्निंगस्टार इंवेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल – मैनेजर रिसर्च, हिमांशु श्रीवास्तव ने कहा कि निकासी का यह ताजा रुझान वैश्विक विकास को लेकर बनी अनिश्चितता, प्रमुख क्षेत्रों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को दर्शाता है. इन कारकों ने भारत सहित उभरते बाजारों में निवेश के प्रति निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता (risk appetite) पर दबाव बनाए रखा है. उन्होंने आगे कहा कि मजबूत अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बिकवाली की इस गतिविधि के पीछे मुख्य कारण रहे हैं.
विकसित बाजारों में मिलने वाले उच्च रिटर्न ने सुरक्षित संपत्तियों (safer assets) के आकर्षण को बढ़ा दिया है, जिससे निवेशकों ने अधिक रक्षात्मक रुख अपना लिया है. श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि वैश्विक महंगाई की दिशा को लेकर चिंताएं, और प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की गति और समय को लेकर बनी अनिश्चितता, वैश्विक स्तर पर पूंजी आवंटन (capital allocation) के निर्णयों को लगातार प्रभावित कर रही है.
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रुपए में गिरावट और एआई का असर
जियोजित इंवेस्टमेंट के मुख्य निवेश रणनीतिकार, वीके विजयकुमार ने कहा कि FPIs द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली, और साथ ही चालू खाता घाटे में हो रही बढ़ोतरी ने रुपए पर दबाव डाला है. उन्होंने कहा कि साल की शुरुआत में, रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 के स्तर पर था. 15 मई को, इसने 96 का स्तर तोड़ दिया और 96.14 के स्तर को छू लिया. विजयकुमार ने कहा कि अगर FPI का बाहर जाना जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो रुपया और कमज़ोर हो सकता है.
उन्होंने यह भी बताया कि दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर फोकस करने वाली कंपनियों में लगातार हो रहे पूंजी प्रवाह के कारण भारत जैसे बाजारों से कुछ फंड दूसरी तरफ चले गए हैं, क्योंकि इन बाजारों को AI के क्षेत्र में पीछे माना जाता है. उन्होंने आगे कहा, “यह ट्रेंड तब पलट सकता है, जब AI ट्रेड-जो अभी एक बुलबुले जैसा लग रहा है-आखिरकार ठंडा पड़ जाएगा.





