FMCG Sector Growth: देश के रोजमर्रा के सामान के बाजार में इस वक्त एक अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिल रही है. जुलाई से सितंबर तिमाही के दौरान पूरे एफएमसीजी सेक्टर की बिक्री की रफ्तार धीमी पड़ गई है. ग्रामीण इलाकों में मांग घटने के साथ ही बढ़ती लागत ने छोटे व क्षेत्रीय उत्पादकों की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि इसी सुस्त बाजार में देश की बड़ी लिस्टेड कंपनियों ने बेहद मजबूत ग्रोथ दर्ज की है.

वर्ल्डपैनल बाय न्यूमरेटर के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर तिमाही में एफएमसीजी सेक्टर की कुल वॉल्यूम ग्रोथ 3.6 फीसदी रही. एक साल पहले इसी तिमाही में ये आंकड़ा 4.7 फीसदी था. इसके ठीक उलट, शेयर बाजार में लिस्टेड बड़ी कंपनियों का प्रदर्शन शानदार रहा. हिंदुस्तान यूनिलीवर ने 7 फीसदी की वॉल्यूम ग्रोथ दर्ज की. मैरिको का भारत का कारोबार 10 फीसदी बढ़ा, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने सालाना आधार पर 8 फीसदी की बढ़त हासिल की, जबकि नेस्ले इंडिया ने डबलडिजिट में ग्रोथ दर्ज की.
छोटे कारोबारियों पर लागत की मार, बड़ी कंपनियों को फायदा
बड़ी कंपनियों की ये ग्रोथ बताती है कि बाजार में खपत पूरी तरह से नहीं सुधरी है. असल में लागत बढ़ने, सप्लाई की दिक्कतों के अलावा कमजोर मांग की वजह से छोटे व क्षेत्रीय ब्रांड्स संघर्ष कर रहे हैं. इसी का फायदा उठाकर बड़ी संगठित कंपनियां बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रही हैं. पारले प्रोडक्ट्स के वाइस प्रेसिडेंट मयंक शाह के मुताबिक, ज्यादातर कैटेगरी में छोटे खिलाड़ी बड़ी कंपनियों के सामने अपनी जमीन खोते दिख रहे हैं.
ग्रामीण बाजारों में ये दबाव सबसे ज्यादा है. देश के छोटे व लोकल एफएमसीजी उद्योग का एक बड़ा हिस्सा गांवों में काम करता है, जहां अब खपत की रफ्तार धीमी पड़ गई है. बड़ी कंपनियों के पास देशभर में डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के साथ माल खरीदने की मजबूत क्षमता होती है. लेकिन क्षेत्रीय निर्माताओं के पास बढ़ती लागत को झेलने या रुकावटों का सामना करने की गुंजाइश बहुत कम होती है. मयंक शाह ने ये भी बताया कि पिछले साल जीएसटी की घोषणा के कुछ हफ्तों के भीतर ही छोटे निर्माताओं ने बदलाव की दिक्कतों के डर से करीब दो महीने का स्टॉक क्लियर कर दिया था. इससे तुलना के लिए एक ऊंचा बेस बन गया, जबकि बड़ी कंपनियों ने इस बदलाव को आसानी से संभाल लिया.
कच्चे माल की कमी से जूझते लोकल ब्रांड्स
वर्ल्डपैनल घरों में खरीदे जाने वाले ब्रांडेड के साथ अनब्रांडेड सामान को भी ट्रैक करता है. इसके ट्रैक किए गए कुल वॉल्यूम में करीब दोतिहाई हिस्सा खानेपीने की चीजों का है. इस सेगमेंट में मुख्य रूप से क्षेत्रीय ब्रांड्स, स्थानीय निर्माताओं व खुले उत्पादों का दबदबा रहता है.
मैरिको के मैनेजिंग डायरेक्टर सौगत गुप्ता ने कंपनी की अर्निंग कॉल में कहा कि महंगाई के साथ सप्लाईचेन की रुकावटें बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचा रही हैं. मुश्किल समय में अक्सर छोटे व क्षेत्रीय खिलाड़ी पिस जाते हैं, जबकि बड़ी कंपनियां बाजार को कंट्रोल करती हैं. उन्होंने बताया कि स्टॉक, पैकेजिंग मटेरियल के अलावा कमर्शियल गैस की कमी ने छोटे प्रतिद्वंद्वियों को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. वहीं मैरिको को अपनी मजबूत खरीद क्षमता व कम प्रतिस्पर्धा का सीधा फायदा मिला.
शहर से गांव तक सुस्त पड़ी खरीदारी की रफ्तार
ग्रामीण इलाकों की सुस्ती ने छोटे निर्माताओं की चुनौती को दोगुना कर दिया है. सितंबर तिमाही में ग्रामीण एफएमसीजी वॉल्यूम 3.6 फीसदी बढ़ा, जो शहरी ग्रोथ से मामूली रूप से आगे है. लेकिन ये दोनों ही आंकड़े एक साल पहले के मुकाबले काफी नीचे हैं. पिछले साल इसी तिमाही में शहरी ग्रोथ 5.2 फीसदी थी, जबकि ग्रामीण ग्रोथ 4.2 फीसदी रही थी.
वर्ल्डपैनल डिवीजन के डायरेक्टरकमर्शियल मनोज मेनन का कहना है कि मौजूदा 12 महीने की रोलिंग एफएमसीजी वॉल्यूम ग्रोथ 4.7 फीसदी है. ये पिछले साल के 4.1 फीसदी से ऊपर जरूर है, लेकिन अगली तिमाही में ये पिछले साल के स्तर से नीचे जा सकती है. उनके मुताबिक, 12 महीने के आधार पर शहरी बाजार अभी भी आगे हैं. अगली तिमाही में ये स्थिति पलट सकती है, हालांकि कम बारिश का खतरा ग्रामीण मांग पर बना हुआ है. अलगअलग कैटेगरी के आंकड़े भी सुस्ती की गवाही दे रहे हैं. पर्सनल केयर की ग्रोथ 4.4 फीसदी से घटकर 3 फीसदी रह गई. हाउसहोल्ड केयर 6.1 फीसदी से गिरकर 4 फीसदी पर आ गया, जबकि फूड व बेवरेजेज की ग्रोथ 4.4 फीसदी से घटकर 3.5 फीसदी रह गई.
महंगाई का बोझ, सरकारी कदमों से राहत की उम्मीद
खरीदारी में ये सुस्ती ऐसे समय में आई है जब बढ़ती महंगाई से घरों का बजट बिगड़ रहा है. सितंबर में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.5 फीसदी हो गई, जबकि खाद्य महंगाई 7.7 फीसदी पर पहुंच गई. असमान बारिश ने खरीफ की फसल को नुकसान पहुंचाया है, जिससे खानेपीने की चीजों के दाम बढ़े हैं. इससे ग्रामीण इलाकों में लोगों की खरीदने की ताकत पर असर पड़ा है.
हालांकि, भविष्य को लेकर कुछ उम्मीदें भी हैं. एचयूएल की एमडी प्रिया नायर ने पिछले हफ्ते कहा कि असली सवाल ग्रामीण मजदूरी का है. सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में 5 से 6 फीसदी की बढ़ोतरी की है, जो एक बहुत अच्छा कदम है. इसके अलावा ‘विकसित भारतगारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशनग्रामीण’ के बजट में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है. इससे उन इलाकों में ग्रामीण मजदूरी को सहारा मिलेगा, जहां अभी चुनौतियां बनी हुई हैं.