अपने राज्य का सांस्कृतिक गौरव और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के प्रति संवेदना. महर्षि वाल्मीकि जयंती पर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इन्हीं दोनों आदर्शों को एक साथ धरातल पर उतार कर एक भावपूर्ण संदेश दिया है. एक ओर जहां रामायण के रचयिता आदिकवि महर्षि वाल्मीकि से जुड़े पवित्र स्थलों को वैश्विक पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित करने के लिए करोड़ों रुपये की विराट योजनाएं आकार ले रही हैं, वहीं दूसरी ओर पिछली सरकारों में उपेक्षित एवं वंचित रहे समाज को उनके श्रम का सच्चा सम्मान और सामाजिक सुरक्षा का कवच प्रदान करना, योगी सरकार के उस रामराज्य की परिकल्पना का साकार रूप है, जिसका गान महर्षि वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य में किया था.

भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण तब तक अधूरा है, जब तक उन महापुरुषों और ऋषियों के तपोस्थलों को उनका उचित सम्मान नहीं मिलता, जिन्होंने इस देश की आत्मा को गढ़ा है. की रणनीति अत्यंत स्पष्ट और दूरदर्शी है. रामायण सर्किट और राम वनगमन पथ के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि से जुड़े प्रत्येक महत्वपूर्ण स्थल का कायाकल्प करना. इस महान पहल का सबसे प्रमुख केंद्र चित्रकूट के लालापुर स्थित वाल्मीकि आश्रम के रूप में उभर रहा है. यह वह तपोभूमि है, जहां महर्षि ने अपने ज्ञान और तपस्या से समाज को दिशा दी थी.
जड़ों की ओर निष्ठा से वापसी
पर्यटन विभाग द्वारा यहां स्थापित महर्षि वाल्मीकि की 12.5 फीट ऊंची भव्य कांस्य प्रतिमा और आश्रम का संपूर्ण विकास इस बात का प्रमाण है कि सरकार अपनी जड़ों की ओर पूरी निष्ठा से लौट रही है. इतना ही नहीं, एक भव्य पर्यटन सुविधा केंद्र का निर्माण अपने अंतिम चरण में है, जो भविष्य में दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ा केंद्र बनेगा. इस विरासत को सहेजने के लिए सरकार ने कई और परियोजनाएं आगे बढ़ाई हैं. वाल्मीकि घाट, परिक्रमा पथ और आरती स्थल जैसी परियोजनाएं स्वीकृत हैं.
अयोध्या और इटावा के वाल्मीकि स्थलों के लिए वित्तीय प्रावधान किया गया है, कानपुर के बिठूर आश्रम का संरक्षण और अयोध्या के नए हवाई अड्डे का नाम महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखा गया है. इसके अलावा सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में दसदस स्मारक बन रहे हैं, जिनमें महर्षि वाल्मीकि, संत रविदास, संत कबीर, बाबा साहेब आंबेडकर और महात्मा ज्योतिबा फुले की मूर्तियां होंगी.
ये प्रयास सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, पर प्रतीकों की भी एक सीमा होती है. महापुरुषों की स्मृति को स्थायी बनाने का सबसे प्रभावी तरीका यह है कि जिस समाज के वे प्रेरणास्रोत रहे, उसके जीवन में ठोस सुधार आए. इस अर्थ में सफाईमित्रों के लिए की गई घोषणाएं बड़ा कदम हैं. वाराणसी में स्वच्छता सेनानियों को सम्मानित करते हुए मुख्यमंत्री ने उन्हें नींव का पत्थर कहा, जो दिखता नहीं पर जिस पर पूरी इमारत टिकी होती है.
लालजी निर्मल
यह उपमा अलंकार से अधिक एक तथ्य का बयान है. सार्वजनिक स्वास्थ्य, महामारियों की रोकथाम और नगरीय व्यवस्था का आधार यही कर्मी हैं. सम्मान समारोहों की अपनी उपयोगिता है, क्योंकि वे समाज की नज़र में इन कर्मियों की हैसियत बदलने में मदद करते हैं. लेकिन असली सवाल यह है कि सम्मान के साथ क्या अधिकार भी मिलेंगे. इसी प्रश्न पर मुख्यमंत्री योगी की घोषणाएं ध्यान खींचती हैं.
जवाबदेह संस्था के जरिये भुगतान
सीएम योगी ने सबसे पहले उस समस्या को निशाना बनाया जो आउटसोर्सिंग व्यवस्था का सबसे बड़ा रोग रही है. ठेकेदारों और एजेंसियों की लंबी श्रृंखला में कर्मचारी की मेहनत की कमाई का एक हिस्सा अक्सर बीच में ही गायब हो जाता है. मुख्यमंत्री ने इसका समाधान यूपी आउटसोर्स सेवा निगम के रूप में सामने रखा, जिसके माध्यम से 16 हज़ार रुपये न्यूनतम मानदेय की गारंटी दी जा रही है. बिचौलियों को हटाकर एक जवाबदेह संस्था के ज़रिये भुगतान की व्यवस्था सही दिशा में उठाया गया कदम है, क्योंकि जवाबदेही के बिना कोई भी वेतन गारंटी कागज़ी रह जाती है.
कर्मचारियों को न्यूनतम मानदेय के साथ जो सुविधाए जोड़ी गई हैं, वे इस पहल को वेतनवृद्धि से आगे ले जाती हैं. ईएसआई के तहत अस्पताल की सुविधा उन कर्मियों के लिए बड़ी राहत है, जिनका काम उन्हें संक्रमण और बीमारियों के जोखिम में रखता है. उपचार का खर्च किसी निम्नआय परिवार को कर्ज़ में धकेलने के लिए पर्याप्त होता है, इसलिए स्वास्थ्य सुरक्षा बुनियादी ज़रूरत है. सुरक्षा बीमा का उद्देश्य यह है कि हादसे की स्थिति में परिवार असहाय न रह जाए, जो इस पेशे की जोखिमभरी प्रकृति को देखते हुए बिलकुल उचित है. पीएफ की कटौती का तर्क भी दूरदर्शी है. इसका मक़सद यह है कि सेवानिवृत्ति पर कर्मी के पास अपनी पूंजी और ब्याज हो और वह बच्चों पर आश्रित न रहे.
महर्षि वाल्मीकि जयंती पर पूरे प्रदेश में शोभायात्राएं निकलीं, अखंड मानस पाठ हुए और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिठूर जाकर श्रद्धासुमन अर्पित किए. यह सिर्फ महर्षि के प्रति श्रद्धा का प्रतीक ही नहीं, बल्कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के प्रति उनकी संवेदना का भी मूर्त रूप था. भारतीय समाज सदियों से जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहा है. वाल्मीकि समाज और अन्य वंचित समुदायों के लोगों को सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ा है.
आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण की बात
जब सरकार वाल्मीकि जयंती के अवसर पर इस वर्ग के आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण की बात करती है, तो उसका महत्व इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए. आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक रोज़गार सामाजिक भेदभाव को कम करने के सबसे कारगर साधन हैं और इस दृष्टि से मुख्यमंत्री की घोषणाओं के सामाजिक निहितार्थ व्यापक हैं.
स्वच्छता सेनानियों के प्रति संवेदना व्यक्त करना आसान है, उसे नीति और व्यवस्था में बदलना कठिन. मुख्यमंत्री ने पहला काम कर दिखाया है और दूसरे की दिशा भी निर्धारित कर दी है. अब ज़िम्मेदारी उस प्रशासनिक मशीनरी की है, जिसे इस संकल्प को हर कर्मचारी तक पहुंचाना है. योगी सरकार संकल्प सिद्धि तक पहुंचती रही है, इसलिए यह संकल्प भी पूरा होगा.