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Dharam

Durga Puja की मूर्ति में मां की आंखें सबसे खास क्यों होती हैं, आखिर क्या है चक्षुदान?​

दुर्गा पूजा के पड़ाल में आपने मां की आंखों की तरफ गौर जरुर किया होगा, कुछ अलग और जैसे कि भक्तों से बातें कर रही हों। मां दुर्गा की आंखों की संरचना बिल्कुल अनोखी होती है कि दर्शन के समय नजरें वहीं टिक जाती है। प्रत्येक वर्ष मां दुर्गा की विशाल मूर्ति बनाई जाती है, […]

दुर्गा पूजा के पड़ाल में आपने मां की आंखों की तरफ गौर जरुर किया होगा, कुछ अलग और जैसे कि भक्तों से बातें कर रही हों। मां दुर्गा की आंखों की संरचना बिल्कुल अनोखी होती है कि दर्शन के समय नजरें वहीं टिक जाती है। प्रत्येक वर्ष मां दुर्गा की विशाल मूर्ति बनाई जाती है, जिसमें माता के वस्त्र, आभूषण और अस्त्रशस्त्र तक खूबसूरती से सजाए जाते हैं।  लेकिन एक चीज ऐसी होती है जिसे मूर्तिकार सबसे आखिर में बनाते हैं, वो हैं मां दुर्गा की आंखें।

सच में मां की आंखें दिखने में अलग होती है, ऐसा क्या होता है जो सबको आकर्षित करता है। बंगाल में माता दुर्गा की प्रतिमा बनाते समय एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें मूर्तिकार माता की आंखों में मानो प्राण डालता है, इसको चक्षुदान कहा जाता है। ऐसा क्या है इन आंखों के पीछे का रहस्य जिसे सदियों से बंगाल के मूर्तिकार संभाल कर रखते हैं।

माता दुर्गा की आंखों का रहस्य क्या है?

असल में बंगाल की दुर्गा पूजा से संबंधित एक खास परंपरा है, जिसे चक्षुदान कहा जाता है। बंगाल के कुम्हार टोली जैसे प्रसिद्ध मूर्तिकार इलाकों में मिट्टी से माता दुर्गा की प्रतिमा बनाने का कम कई चरणों में पूरा है। इसमें सबसे पहले बांस और भूसे से ढांचा तैयार किया जाता है फिर ऊपर मिट्टी की परतें चढ़ाई जाती है।

इसके बाद मां का चेहरा हाथ, अस्त्र और पूरा स्वरुप तैयार किया जाता है। फिर माता की मूर्ति में रंग, वस्त्र और आभूषण पहनाकर प्रतिमा को भव्य रुप दिया जाएगा, लेकिन जब पूरी प्रतिमा तैयार हो जाती है उस समय भी मां की आंखें बनाने की अनोखी रस्म निभाई जाती है। माता की आंखें बनाते समय एक छोटी सी लकीर भी माता के चेहरे के पूरे भाव बदल देती है।

मां दुर्गा की आंखों का स्वरुप कैसा होता है?

जब मूर्तिकार माता दुर्गा की आंखें बनाता है, उनमें करुणा दिखनी चाहिए, शक्ति दिखाई देनी चाहिए और भक्तों को मां की ममता का एहसास भी होना जरुरी है। इसलिए यह काम अत्यंत कुशलता और एकाग्रता से किया जाता है। इस पंरपरा का महत्व सिर्फ कला तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगला में इसे चक्षुदान कहा जाता है।

चक्षु का अर्थ है आंख और दान का अर्थ है अर्पित करना। यह प्रथा सदियों से बंगाल की दुर्गा पूजा का अनूठा हिस्सा है और इसे मुख्य रुप से महालय के दिन किया जाता है।

क्या है चक्षुदान की परंपरा?

मूर्तिकार मां की आंखों में आखिरी रेखा खींचता है, तो उसके लिए वह सिर्फ चित्रकारी का काम नहीं रह जाता है। इसमें मूर्तिकार की मेहनत, पीढियों से चली आ रही कला और मां के प्रति श्रद्धा भी दिखाई देती है। माता दुर्गा की आंखें हमेशा सबसे वरिष्ठ कलाकर ही बनाता है, जिससे उसमें जीवंतता आए।

इतना ही नहीं, माता की आंखों को दुर्गा पूजा में स्थापना से पहले गुप्त रखा जाता है जिससे वह भक्तों के सामने जब आएं तो भक्त उनसे अनोखा रिश्ता कायम कर पाएं। इसी कारण से दुर्गा पूजा के पंडाल में मां की आंखों से नजर मिलाते हैं तब हमें सिर्फ मिट्टी और रंगों से बनी प्रतिमा नहीं दिखाई देती है बल्कि माता का एक जीवंत स्वरुप नजर आता है।

मां दुर्गा की आंखों में हमें नजर आती है एक मां की शक्ति, मां की करुणा और भक्तों की रक्षा करने वाली देवी। अगर आप कभी भी मां दुर्गा के पंडाल में जाएं, तो एक बार माता की आंखों को रुककर जरुर देखें। माता की आंखों में आपको दिखेगा देवी दुर्गा का आशीर्वाद।

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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