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लूडो से रील्स तक…घंटों फोन में लगे रहते हैं बुजुर्ग, एक्सपर्ट से जानें ये कितना खतरनाक​

घर के बुजुर्ग ही अगर स्मार्टफोन में घंटों बिताए तो ये बड़ी चिंता का कारण है. लेकिन भारत के अधिकतर घरों में ऐसा देखने को मिल रहा है. बड़ेबुजुर्गों को समय बिताने के लिए स्मार्टफोन एक बेहतरीन जरिया मिल गया है. लेकिन बच्चों और यंग ऐज वालों की तरह बड़े लोग भी इसके आदी हो […]

घर के बुजुर्ग ही अगर स्मार्टफोन में घंटों बिताए तो ये बड़ी चिंता का कारण है. लेकिन भारत के अधिकतर घरों में ऐसा देखने को मिल रहा है. बड़ेबुजुर्गों को समय बिताने के लिए स्मार्टफोन एक बेहतरीन जरिया मिल गया है. लेकिन बच्चों और यंग ऐज वालों की तरह बड़े लोग भी इसके आदी हो गए हैं. हालात ये हैं कि 50 साल से अधिक उम्र के मातापिता रील्स या लूडो जैसी गेम्स में काफी देर तक लगे रहते हैं. इस टॉपिक पर टीवी9 ने डॉ. मेघा अग्रवाल से खास बातचीत की. एक्सपर्ट का कहना है कि अकेले रहने वाले बुजुर्ग लोगों के लिए ये कुछ हद तक अच्छा है, पर अगर पूरा दिन ऐसा हो रहा है तो ये बड़ी चिंता का कारण है.

लूडो गेम, रील्स पर वीडियो और व्हाट्सएप पर कॉलिंग को लिमिट में ही यूज करना चाहिए. शॉर्ट वीडियो देखने से स्ट्रेस कम होता है लेकिन इस पर ज्यादा टाइम खर्च करने से दिमाग और बीमार होने लगता है. चलिए आपको एक्सपर्ट के जरिए बताते हैं कि ये कितना खतरनाक है.

एक्सपर्ट ने क्या कहा

डॉ. मेघा अग्रवाल कहती हैं कि किसी बुजुर्ग को फोन पर ज्यादा समय बिताते देखकर हर बार घबराने की जरूरत नहीं होती. कई बार फोन चलाना उनके दिमाग के लिए अच्छा भी हो सकता है. जैसे अगर वो घर वालों या दोस्तों के साथ लूडो खेल रहे हैं, रिश्तेदारों से वीडियो कॉल पर बात कर रहे हैं, व्हाट्सएप चला रहे हैं या कोई नया ऐप सीख रहे हैं, तो उनका दिमाग एक्टिव रहता है. खासकर जो लोग घर पर ज्यादा समय अकेले रहते हैं, उनके लिए फोन उन्हें लोगों से जुड़ा हुआ भी महसूस कराता है.

कब शुरू होने लगती है दिक्कत

एक्सपर्ट कहती हैं कि जब फोन उनका पूरे दिन का बस एक ही काम बन जाए तो समस्या बढ़ने लगती है. जैसे घंटों सिर्फ रील्स देखते रहना, वॉक छोड़ देना, घर में किसी से बात न करना या फोन चलाते चलाते रात को बहुत देर से सोना. फिर इसका असर उनकी हेल्थ पर पड़ने लगता है.

बहुत ज्यादा स्क्रॉलिंग करने से शरीर की एक्टिविटी कम हो जाती है, नींद खराब हो सकती है और ध्यान लगाना भी मुश्किल हो सकता है. कई बार लोग लगातार कंटेंट देख रहे होते हैं, फिर भी अकेलापन या चिड़चिड़ापन महसूस करने लगते हैं.

डिजिटल डिमेंशिया

आजकल डिजिटल डिमेंशिया शब्द भी सुनने को मिलता है. लेकिन ये कोई ऑफिशियल मेडिकल बीमारी या डायग्नोसिस नहीं है. ये शब्द आमतौर पर तब इस्तेमाल होता है जब स्क्रीन पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने की वजह से ध्यान, याददाश्त या फोकस में दिक्कत होने लगे और इंसान दिमाग को दूसरे तरीकों से इस्तेमाल ही न करे.

इसलिए फोन पूरी तरह छीन लेने की जरूरत नहीं है. थोड़ा लूडो, वीडियो कॉल और काम की चीजें देखना अच्छा हो सकता है. बस ये ध्यान रखें कि वो वॉक भी करें, लोगों से मिलें, टाइम पर सोएं और ऐसी चीजें भी करते रहें जिससे शरीर और दिमाग, दोनों एक्टिव रहें.

ठीक से नींद न आना

उम्र के बढ़ने के साथ कम नींद आती है. उम्रदराज होने के बाद भी फोन की लत लगी हुई है तो इससे नींद का पैटर्न काफी बुरी तरह बिगड़ सकता है. फोन की ब्लू लाइट आंखों से दिमाग तक पहुंचती है और मेलाटोनिन हार्मोन का प्रोडक्शन कम होने लगता है. नींद के आने में इस हार्मोन का रोल अहम है. ये कम बनेगा तो नींद भी देर से आएगी या रात में बारबार आंख खुलती है. इंसोमेनिया अगर हो जाए तो दिल की हेल्थ कमजोर होती है और याददाश्त पर बुरा असर पड़ता है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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