Nepal flood: नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने गोरखपुर के पिपराई निवासी आशुतोष उपाध्याय को अंदर तक झकझोर दिया है. बाढ़ के बीच अपनी जान बचाकर भारत लौटे आशुतोष ने नेपाल में देखे तबाही के मंजर को याद करते हुए ऐसी कहानी सुनाई, जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए. उनका कहना है कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने दोस्तों और दूसरे लोगों को बाढ़ के तेज बहाव में बहते देखा. कई लोग मदद के लिए चीखते रहे थे, लेकिन उस वक्त किसी के पास उन्हें बचाने का कोई रास्ता नहीं था. जान बचाने के लिए आशुतोष करीब 24 घंटे तक पहाड़ पर भूखेप्यासे बैठे रहे. आखिरकार हेलीकॉप्टर पहुंचा और उन्हें सुरक्षित निकाला गया.

आशुतोष इसी साल मार्च में नेपाल गए थे. वह रसुआ इलाके में रह रहे थे और एक जलविद्युत परियोजना से जुड़ी पाइपलाइन कंपनी में काम कर रहे थे. उनके साथ कई दूसरे साथी भी वहां काम करते थे. कार्यस्थल के पास ही त्रिशूली नदी बहती थी. आशुतोष के मुताबिक, आपदा के समय लोगों को सतर्क करने के लिए वहां सायरन की व्यवस्था भी थी, लेकिन 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ से पहले कोई अलार्म नहीं बजा.
उन्होंने बताया कि सुबह करीब 9:30 बजे अचानक बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ने लगा. देखते ही देखते हालात बिगड़ गए. उनकी कंपनी का कार्यालय एक बहुमंजिला इमारत के भूतल पर था. इसी दौरान अचानक किसी ने चिल्लाकर कहा भागोभागो, पानी आ रहा है. आवाज सुनते ही आशुतोष और उनके साथी जान बचाने के लिए पहाड़ की ओर भागे.
कचरे की तरह बह गए दोस्त
आशुतोष के मुताबिक, सभी लोग पहाड़ पर नहीं पहुंच सके. उनका एक साथी भी तेज बहाव की चपेट में आ गया. देखते ही देखते वह बाढ़ के पानी में बह गया. आशुतोष और दूसरे साथी उसे बचाने के लिए चीखते रहे, लेकिन चारों तरफ पानी और तबाही के बीच मदद करने वाला कोई नहीं था. उन्होंने बताया कि उनकी आंखों के सामने करीब 25 से 30 लोग कचरे की तरह पानी के तेज बहाव में बह गए. कई लोगों की चीखें सुनाई दे रही थीं, लेकिन वह चाहकर भी किसी की मदद नहीं कर पा रहे थे.
बाढ़ के साथ ही संचार व्यवस्था भी पूरी तरह चरमरा गई. मोबाइल नेटवर्क बंद हो गया और आशुतोष का अपने परिवार से संपर्क टूट गया. पहाड़ पर मौजूद लोगों के पास न पर्याप्त खाना था और न ही पीने का पानी. सभी इस इंतजार में थे कि कहीं से मदद पहुंचे और उन्हें सुरक्षित निकाला जा सके.
आशुतोष बताते हैं कि उन्होंने करीब 24 घंटे पहाड़ पर ही बिताए. पूरी रात डर और दहशत के बीच गुजरी. चारों तरफ तबाही का मंजर था. अगले दिन अचानक एक हेलीकॉप्टर पहुंचा. इसके बाद धीरेधीरे वहां फंसे लोगों को रेस्क्यू किया गया और उन्हें काठमांडू ले जाया गया. काठमांडू पहुंचने के बाद आशुतोष को पहली बार महसूस हुआ कि वह सुरक्षित हैं और उनकी जान बच गई है.
भूखेप्यासे पहाड़ पर बिताई रात
वहीं, भारत में आशुतोष का परिवार भी लगातार चिंता में था. उनके पिता विनोद उपाध्याय के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह बेटे से बातचीत हुई थी. इसके कुछ ही देर बाद नेपाल में बाढ़ और तबाही की खबरें आने लगीं. परिवार ने लगातार आशुतोष से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन मोबाइल नेटवर्क बंद होने के कारण बात नहीं हो सकी. 26 और 27 अगस्त की रात परिवार के लिए बेहद मुश्किल रही. सोशल मीडिया पर नेपाल की बाढ़ की तस्वीरें और वीडियो देखकर उनकी चिंता और बढ़ती गई.
विनोद उपाध्याय बताते हैं कि बारबार फोन करने के बावजूद बेटे से संपर्क नहीं हो पा रहा था. उन्हें डर था कि कहीं आशुतोष भी बाढ़ की चपेट में तो नहीं आ गया. आखिरकार 28 अगस्त को अचानक आशुतोष का फोन आया. उसकी आवाज सुनते ही परिवार को राहत मिली और उन्हें यकीन हुआ कि बेटा सुरक्षित है.
‘लोगों को अपनी आंखों के सामने बहते देखा’
भारत लौटने के बाद जब आशुतोष से पूछा गया कि क्या वह दोबारा नेपाल जाना चाहेंगे, तो उन्होंने साफ कहा कि अब वह नेपाल नहीं जाना चाहते. उनके मुताबिक, नेपाल की बाढ़ से जुड़ी यादें इतनी भयावह हैं कि उन्हें याद करते ही आज भी दिल बैठ जाता है. उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने कई साथियों को खोया, लोगों को अपनी आंखों के सामने बहते देखा और पूरी रात मौत के साये में पहाड़ पर गुजारी. आशुतोष का कहना है कि वह उस भयावह अनुभव को शायद कभी नहीं भूल पाएंगे.