भारत सरकार ने एक देश, एक समय को कानूनी तौर पर लागू करने का फैसला कर लिया है. मार्च 2027 से सभी सरकारी संस्थाएं, बैंक आदि इस नए समय के हिसाब से संचालित होंगे. समय हमारे दैनिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक की हर गतिविधि समय के अनुसार चलती है. प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक समय मापने के तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं.प्राचीन काल में मनुष्य प्राकृतिक घटनाओं को देखकर समय का अनुमान लगाता था. सूर्य का उगना, ढलना और चंद्रमा की बदलती कलाएं समय मापने के मुख्य आधार थे. लोग धूप में बनने वाली अपनी परछाई की लंबाई देखकर पहर का हिसाब लगाते थे.

इसके बाद सूर्य घड़ी, जल घड़ी और बालू घड़ी का आविष्कार हुआ. ये तरीके स्थानीय स्तर पर उपयोगी थे लेकिन इनमें सटीकता की कमी थी. मौसम बदलने या बादल छाने पर समय का सही अंदाजा लगाना कठिन हो जाता था.आइए, इसी बहाने जानते हैं कि आखिर समय कैसे तय होता है और क्या है इंडियन स्टैंडर्ड टाइम?
पृथ्वी का घूर्णन और देशांतर रेखाएं
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समय का निर्धारण पृथ्वी की गति से जुड़ा हुआ है. हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है. पृथ्वी को अपना एक पूरा चक्कर लगाने में लगभग 24 घंटे का समय लगता है. भूगोलवेत्ताओं ने पृथ्वी को काल्पनिक खड़ी रेखाओं में बांटा है जिन्हें देशांतर रेखाएं कहा जाता है. पृथ्वी के पूरे गोले में कुल 360 देशांतर रेखाएं हैं. पृथ्वी 24 घंटे में 360 डिग्री घूमती है. इस तरह 15 डिग्री देशांतर की दूरी पर एक घंटे का अंतर आ जाता है. सूर्य पूर्व दिशा में निकलता है इसलिए पूर्व के देशों में दिन पहले होता है और पश्चिम के देशों में बाद में.
थ्वी को अपना एक पूरा चक्कर लगाने में लगभग 24 घंटे का समय लगता है. फोटो: Pexels
ग्रीनविच मीन टाइम की शुरुआत
जब 19वीं सदी में रेल नेटवर्क और संचार माध्यमों का विकास हुआ, तब दुनिया भर में एक मानक समय की जरूरत महसूस हुई. अलगअलग शहरों में स्थानीय समय अलग होने से रेलगाड़ियों के संचालन में भारी भ्रम पैदा होता था. इस समस्या को सुलझाने के लिए साल 1884 में वाशिंगटन डीसी में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया.
इस सम्मेलन में लंदन के पास स्थित ग्रीनविच की रॉयल ऑब्जर्वेटरी से गुजरने वाली देशांतर रेखा को शून्य डिग्री माना गया. इसे प्राइम मेरिडियन नाम दिया गया. इसी रेखा के आधार पर जो समय तय किया गया, उसे ग्रीनविच मीन टाइम यानी जीएमटी कहा गया. जीएमटी रेखा के पूर्व में स्थित देशों का समय आगे रहता है और पश्चिम के देशों का समय पीछे रहता है.
आधुनिक युग में यूटीसी और परमाणु घड़ियां
समय के साथ वैज्ञानिकों ने पाया कि पृथ्वी के घूमने की गति हमेशा एक समान नहीं रहती. इसमें सूक्ष्म बदलाव आते रहते हैं. इसलिए जीएमटी की जगह एक अधिक सटीक प्रणाली लाई गई जिसे कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम यानी यूटीसी कहा जाता है. आज दुनिया भर का समय अत्यधिक सटीक परमाणु घड़ियों द्वारा तय किया जाता है. ये घड़ियां सीजियम133 परमाणु के कंपन पर काम करती हैं.
सीजियम का परमाणु एक सेकंड में अरबों बार कंपन करता है. इन घड़ियों की सटीकता इतनी ज्यादा होती है कि लाखों सालों में भी इनमें एक सेकंड का अंतर नहीं आता. दुनिया भर की प्रयोगशालाओं की परमाणु घड़ियों के औसत से अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित होता है.
भारतीय मानक भारत और श्रीलंका में आधिकारिक रूप से मान्य समय है. फोटो: Pexels
इंडियन स्टैंडर्ड टाइम क्या है?
इंडियन स्टैंडर्ड टाइम को संक्षेप में आईएसटी कहा जाता है. इसे हिंदी में भारतीय मानक समय कहते हैं. यह पूरे भारत और श्रीलंका में आधिकारिक रूप से मान्य समय है. आईएसटी का निर्धारण देशांतर रेखा साढ़े बयासी डिग्री पूर्वी देशांतर के आधार पर किया जाता है. यह मानक देशांतर रेखा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर शहर से होकर गुजरती है. भारत का आधिकारिक समय ग्रीनविच मीन टाइम और यूटीसी से 5 घंटे 30 मिनट आगे है. जब लंदन में दोपहर के 12 बजते हैं, तब भारत में शाम के 5 बजकर 30 मिनट हो रहे होते हैं.
भारत में एक ही मानक समय की जरूरत
भारत एक विशाल देश है जो पूर्व से पश्चिम तक लगभग 2933 किलोमीटर में फैला हुआ है. भारत का देशांतर विस्तार लगभग 68 डिग्री पूर्व से लेकर 97 डिग्री पूर्व तक है. इसका अर्थ यह है कि भारत के सबसे पूर्वी छोर अरुणाचल प्रदेश और सबसे पश्चिमी छोर गुजरात के बीच लगभग 30 देशांतर रेखाओं का अंतर है. चूंकि एक डिग्री देशांतर पर 4 मिनट का अंतर होता है, इसलिए 30 डिग्री पर लगभग 120 मिनट का अंतर आ जाता है. यदि भारत में स्थानीय समय लागू किया जाता, तो गुजरात और अरुणाचल प्रदेश की घड़ियों में दो घंटे का फर्क होता. इससे ट्रेनों की समय सारिणी, विमान सेवाओं, बैंकों और कार्यालयों के संचालन में भारी असुविधा होती. इसी भ्रम से बचने के लिए देश के मध्य से गुजरने वाली रेखा को पूरे देश का मानक समय मान लिया गया.
1 सितंबर 1947 को इंडियन स्टैंडर्ड टाइम को पूरे देश में लागू किया गया. फोटो: Pexels
भारत में मानक समय का इतिहास
अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में अलगअलग शहरों के अपने स्थानीय समय होते थे. उस दौर में बॉम्बे टाइम, कलकत्ता टाइम और मद्रास टाइम जैसे कई क्षेत्रीय समय प्रचलित थे. रेलवे के विस्तार के साथ एक केंद्रीय समय की आवश्यकता बढ़ी. 1 सितंबर 1947 को भारत की आजादी के तुरंत बाद आधिकारिक रूप से इंडियन स्टैंडर्ड टाइम को पूरे देश के लिए लागू किया गया. हालांकि, कोलकाता और मुंबई जैसे शहरों ने अपने पुराने स्थानीय समय को पूरी तरह छोड़ने में कुछ अतिरिक्त वर्ष लगाए. आखिरकार, पूरे देश ने आईएसटी को एकमात्र वैध मानक समय के रूप में स्वीकार कर लिया.
राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला की मानक समय में क्या है भूमिका?
भारत में सटीक समय बनाए रखने की कानूनी जिम्मेदारी राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला यानी सीएसआईआरएनपीएल की है. यह संस्थान नई दिल्ली में स्थित है. एनपीएल परिसर में कई उच्च तकनीक वाली सीजियम और हाइड्रोजन मेज़र परमाणु घड़ियां स्थापित हैं. ये घड़ियां समय को नैनोसेकंड के स्तर तक सटीक रखती हैं. भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, उपग्रह प्रणालियां, रक्षा क्षेत्र और बैंकिंग नेटवर्क इसी एनपीएल के समय से समन्वय स्थापित करते हैं.
दो टाइम ज़ोन की मांग और उसकी चुनौतियां
पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में सूरज बहुत जल्दी उगता है और शाम भी जल्दी हो जाती है. गर्मियों में वहां सुबह 4 बजे ही उजाला हो जाता है और शाम को 4:30 बजे अंधेरा छा जाता है. दूसरी तरफ पश्चिमी भारत में सूरज देर से निकलता है और देर से ढलता है. इस कारण पूर्वोत्तर राज्यों में सरकारी दफ्तर खुलने तक सुबह के कई उपयोगी घंटे बर्बाद हो जाते हैं और शाम को अतिरिक्त बिजली खर्च होती है.
इसी वजह से देश में दो टाइम ज़ोन बनाने की मांग उठती रही है. चाय बागानों में काम करने वाले लोग अनौपचारिक रूप से चाय बागान टाइम का पालन करते हैं जो आईएसटी से एक घंटा आगे रहता है. हालांकि, सरकार ने देश की एकता, प्रशासनिक सरलता और रेलवे संचालन में सुरक्षा कारणों से दो टाइम ज़ोन की व्यवस्था को लागू नहीं किया है. दो समय क्षेत्र होने से रेल हादसों और सामान्य जनजीवन में भ्रम का बड़ा खतरा बना रहता है.
निष्कर्ष यह है कि समय का निर्धारण खगोलीय विज्ञान, भौतिकी और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का मिलाजुला परिणाम है. प्राचीन सूर्य घड़ियों से लेकर आज की अत्याधुनिक परमाणु घड़ियों तक का सफर विज्ञान की बड़ी उपलब्धि है. इंडियन स्टैंडर्ड टाइम ने भारत की भौगोलिक विविधता को एक सूत्र में पिरोकर रखा है. यह न केवल हमारी घड़ियों को एक साथ चलाता है बल्कि देश की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता है.