नेपाल में बीते 25 अगस्त को अचानक आई आपदा ने सैकड़ों जानें ले लीं. कई सौ लापता हैं. हजारों घर, मवेशियों का पता नहीं है. कितने सड़क, पुल बह गए हैं, इसका आकलन अभी तक नहीं हो पाया है. उधर बाढ़ का पानी बिहार तक दस्तक दे चुका है. तबाही भारत में भी शुरू हो चुकी है. बिहार के कई जिलों में अलर्ट घोषित किया गया है. यह सारा नुकसान हिमालय पर बनी ग्लेशियर झील के बांध टूटने से हुआ बताया जा रहा है. आइए, नेपाल में आई आपदा के बहाने समझते हैं कि आखिर हिमालय की गोद में बसे इलाकों में अचानक सैलाब आने की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं?

हिमालयी क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों से लगातार गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं. इनमें सबसे घातक और डरावनी आपदा अचानक आने वाला सैलाब यानी फ़्लैश फ़्लड है. यह सैलाब बिना किसी पूर्व चेतावनी के पहाड़ों से नीचे उतरता है और भारी तबाही मचाता है. बाट चाहे नेपाल की हो, उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों की हो या फिर पूर्वोत्तर भारत की, हाल सब जगह एक सा ही है.
अचानक आने वाला सैलाब क्या है?
अचानक आने वाला सैलाब उस स्थिति को कहते हैं जब किसी स्थान पर बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी जमा होकर तेज गति से बहने लगता है. सामान्य बाढ़ आने में कुछ घंटों या दिनों का समय लगता है, लेकिन अचानक आने वाला सैलाब केवल कुछ मिनटों में आ जाता है. यह अपने साथ भारी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और बड़े पेड़ बहाकर लाता है.
नेपाल में बाढ़ से हाहाकार.
सैलाब की संख्या बढ़ने के क्या हैं कारण?
हिमालय क्षेत्र में अचानक आने वाली बाढ़ों के पीछे प्राकृतिक और मानवनिर्मित दोनों कारण शामिल हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र पूरी तरह बदल गया है. तापमान बढ़ने से स्थानीय स्तर पर अचानक बादलों का संघनन होता है, जिससे बादल फटने की घटनाएं बढ़ती हैं. हिमालय के तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं. इससे ऊंचे पहाड़ों पर हिमनद झीलें बन जाती हैं.
जब इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो भीषण जलप्रलय आ जाती है. पहाड़ों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां भी इसका बड़ा कारण हैं. अनियंत्रित सड़क निर्माण, भारी मशीनों का उपयोग, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों का सफाया मिट्टी की पकड़ को कमजोर कर रहा है. इसके साथ ही नदियों के प्राकृतिक रास्तों पर बस्तियां और होटल बनने से पानी का बहाव रुक जाता है, जिससे बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
मसूरी भूस्खलन
उत्तराखंड बना आपदाओं का प्रमुख केंद्र
उत्तराखंड राज्य इस प्रकार की आपदाओं का प्रमुख केंद्र बन चुका है. केदारनाथ आपदा से लेकर चमोली और उत्तरकाशी की घटनाएं इसके स्पष्ट उदाहरण हैं. अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी जैसी नदियों की घाटियों में अचानक जलस्तर बढ़ने की घटनाएं बारबार होती हैं. यहां के ऊंचे इलाकों में बादल फटने और ग्लेशियर टूटने की घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की जाती हैं. सड़कों के चौड़ीकरण और नदियों के किनारे निर्माण कार्यों के कारण जब भी भारी बारिश होती है, तो पानी को निकलने का स्थान नहीं मिलता और तबाही मच जाती है.
हिमाचल प्रदेश में भी संकट कम नहीं
हिमाचल प्रदेश में भी हर वर्ष मानसून के दौरान अचानक आने वाले सैलाब की घटनाएं बढ़ रही हैं. मंडी, कुल्लू, शिमला, किन्नौर और लाहौलस्पीति जैसे जिले अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र बन चुके हैं. ब्यास, सतलुज और रावी जैसी नदियों में पानी अचानक तेजी से बढ़ जाता है. यहां सेब के बागानों के विस्तार, पर्यटन संरचनाओं के अनियोजित विकास और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के कारण पहाड़ों की ढलानें अस्थिर हो गई हैं. नदियों के किनारों पर निर्माण होने से तेज बहाव सीधे बस्तियों और पुलों को बहा ले जाता है.
पिथौरागढ़ लैंडस्लाइड.
जम्मूकश्मीर और लद्दाख की चुनौतियां अलग
जम्मूकश्मीर और लद्दाख के भूगोल में अंतर है, लेकिन दोनों ही क्षेत्र अचानक बाढ़ के खतरे में हैं. कश्मीर घाटी में झेलम नदी और उसकी सहायक नदियों में बादल फटने से अचानक पानी भर जाता है. लद्दाख एक ठंडा रेगिस्तान है, जहां की मिट्टी बारिश को सोखने के लिए तैयार नहीं होती. जब लद्दाख जैसे शुष्क क्षेत्र में अचानक बादल फटते हैं, तो पानी सीधे नीचे की ओर बहकर गांवों को नष्ट कर देता है. लद्दाख के ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, जिससे नए जल स्रोत और खतरे बन रहे हैं.
पूर्वोत्तर हिमालयी राज्य भी खतरे की जद में
सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में हिमनद झीलों के फटने का खतरा सबसे अधिक देखा गया है. हाल ही में सिक्किम में दक्षिण ल्होनक झील के टूटने से तीस्ता नदी में आई अचानक बाढ़ इसका गंभीर उदाहरण है. सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, असम की तलहटी और मेघालय जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और तीव्र ढलान मिलकर पानी को बहुत तेज गति देते हैं. तीस्ता और ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियां अचानक उफान पर आ जाती हैं. पूर्वोत्तर के जंगलों की कटाई और बुनियादी ढांचे के विकास से यह समस्या और गंभीर हो गई है.
ढलीसंजौली बाईपास पर भारी भूस्खलन.
जानमाल और पर्यावरण पर पड़ रहा विपरीत प्रभाव
अचानक आने वाले सैलाब का प्रभाव केवल तात्कालिक क्षति तक सीमित नहीं रहता. सैलाब के कारण सड़कें टूट जाती हैं, पुल बह जाते हैं और बिजलीपानी की व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती है. सैकड़ों घर और खेत मलबे के नीचे दब जाते हैं. स्थानीय लोगों की आजीविका, विशेषकर कृषि, बागवानी और पर्यटन, बुरी तरह प्रभावित होती है. इसके अलावा नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ जाता है और उपजाऊ मिट्टी बह जाती है.
खतरों से निपटने में दीर्घकालिक प्रयास जरूरी
इस समस्या का समाधान केवल तात्कालिक राहत कार्यों तक सीमित नहीं हो सकता. इसके लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक नीति की आवश्यकता है. पहाड़ी क्षेत्रों में स्वचालित मौसम केंद्र और रडार प्रणाली लगानी चाहिए, ताकि भारी बारिश की सूचना समय पर मिल सके. ऊंचे हिमनदों और झीलों पर सेंसर आधारित निगरानी प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए ताकि जलस्तर बढ़ते ही निचले इलाकों को चेतावनी दी जा सके.
मसूरीदेहरादून मुख्य मार्ग पर कई जगह भूस्खलन.
पहाड़ों की भौगोलिक क्षमता को ध्यान में रखकर ही निर्माण कार्यों की अनुमति मिलनी चाहिए. नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में निर्माण पर सख्त प्रतिबंध होना चाहिए. ढलानों पर स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाने चाहिए ताकि मिट्टी की पकड़ मजबूत हो सके. इसके साथ ही स्थानीय नागरिकों को आपदा प्रबंधन और त्वरित बचाव कार्यों का नियमित प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है.
इस तरह हम कह सकते हैं कि हिमालय केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन और जल का मुख्य स्रोत है. अचानक आने वाले सैलाब प्रकृति की चेतावनी हैं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है. समय रहते वैज्ञानिक नियोजन, सख्त नियमों और आधुनिक तकनीक का उपयोग करके ही हिमालय को सुरक्षित रखा जा सकता है. इस मामले में भारत सरकार और राज्य सरकारों को मिलकर जल्दी से जल्दी जरूरी कदम उठाने होंगे.