टाटा संस के चेयरमैन पद से एन. चंद्रशेखरन के हटने के फैसले ने होल्डिंग कंपनी में शापूरजी पल्लोनजी ग्रुप की हिस्सेदारी के भविष्य को लेकर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है. मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि अब दोनों पक्ष ‘वेट एंड वॉच’ वाली रणनीति अपना सकते हैं. एसपी ग्रुप और टाटा संस ने हाल ही में टाटा संस में मिस्त्री परिवार की 18.37 फीसदी हिस्सेदारी के कुछ हिस्से को भुनाने के तरीकों पर चर्चा की थी. इसमें लिस्टेड टाटा ग्रुप कंपनियों के साथ संभावित शेयरस्वैप भी शामिल था, लेकिन वैल्यूएशन और ट्रांजैक्शन के स्ट्रक्चर को लेकर मतभेद बने रहे.

चौंकाने वाला कदम
ईटी की रिपोर्ट में जानकारों के हवाले से कहा गया है कि चंद्रशेखरन के अचानक हटने की घोषणा ने उन चर्चाओं में अनिश्चितता की एक और परत जोड़ दी है. इस घटनाक्रम ने टाटा ग्रुप के बड़े हिस्से को भी चौंका दिया है, क्योंकि चंद्रशेखरन का कार्यकाल लगभग एक दशक का रहा है और इस डायवर्सिफाइड बिजनेस वाले ग्रुप की रणनीति तय करने में उनकी अहम भूमिका रही है. ग्रुप की सोच से वाकिफ एक व्यक्ति ने कहा कि अब हर कोई इंतजार करेगा और देखेगा. इसमें बहुत सारे अनिश्चित पहलू हैं.
ग्रुप पर नजर रखने वालों को उम्मीद है कि मिस्त्री परिवार टाटा संस की पब्लिक लिस्टिंग के लिए दबाव बनाना जारी रखेगा. वे लंबे समय से इसे अपनी हिस्सेदारी की वैल्यू अनलॉक करने और एसपी ग्रुप के कर्ज के बोझ को कम करने का एक तरीका मानते रहे हैं. परिवार ने ऐसे स्ट्रक्चर का विरोध किया है जिनसे डील को आसान बनाने के लिए टाटा संस पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ पड़े.
लिस्टिंग के पक्ष में तर्क
लोगों ने कहा कि लीडरशिप में बदलाव के साथ लिस्टिंग का मुद्दा फिर से जोर पकड़ सकता है, खासकर अगर इस बदलाव से ग्रुप की भविष्य की दिशा और गवर्नेंस पर और बहस छिड़ती है. टाटा ट्रस्ट्स, जिसके पास टाटा संस की 66 फीसदी हिस्सेदारी है, अगले चेयरमैन और उत्तराधिकार की व्यापक प्रक्रिया तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है.
इसलिए, इस बदलाव के कारण एसपी ग्रुप के साथ समझौते पर कोई ठोस कदम तब तक टल सकता है जब तक कि नई लीडरशिप का स्ट्रक्चर साफ न हो जाए. एसपी ग्रुप अपने लगभग 60,000 करोड़ रुपए के कर्ज के बोझ को कम करने के लिए टाटा संस में अपनी हिस्सेदारी के कुछ हिस्से को भुनाने की कोशिश कर रहा है.
हाल ही में उसने इस हिस्सेदारी का इस्तेमाल एक रीफाइनेंसिंग प्रोग्राम के लिए किया, जिससे लगभग 21,500 करोड़ रुपए जुटाए गए. फाइनेंसिंग डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, ग्रुप को 18 महीनों के अंदर या तो टाटा संस के IPO का ऐलान करना होगा, या फिर टाटा संस, SP ग्रुप और किसी तीसरे पार्टी के खरीदार के बीच हिस्सेदारी के निपटारे की शर्तों पर सहमत होना होगा. यह डेडलाइन दोनों पक्षों पर दबाव बनाए रख सकती है, खासकर तब जब लीडरशिप में बदलाव हो रहा हो और टाटा खेमे की तुरंत प्राथमिकता उत्तराधिकार और कामकाज में निरंतरता बनाए रखना हो.