आज जेनजी के आंदोलन की बहुत चर्चा है. नई पीढ़ी अपने सवाल पूछ रही है. वह रोजगार, शिक्षा, समानता, पर्यावरण और अधिकारों की बात कर रही है. यह अच्छी बात है कि युवा समाज के मुद्दों पर बोल रहे हैं. जंतरमंतर पर हाल ही में हुए आंदोलन से सरकार को भी झुका दिया. झारखंड में युवा इन दिनों सड़कों पर हैं. आंशिक कामयाबी उन्हें भी मिली है लेकिन वे अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं. ये आंदोलन बताते हैं कि युवा जबजब जागा है, सड़कों पर उतरा है, सकारात्मक बदलाव हुए हैं. नई दिल्ली, झारखंड का ताजा उदाहरण हम सबके सामने हैं. भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी युवाओं की बड़ी भूमिका थी.

उस दौर में उनके सामने विदेशी शासन था. कई युवा बहुत कम उम्र में आंदोलन से जुड़े. उन्होंने जेल देखी, लाठियां खाईं और प्राण तक दे दिए. उनका साहस आज भी नई पीढ़ी को प्रेरित करता है. आइए, जब देश आजादी के 79 बरस पूरे करने जा रहा है, तो उनके योगदान को भी याद करते हैं. प्रेरणा लेते हैं.
खुदीराम बोस
खुदीराम बोस भारत के सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं. वे बंगाल के रहने वाले थे. किशोर उम्र में ही वे अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन से जुड़ गए थे. उनके भीतर देश को आज़ाद देखने की तीव्र इच्छा थी.
खुदीराम बोस.
1908 में मुज़फ्फरपुर में एक बम हमले के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया. उस समय उनकी उम्र 19 साल ही थी. उन्हें फांसी की सजा दी गई. खुदीराम ने निर्भीकता दिखाई. उनका बलिदान युवाओं के लिए साहस और देशभक्ति का प्रतीक बन गया.
भगत सिंह
भगत सिंह का नाम सुनते ही क्रांति, विचार और निडरता याद आती है. वे केवल हथियार उठाने वाले युवा नहीं थे. वे पढ़ते थे, लिखते थे और समाज में बराबरी की बात करते थे. उनका मानना था कि आज़ादी सिर्फ सत्ता बदलने का नाम नहीं है. भगत सिंह ने अंग्रेजी राज के खिलाफ कई आंदोलनों में भाग लिया.
भगत सिंह.
उन्होंने केंद्रीय विधानसभा में बम तक फेंक दिया, जिसका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं बल्कि अपनी आवाज़ पहुंचाना था. महज 23 वर्ष की उम्र में उन्हें फांसी दी गई. उनका नारा, इंकलाब ज़िंदाबाद, आज भी लोगों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है.
सुखदेव
सुखदेव थापर भगत सिंह के करीबी साथी थे. वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े थे. वे शांत स्वभाव के थे, लेकिन उनके इरादे बहुत मजबूत थे. संगठन बनाने और युवाओं को जोड़ने में उनकी बड़ी भूमिका थी. लाहौर षड्यंत्र मामले में सुखदेव को भी दोषी ठहराया गया. भगत सिंह और राजगुरु के साथ उन्हें फांसी दी गई. उनकी उम्र भी बहुत कम थी. सुखदेव का जीवन बताता है कि बदलाव के लिए सिर्फ जोश नहीं, अनुशासन और संगठन भी जरूरी होता है.
सुखदेव.
राजगुरु
शिवराम हरि राजगुरु महाराष्ट्र के रहने वाले थे. वे बचपन से ही साहसी और तेज स्वभाव के थे. वे भगत सिंह और सुखदेव के साथी बने. आज़ादी के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया. राजगुरु लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई में शामिल थे. उन्हें भी लाहौर षड्यंत्र मामले में फांसी की सजा हुई. वे बहुत कम उम्र में शहीद हो गए. उनका जीवन सिखाता है कि युवा भी बड़े संघर्षों में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
राजगुरु.
चंद्रशेखर आज़ाद
चंद्रशेखर आज़ाद का असली नाम चंद्रशेखर तिवारी था. वे असहयोग आंदोलन से बहुत कम उम्र में जुड़े थे. गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अपना नाम आज़ाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और घर का पता जेल बताया था. इसके बाद वे चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से प्रसिद्ध हो गए. वे अंग्रेजों के हाथ जीवित न पकड़े जाने का संकल्प रखते थे. उन्होंने कई क्रांतिकारी साथियों को संगठित किया. 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेज पुलिस से घिरने पर उन्होंने अंतिम गोली स्वयं को मार ली. उनका जीवन निडरता, आत्मसम्मान और संकल्प का उदाहरण है.
चंद्रशेखर आज़ाद
हेमू कलाणी
हेमू कलाणी सिंध क्षेत्र के युवा स्वतंत्रता सेनानी थे. वे भारत छोड़ो आंदोलन से प्रभावित थे. उन्होंने बहुत कम उम्र में अंग्रेजी शासन के खिलाफ काम शुरू कर दिया था. वे युवाओं को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ते थे. 1942 में उन्होंने अंग्रेजी सैनिकों और हथियारों से भरी एक ट्रेन को रोकने की योजना में भाग लिया. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उनसे अपने साथियों के नाम बताने के लिए दबाव डाला गया, लेकिन वे नहीं झुके. उन्हें फांसी दे दी गई. हेमू कलाणी का बलिदान वफादारी और दृढ़ता की मिसाल है.
हेमू कलाणी.
कनकलता बरुआ
कनकलता बरुआ असम की बहादुर युवा सेनानी थीं. वे भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी थीं. उस दौर में महिलाओं और लड़कियों की भागीदारी भी बढ़ रही थी. कनकलता ने दिखाया कि आज़ादी की लड़ाई केवल पुरुषों की लड़ाई नहीं थी. 1942 में वे तिरंगा लेकर एक जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं. उनका उद्देश्य थाने पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना था. अंग्रेज पुलिस ने जुलूस पर गोली चला दी. कनकलता शहीद हो गईं. वे साहस, महिला नेतृत्व और तिरंगे के सम्मान की प्रेरक प्रतीक हैं.
कनकलता बरुआ
बाजी राउत
बाजी राउत ओडिशा के एक बहुत कम उम्र के बाल शहीद थे. वे नाव चलाने वाले परिवार से थे. वे प्रजामंडल आंदोलन से जुड़े लोगों की मदद करते थे. उनका जीवन बताता है कि आज़ादी की लड़ाई में गरीब और साधारण परिवारों के बच्चे भी शामिल थे. 1938 में अंग्रेज पुलिस ने उनसे नदी पार कराने के लिए नाव मांगी. बाजी राउत ने पुलिस को नाव देने से मना कर दिया. पुलिस ने उन पर गोली चला दी. वे बहुत छोटी उम्र में शहीद हो गए. उनका संघर्ष बच्चों की हिम्मत और अन्याय के सामने न झुकने की प्रेरणा देता है.
बाजी राउत.
आज की पीढ़ी के लिए संदेश
इन युवा सेनानियों ने अलगअलग रास्ते चुने. किसी ने संगठन बनाया. किसी ने जनजागरण किया. किसी ने तिरंगा उठाया. किसी ने जेल और फांसी का सामना किया, लेकिन सबका लक्ष्य एक था. एक बेहतर और स्वतंत्र भारत. आज की नई पीढ़ी के सामने चुनौतियां अलग हैं. फिर भी मूल सवाल वही हैं. न्याय चाहिए. सम्मान चाहिए. अवसर चाहिए. इन युवाओं की कहानियां सिखाती हैं कि आवाज़ उठाइए, पढ़िए, सोचिए, संगठित रहिए और शांतिपूर्ण, जिम्मेदार तरीके से बदलाव के लिए काम कीजिए.