रविवार, 12 जुलाई 2026 ब्रेकिंग
Narottam Mishra Ticket Vivad: दतिया उपचुनाव में टिकट नहीं मिलने पर पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा बोले- अब मेरा कद बड़ा नहीं रहा​ | Lord’s में Yastika Bhatia का ऐतिहासिक शतक, ऑनर्स बोर्ड पर नाम दर्ज कराने वाली पहली महिला क्रिकेटर​ | अगले हफ्ते 4 दिन बैंक बंद; 13 से 19 जुलाई के बीच छुट्टियों का देखें अपडेट​
दिल्ली 32°C ☀️ |
728 x 90 Advertisement
विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
Viral

वाजिद अली शाह ने कैसे चुनीं 375 बेगमें? ईमानदारी ऐसी कि शादी बिना खिदमद कुबूल नहीं थी​

अवध के आख़िरी बादशाह वाज़िद अली शाह ने तकरीबन 375 शादियां क्यों कीं? कोलकाता में रहने वाले उनके एक वंशज के मुताबिक बादशाह इतना पवित्र व्यक्ति था, कि किसी स्त्री को विवाह के बिना खिदमत का मौका देना मुनासिब नहीं मानता था. बादशाह की बीवियों की तीन श्रेणियां थीं. जिन्होंने बादशाह के बच्चों को जन्म […]

अवध के आख़िरी बादशाह वाज़िद अली शाह ने तकरीबन 375 शादियां क्यों कीं? कोलकाता में रहने वाले उनके एक वंशज के मुताबिक बादशाह इतना पवित्र व्यक्ति था, कि किसी स्त्री को विवाह के बिना खिदमत का मौका देना मुनासिब नहीं मानता था. बादशाह की बीवियों की तीन श्रेणियां थीं. जिन्होंने बादशाह के बच्चों को जन्म दिया उन्हें महल का दर्जा देकर पर्दे में कर दिया जाता था. जिन्होंने बच्चों को जन्म नहीं दिया वे बेगम कही गईं. सबसे निचला दर्जा खिलावती का था, जो घरेलू नौकरों की तरह काम करती थीं लेकिन बादशाह से शादी की डोर में बंधी रहती थीं.

शादियों के मामले में पसंद की बीवियों की तलाश के बादशाह के पास कई रास्ते थे. किसी पर बादशाह की सीधे निगाह पड़ी तो रीझ गए. कुछ को बेगमें या उनके घर वाले पेश कर देते थे. कारिंदे भी इसे बादशाह को खुश करने का बढ़िया जरिया मानते थे. काले रंग की बीवियां बादशाह की खास पसंद में शामिल थीं. वे अफ्रीकन अंगरक्षिकाएं साथ लेकर चलते थे. उनमें कई उनकी बीवियां बन गईं. पढ़िए अवध के रंगीले बादशाह से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से.

बसंत का बाग बन गया खर्चीला जंगल!

1847 में 26 साल वाज़िद अली शाह अवध के बादशाह बने. अगले दो साल के भीतर उन्होंने अपनी प्रेमकथाएं “परीख़ाना” में लिखी. उसमें बेबाकी के साथ लिखा कि जब वे सिर्फ आठ साल के थे, तो देखभाल के लिए लगी अधेड़ रहीमन उन पर हावी हो गई. विरोध करने पर वह धमकाने लगी. फिर अगले दो साल यह सिलसिला चला. उसकी बर्खास्तगी के बाद 3540 साल की अमीरन आई. हमेशा चटकीली कपड़ों में सजीधजी अमीरन उन्हें लुभाने लगी. उससे रिश्ते बिना भय और दबाव के रहे.

वाजिद अली शाह.

आगे गोमती किनारे पिता के महल छतर मंजिल के भीतर और आसपास शहजादे के प्रेमविलास का सिलसिला चलता रहा. पंद्रह साल की उम्र में उनका पहला निकाह अपने से पांच साल बड़ी जिस लड़की से हुआ ,वे आगे “ख़ास महल” कहलाईं. परीख़ाना लिखने की शुरुआत तक उनकी लगभग दो दर्जन शादियां हो चुकी थीं. तब वे कैसा महसूस करते थे? उन्होंने लिखा, “प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर से प्रेम का उपहार मिला है. लेकिन जो अनंत बसंत का बाग होना चाहिए,वो मेरे लिए एक खर्चीला जंगल हो चुका है.”

बीवियों की बड़ी तादाद और उनकी खींचतान के चलते होने वाली मुश्किलों के बाद भी बादशाह की शादियों की तलब में कोई कमी नहीं आई. ये तादाद 375 तक पहुंची. इस्लाम जिसमें बीवियों की तादाद चार तक महदूद है और सभी के साथ एक से बर्ताव की शर्त है, वहां बादशाह के लिए इतनी शादियां कैसे मुमकिन हुईं? इसके लिए बादशाह ने मुताह की रीति का सहारा लिया, जिसमें शादी एक दिन से एक वर्ष या फिर उससे आगे भी चल सकती है. अनेक शर्तों से पाबन्द यह शादी ईसाई और यहूदी लड़कियों से ही की जा सकती है और इससे होने वाले बच्चे वैध माने जाते हैं. “भारत में आखिरी बादशाह वाज़िद अली शाह” की लेखिका रोजी लिवेनन से कोलकाता में रहने वाले बादशाह के एक वंशज ने इन शादियों के पक्ष में दलील दी थी,” बादशाह इतना पवित्र व्यक्ति था, कि किसी औरत से शादी के बिना उसे खिदमत का मौका देना मुनासिब नहीं मानता था!

बादशाह की सबसे ऊंचे दर्जे की महल बीबी को सोलह सौ रुपया महीना खर्च को मिलता था. Photo: AI

बीवियों को बीस रूपये तक मिलता था खर्च!

बादशाह से शादी बाद इन बीवियों की जीवनशैली और उनकी हैसियत के बारे में जानना दिलचस्प है. उम्मीद यही की जाएगी कि शादी बाद हरम में पहुंचने वाली बीवियां ठाठ और विलासिता की जिंदगी गुजारती रही होंगी. लेकिन असलियत में यह चंद बीवियों के ही नसीब में था. मुताह जरिए शादी करने वाली औरतों को शादी खत्म होने के बाद गहनेकपड़े तक वापस करने पड़ते थे. असलियत में बादशाह की मुताह बीवियों की तीन श्रेणियां थीं. जिन्होंने बादशाह के बच्चों को जन्म दिया उन्हें महल का दर्जा देकर पर्दे में कर दिया जाता था. जिन्होंने बच्चों को जन्म नहीं दिया वे बेगम कही गईं. सबसे निचला दर्जा खिलावती का था, जो घरेलू नौकरों की तरह काम करती थीं लेकिन बादशाह से शादी की डोर में बंधी रहती थीं.

सबसे ऊंचे दर्जे की महल बीबी को सोलह सौ रुपया महीना खर्च को मिलता था. बेगमों को सौ रुपया और खिलावती के लिए बीस रूपये तय थे. दिलचस्प है कि पूरी तयशुदा रकम उनके हाथ में नहीं आती थी. उदाहरण के लिए बेगम जिन्हें सौ रुपए मिलने चाहिए थे, नकद में सिर्फ सोलह पाती थीं. शेष चौरासी रुपए खाने, कपड़े और निवास की सहूलियत के मद में कट जाते थे. एक चौथी श्रेणी “परी” की भी थी. इन्हें लखनऊ के चौक इलाके की तवायफ़ों के बीच से उनके रूप और नाचनेगाने के हुनर के आधार पर छांटा जाता था. तालीम के बाद वे महफिलों की रौनक बनती थीं. बादशाह का मन आ जाने पर मुताह शादी के जरिए वे बीबी भी बन जाती थीं.

कैसर बेगम ने दिया सुजाक का रोग

बीवियों के सबसे ऊंचे दर्जे महल के लिए बादशाह की औलाद को जन्म देने की शर्त थी. उसके लिए भी तिकड़में चलती थीं. यास्मीन परी और सफराज़ परी ने दावा किया कि वे गर्भवती हैं. उन्हें पर्दे में कर दिया गया. बाद में पता चला कि उन्होंने झूठ बोला था. वे फिर पर्दे के बाहर कर दी गईं और फिर से नाचनेगाने में लग गईं. हूर परी के गर्भवती होने के दावे पर पहले यकीन नहीं किया गया. पांच महीने का गर्भ होने पर जब उसे पर्दे में किया गया तब उसने कहा कि बाहर करो नहीं तो बच्चे को गिरा दूंगी.

समय से पहले सातवें महीने में एक कमजोर लड़के को जन्म दिया, जिसकी जल्दी ही मृत्यु हो गई. कैसर बेगम जिन पर बादशाह न्यौछावर थे, ने बादशाह को सुजाक का रोग दे दिया. उन्होंने “परीख़ाना” में लिखा,” एक गुलाम की तरह दिनरात उसके पीछे घूमता था. जहां वह सोतीवहां सोता. जहां खातीसाथ खाता था. उसे हजारों रूपये के रुक्के दिए. मरहूम जलालुद्दौला की इमारत दी. लेकिन उसने मुझे डॉक्टर की शरण में पहुंचा दिया.”

शादी के सवाल पर ऊंचनीच का सवाल नहीं

बीवियां चुनने के सवाल पर बादशाह खासे उदार थे. कोई दंभ नहीं. ऊंचनीच का सवाल नहीं. निचले दर्जे की नौकरानियां हों या गुलाम अफ्रीकन जो भी पसंद आ गई, उससे शादी कर ली. निकाहशुदा बीवियां तक कई मामलों में मददगार साबित होती थीं. बादशाह तो शहर की गलियों में घूमते नहीं थे, इसलिए दरबारीकारिंदे खोज करते. फिर बादशाह के सामने उन्हें पेश किया जाता.

कुछ माएं भी अपनी बेटियों को लेकर पहुंच जाती थीं और उन्हें मुताह शादी के लिए प्रेरित करती थीं. वजह साफ थी. कमजोर माली हालत वाले परिवार एवज में बादशाह से कुछ पैसा पा जाते थे और जिन लड़कियों की शादी होती थी, उन्हें भी आगे सुखसुविधाओं वाली आगे की जिंदगी की उम्मीद रहती थी. दिलचस्प है कि बादशाह की पहली निकाहशुदा बीबी ख़ास महल ने उपहार में उन्हें कीमती जेवरों और पोशाकों में सजी आठ पारियां उपहार में दी थीं. वाज़िद अली शाह के पिता अमजद अली शाह साधु प्रवृत्ति के माने जाते थे. लेकिन अपनी अधेड़ उम्र में उनका दिल एक सब्जी बेचने वाली पर आ गया था. शादी के बाद उन्होंने उसे सुल्तान महल नाम दिया. 1847 में अमजद अली और सुल्तान महल दोनों का निधन हो गया. अमजद अली वसीयत में सुल्तान महल के लिए एक लाख रूपये छोड़ गए थे. उसकी मां और भाई ने इसके लिए दावा किया. शुरू में वाज़िद अली शाह तैयार नहीं थे. लेकिन गवर्नर जनरल की दखल के बाद उन्होंने भुगतान कर दिया.

अफ्रीकन काली बीवियां थीं खूब पसंद

काले रंग की बीवियां वाज़िद अली शाह को काफी पसंद थीं. अफ्रीकन अंगरक्षिकाओं के घेरे में चलना उन्हें भाता था. 1843 में छोटे काले घुंघराले बालों वाली यास्मीन महल से उन्होंने शादी की. उनकी दूसरी अफ्रीकन बीबी का नाम अजीब ख़ानम था. बेगम हज़रत महल जो कि 1857 में अंग्रेजों से बहादुरी के साथ संघर्ष के लिए आज भी याद की जाती हैं, के पिता अम्बर भी अफ्रीकन गुलाम थे. यद्यपि हज़रत महल के नाकनक्श यास्मीन जैसे विदेशी नहीं थे और वे आकर्षक महिला थीं लेकिन उनका रंग भी काला था.

बड़ी तादाद में यह बीवियां आपस में खूब लड़ती थीं. बादशाह की निकटता के उनके जतन जारी रहते थे और इस कोशिश में महल के छज्जों पर बिल्लियों की तरह लड़ने और एकदूसरे के झोंटे नोचने तक की नौबत आ जाती थी. बादशाह की बीचबचाव की कोशिशें भी नाकाम हो जाती थी. बादशाह का एक से मन नहीं भरता था. दूसरी तरफ एक को मनाते तो अगली रुठ और ऐंठ जाती थी.

विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
शेयर करें:
Author Bio Pic

संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

🐒 KHABAR MONKEY