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Modi Vs Nehru: वो एकदलीय शासन, अब सैकड़ों दलों का कॉम्पिटीशन…चुनावी पैमाने पर कहां खड़े नेहरू और मोदी?

Modi Vs Nehru: वो एकदलीय शासन, अब सैकड़ों दलों का कॉम्पिटीशन…चुनावी पैमाने पर कहां खड़े नेहरू और मोदी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी 10 जून को एक नया रिकार्ड बनाने वाले हैं. वे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार चुने गए पीएम बने रहने का रिकार्ड अपने नाम दर्ज कर लेंगे. इस तरह वे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का पीएम के रूप में रिकार्ड ब्रेक कर देंगे. पिछले साल जुलाई में पीएम मोदी ने इंदिरा गांधी का पीएम के रूप में कार्यकाल ब्रेक किया था.

Modi Vs Nehru: वो एकदलीय शासन, अब सैकड़ों दलों का कॉम्पिटीशन…चुनावी पैमाने पर कहां खड़े नेहरू और मोदी?
Modi Vs Nehru: वो एकदलीय शासन, अब सैकड़ों दलों का कॉम्पिटीशन…चुनावी पैमाने पर कहां खड़े नेहरू और मोदी?

आइए, इसी बहाने समझने का प्रयास करते हैं कि चुनावी पैमाने पर कहां खड़े हैं मोदी और नेहरू? कैसे मोदी सैकड़ों दलों से चुनावी टक्कर लेकर जीत रहे हैं और कैसे नेहरू लगातार जीतते रहे?

तब जमाना कुछ और था, अब कुछ और

भारत का लोकतंत्र बहुत बड़ा है. यह लगातार बदलता भी रहा है. आज जिस चुनावी राजनीति को हम देखते हैं, वह 1950 और 1960 के दशक जैसी नहीं है. तब राजनीति का स्वरूप अलग था. आज मुकाबला कहीं ज्यादा तेज है. इसीलिए जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलताओं की तुलना करते समय, समाज और राजनीतिक माहौल को साथ में देखना जरूरी है. नेहरू ने आजादी के बाद भारत को दिशा दी. उन्होंने 1952, 1957 और 1962 में लगातार तीन आम चुनाव जीते. दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी ने 2014, 2019 और 2024 में लगातार तीन बार केंद्र में सरकार बनाई. 2024 में वे ऐसे समय में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, जब चुनावी मैदान में सैकड़ों राजनीतिक दल सक्रिय थे. नतीजा यह हुआ कि इस चुनाव में एनडीए को तो स्पष्ट बहुमत मिला लेकिन भाजपा को नहीं.

पीएम मोदी.

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने पहली दफा 26 मई 2014 को शपथ ली थी. तब से वे लगातार दो और बार क्रमशः साल 2019 और साल 2024 में पीएम पद की शपथ ले चुके हैं. इस तरह उनका कुल कार्यकाल 10 जून को 4399 दिन का हो जाएगा. वहीं चुने हुए पीएम के रूप में पंडित नेहरू ने 4398 दिन देश की सेवा की थी. वे 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री मनोनीत हुए थे. लेकिन देश में विधिवत आम चुनाव पहली बार साल 1951-52 में हुए थे. पीएम के रूप कुल कार्यकाल के मामले में अभी भी पंडित नेहरू ही आगे हैं. वे 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक देश के पीएम रहे.

नेहरू दौर में कांग्रेस की थी मजबूत पकड़

नेहरू के समय भारत नया-नया आजाद हुआ था. देश में कांग्रेस की पहचान बहुत मजबूत थी. कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं मानी जाती थी. वह आजादी के आंदोलन की मुख्य शक्ति भी थी. इस कारण जनता में कांग्रेस के प्रति भावनात्मक भरोसा था. उस समय भी विपक्ष मौजूद था लेकिन उसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम था. भारत कानूनी रूप से एकदलीय देश नहीं था. फिर भी चुनावी राजनीति में कांग्रेस का भारी दबदबा था.

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू. फोटो: Getty Images

कई राज्यों में कांग्रेस लगभग स्वाभाविक विकल्प बन चुकी थी. विपक्ष छोटे-छोटे दलों में बंटा था. उसके पास संगठन, संसाधन और राष्ट्रीय पहचान कम थी. इस माहौल में नेहरू की लोकप्रियता बहुत बड़ी थी. वे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री थे. वे आधुनिक भारत, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की बात करते थे. जनता उन्हें राष्ट्र निर्माण का चेहरा मानती थी. इसलिए नेहरू की जीत केवल चुनावी जीत नहीं थी. वह नए भारत की दिशा पर जनता की मुहर भी थी.

मोदी के दौर में है सैकड़ों दलों में प्रतिस्पर्धा

नरेंद्र मोदी का दौर बिल्कुल अलग है. आज भारत में राजनीति बहुत फैल चुकी है. राष्ट्रीय दल हैं. क्षेत्रीय दल हैं. जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बने दल भी हैं. कई छोटे दल भी चुनावी समीकरण बदल सकते हैं. साल 2024 का चुनाव इसी नई राजनीति का उदाहरण है. इस चुनाव में सैकड़ों दल मैदान में थे. मतदाता भी पहले से ज्यादा जागरूक था. मीडिया का असर बहुत बड़ा था. सोशल मीडिया ने चुनाव को हर मोबाइल तक पहुंचा दिया था. हर मुद्दे पर बहस थी. हर सीट पर अलग गणित था. ऐसे माहौल में लगातार तीसरी बार सत्ता में आना आसान नहीं है.

जब नरेंद्र मोदी तीसरी बार पीएम बने तो यह रिकॉर्ड बनाने की तरफ बड़ा कदम था. फोटो: PTI

मोदी ने 2014 में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई. साल 2019 में वे और बड़े जनादेश के साथ लौटे लेकिन साल 2024 में भाजपा अपने दम पर बहुमत से पीछे रही, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत मिला. इसके आधार पर मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने. यह उपलब्धि उन्हें नेहरू के बाद लगातार तीन कार्यकाल पूरा करने वाले सबसे प्रमुख प्रधानमंत्रियों की श्रेणी में रखती है.

क्या रहा दोनों नेताओं की जीत का आधार?

नेहरू की जीत का आधार अलग था. उनके पास स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत थी. उनके पास कांग्रेस का विशाल संगठन था. उनके सामने विपक्ष कमजोर था. देश में राजनीतिक विकल्प सीमित थे. जनता स्थिरता चाहती थी. नेहरू उस स्थिरता के प्रतीक थे. मोदी की जीत का आधार अलग है. उनके पास मजबूत नेतृत्व की छवि है. उनकी राजनीति में राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं और संगठन की ताकत शामिल है. भाजपा का चुनावी ढांचा बहुत मजबूत है. मोदी ने सीधे मतदाता से संवाद की शैली विकसित की. उन्होंने केंद्र सरकार की योजनाओं को चुनावी संदेश का हिस्सा बनाया. महिला मतदाता, युवा मतदाता और लाभार्थी वर्ग उनके चुनावी आधार में अहम रहे.

पंडित नेहरू के दौर में जनता तक संदेश पहुंचाने के साधन कम थे. फोटो: Getty Images

चुनावी मैदान का भी फर्क

नेहरू के समय चुनाव विशाल जरूर थे, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बेहद सीमित थी. चुनाव आयोग नया था. साक्षरता दर कम थी. रेडियो मुख्य माध्यम था. जनता तक संदेश पहुंचाने के साधन कम थे. कांग्रेस की पहुंच गांव-गांव तक थी. मोदी के समय चुनाव तकनीक से संचालित हैं. टीवी, इंटरनेट और सोशल मीडिया का बड़ा प्रभाव है. हर दल अपना संदेश तुरंत फैला सकता है. हर गलती तुरंत मुद्दा बन सकती है. राजनीतिक नैरेटिव रोज बदल सकता है. इसलिए आज चुनाव जीतना केवल लोकप्रियता का विषय नहीं है. यह रणनीति, संसाधन, गठबंधन और संदेश नियंत्रण का भी खेल है.

नेहरू की चुनौती क्या थी?

नेहरू की चुनौती चुनावी प्रतिस्पर्धा से ज्यादा राष्ट्र निर्माण की थी. उन्हें संविधान को जमीन पर लागू करना था. लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना था. देश को विभाजन के दर्द से बाहर निकालना था. गरीबी, अशिक्षा और औद्योगिक पिछड़ेपन से लड़ना था. राज्यों का पुनर्गठन भी बड़ा मुद्दा था. उनकी जीत इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उन्होंने लोकतंत्र को टिकाया. कई नए देशों में लोकतंत्र टूट गया था. भारत में चुनाव जारी रहे. सत्ता जनता के वोट से तय होती रही. यह नेहरू काल की बड़ी देन मानी जाती है.

मोदी ने 2014 में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई. फोटो: PTI

मोदी की चुनौती क्या है?

मोदी की चुनौती अलग है. आज भारत लोकतंत्र के रूप में स्थापित है. लेकिन जनता की अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं. लोग रोजगार चाहते हैं. तेज विकास चाहते हैं. बेहतर सड़कें, बिजली, पानी और डिजिटल सेवाएं चाहते हैं. राष्ट्र सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा है. वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका भी अहम हो गई है. मोदी को गठबंधन राजनीति की नई स्थिति का सामना भी करना है. साल 2024 के बाद सरकार सहयोगी दलों के समर्थन पर अधिक निर्भर है. इसलिए तीसरे कार्यकाल में उन्हें नेतृत्व के साथ संतुलन भी दिखाना पड़ रहा है.

तुलना कैसे होनी चाहिए?

नेहरू और मोदी की तुलना सीधे-सीधे करना आसान नहीं है. दोनों अलग युग के नेता हैं. दोनों की परिस्थितियां अलग थीं. नेहरू का भारत नया था. मोदी का भारत आत्मविश्वासी और प्रतिस्पर्धी है. नेहरू के सामने राष्ट्रीय एकता और संस्थान निर्माण की चुनौती थी. मोदी के सामने विकास, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और जटिल लोकतांत्रिक राजनीति की चुनौती है. फिर भी एक समानता साफ है. दोनों ने लगातार तीन चुनावी जनादेश पाए. दोनों ने अपनी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रखा.

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दोनों ने अपने समय की राजनीति को अपने व्यक्तित्व से प्रभावित किया.चुनावी पैमाने पर देखें तो नेहरू और मोदी दोनों असाधारण नेता हैं. नेहरू ने कांग्रेस प्रभुत्व वाले दौर में तीन कार्यकाल जीते. उन्होंने नए लोकतंत्र को स्थिरता दी. मोदी ने बहुत अधिक प्रतिस्पर्धी दौर में तीन कार्यकाल हासिल किए. उन्होंने सैकड़ों दलों, क्षेत्रीय ताकतों और तेज मीडिया माहौल के बीच सत्ता बरकरार रखी. इसलिए नेहरू की उपलब्धि ऐतिहासिक है. मोदी की उपलब्धि प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र के संदर्भ में बड़ी है. नेहरू ने लोकतंत्र की नींव मजबूत की. मोदी ने बदले हुए लोकतंत्र में लगातार चुनावी सफलता दिखाई. दोनों की तुलना में सबसे बड़ा सबक यही है कि भारत का लोकतंत्र बदलता रहा है. नेता बदलते हैं. दल बदलते हैं. मुद्दे बदलते हैं लेकिन अंतिम फैसला आज भी मतदाता ही करता है.

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