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ऑटो इंडस्ट्री में आएगा बूम, कंपनियां ईवी के अलावा इन पर भी कर रही हैं काम!

ऑटो इंडस्ट्री में आएगा बूम, कंपनियां ईवी के अलावा इन पर भी कर रही हैं काम!

भारत में ऑटोमोबाइल कंपनियां सिर्फ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) पर फोकस करने के बजाय अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट्स की प्लानिंग पर काम कर रही हैं. वे अपने इन्वेस्टमेंट में केयरफुल अप्रोच अपना रही हैं. कंपनियों का मानना है कि फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी से EVs की डिमांड बढ़ रही है, लेकिन भविष्य में कई तरह के एनर्जी सोर्स साथ-साथ मौजूद रहेंगे. ऑटो कंपनियों की प्रोडक्ट प्लानिंग बताती है कि इस फाइनेंशियल ईयर लॉन्च होने वाली नई कारों में आधे से कम EVs होंगी, जबकि बड़ी कंपनियां पेट्रोल, डीजल, हाइब्रिड, CNG और फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी में भी लगातार इन्वेस्टमेंट कर रही हैं. EVs की बढ़ती डिमांड और भविष्य की प्रोडक्ट प्लानिंग के बीच का यह अंतर भारत के ऑटो सेक्टर के ट्रांजिशन को लेकर कंपनियों की अनसर्टेनिटी को दिखाता है.

ऑटो इंडस्ट्री में आएगा बूम, कंपनियां ईवी के अलावा इन पर भी कर रही हैं काम!
ऑटो इंडस्ट्री में आएगा बूम, कंपनियां ईवी के अलावा इन पर भी कर रही हैं काम!

किसी एक टेक्नोलॉजी पर डिपेंड रहने के बजाय ऑटो कंपनियां ग्रोथ के मौके, प्रॉफिटेबिलिटी और इन्वेस्टमेंट रिस्क के बीच बैलेंस बनाने के लिए तेजी से मल्टी-पावरट्रेन स्ट्रैटेजी अपना रही हैं. ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, बदलते रेगुलेशंस, लॉन्ग-टर्म पॉलिसी फ्रेमवर्क को लेकर अनिश्चितता, असमान चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बैटरी सप्लाई की चिंताएं और ग्राहकों द्वारा EV एडॉप्शन को लेकर सवाल कंपनियों को कई टेक्नोलॉजी में डाइवर्सिफाई करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. हालांकि यह स्ट्रैटेजी किसी एक गलत टेक्नोलॉजी पर दांव लगाने का जोखिम कम करती है, लेकिन इसके लिए कंपनियों और सप्लायर्स को समानांतर प्रोडक्ट्स और मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम्स को भी सपोर्ट करना पड़ता है.

निवेश का दबाव

रिपोर्ट के मुताबिक, डीलरों का मानना है कि मार्केट में हो रहे इस अनप्रेडिक्टेबल बदलाव के बीच कंपनियां किसी एक टेक्नोलॉजी पर ओवर-डिपेंड रहने का रिस्क नहीं उठा सकतीं. यह अप्रोच ऐसे समय में इन्वेस्टमेंट प्रेशर बढ़ा रही है, जब इंडस्ट्री पहले से ही अपने सबसे बड़े कैपेक्स साइकल में से एक का सामना कर रही है. कार कंपनियां एक साथ EV आर्किटेक्चर, हाइब्रिड सिस्टम्स, अल्टरनेटिव फ्यूल और क्लीन कम्बशन टेक्नोलॉजी में निवेश कर रही हैं. सप्लायर्स पर भी असर पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें अपने रिसोर्सेज कई टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स में बांटने पड़ रहे हैं.

जैटो डायनेमिक्स के प्रेसिडेंट रवि भाटिया ने कहा कि मौजूदा हालात में OEMs को एक साथ कई टेक्नोलॉजी बनाए रखने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. यह अब सिर्फ प्रोडक्शन कैपेसिटी का मामला नहीं है. उन्होंने कहा कि यह बिखरे हुए कंज्यूमर मार्केट की जरूरतों को पूरा करते हुए लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट को सिक्योर करने का भी मामला है.

यह स्ट्रैटेजी पूरे ऑटो सेक्टर में दिखाई देती है. उम्मीद है कि Maruti Suzuki, e-Vitara के जरिए EV मार्केट में अपनी मौजूदगी मजबूत करेगी, साथ ही हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स की रेंज भी बढ़ाएगी. Hyundai और Kia भी इसी तरह की प्लानिंग पर काम कर रही हैं, जिनमें लोकली मैन्युफैक्चर्ड EVs और हाइब्रिड व्हीकल्स शामिल हैं. वहीं Toyota और Honda अपने हाइब्रिड पोर्टफोलियो को मजबूत करने के साथ-साथ भारत के इथेनॉल रोडमैप के अनुरूप फ्लेक्स-फ्यूल प्रोग्राम्स पर भी फोकस कर रही हैं.

Khabar Monkey

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