Lucknow News: लखनऊ के मलिहाबाद क्षेत्र स्थित कसमंडी कला गांव में एक पुराने धार्मिक स्थल को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. बकरीद से पहले बढ़ते तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने विवादित स्थल पर सभी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगा दी है. प्रशासन ने न केवल बकरीद की नमाज पर प्रतिबंध लगाया है, बल्कि सुंदरकांड पाठ, हनुमान चालीसा और अन्य धार्मिक आयोजनों की भी अनुमति नहीं दी है. पूरे इलाके में भारी पुलिस बल और पीएसी की तैनाती की गई है, जबकि सीसीटीवी कैमरों के जरिए लगातार निगरानी रखी जा रही है.

क्या है पूरा विवाद?
कसमंडी कला गांव, जो लखनऊ से लगभग 25 किलोमीटर दूर मलिहाबाद क्षेत्र में स्थित है, इन दिनों एक ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद का केंद्र बना हुआ है. विवाद उस पुराने ढांचे को लेकर है, जिस पर दो समुदाय अलग-अलग दावे कर रहे हैं. पासी समाज और उससे जुड़े संगठनों का दावा है कि यह स्थल 11वीं शताब्दी के नागवंशी शासक महाराजा कंसा पासी का ऐतिहासिक किला और प्राचीन शिव मंदिर था.
पासी समाज के लोगों का कहना है कि यहां मौजूद दीवारों और अवशेषों पर नाग, कलश और अन्य हिंदू प्रतीकों की आकृतियां दिखाई देती हैं, जो इसकी प्राचीन हिंदू पहचान की ओर संकेत करती हैं. उनका आरोप है कि बाद के समय में इस स्थल का स्वरूप बदलकर इसे मकबरे और मस्जिद के रूप में प्रस्तुत किया गया.
वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थान एक पुरानी मस्जिद और मकबरा है, जहां लंबे समय से धार्मिक गतिविधियां संचालित होती रही हैं. उनका दावा है कि सरकारी अभिलेखों और स्थानीय इतिहास में भी इस स्थल का उल्लेख मस्जिद और मजार के रूप में मिलता है.
प्रशासन ने उठाए एहतियाती कदम
बकरीद और बड़े मंगल जैसे धार्मिक अवसरों के मद्देनजर प्रशासन ने किसी भी संभावित तनाव को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं. अधिकारियों ने विवादित स्थल पर सभी धार्मिक गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगा दी है. प्रशासन की ओर से दोनों पक्षों को लिखित रूप से सूचित कर दिया गया है कि विवाद के समाधान तक किसी भी प्रकार का धार्मिक आयोजन स्थल पर नहीं किया जाएगा. पुलिस और प्रशासन का कहना है कि यह फैसला केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने और शांति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया है.
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सुंदरकांड पाठ को लेकर बढ़ा विवाद
विवाद उस समय और बढ़ गया जब पासी समाज और कुछ हिंदू संगठनों ने मंगलवार को बड़े मंगल के अवसर पर विवादित स्थल पर सुंदरकांड पाठ और पूजा-अर्चना करने की घोषणा की. इसके बाद प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया. मंगलवार को हिंदू महासभा के कुछ पदाधिकारी और कार्यकर्ता विवादित स्थल की ओर बढ़े, लेकिन पुलिस और पीएसी ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया.
संगठन के नेताओं का कहना था कि वे केवल सांकेतिक पूजा और धार्मिक कार्यक्रम करना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने अनुमति नहीं दी. पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद कार्यकर्ताओं ने मौके पर ही सांकेतिक पूजा की. उन्होंने धूपबत्ती जलाई, आरती की और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त की. इसके बाद वे वापस लौट गए. संगठन के नेताओं ने कहा कि वे इस मुद्दे को कानूनी तरीके से आगे बढ़ाएंगे.
कई लोगों को किया गया नजरबंद
स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए प्रशासन ने कुछ स्थानीय नेताओं और आंदोलन से जुड़े लोगों को एहतियातन नजरबंद भी किया. पुलिस अधिकारियों के अनुसार, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर फैल रही सूचनाओं पर भी नजर रखी जा रही है ताकि कोई भड़काऊ या भ्रामक सामग्री माहौल खराब न कर सके. जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति या संगठन को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी. यदि कोई शांति भंग करने की कोशिश करेगा तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
इतिहास और आस्था के बीच फंसा विवाद
कसमंडी का यह विवाद केवल धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक दावों से भी जुड़ा हुआ है. पासी समाज का कहना है कि यह स्थल उनके गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. वहीं मुस्लिम समुदाय इसे अपनी धार्मिक धरोहर मानता है. दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में ऐतिहासिक संदर्भ और स्थानीय परंपराओं का हवाला दे रहे हैं. हालांकि अब तक किसी सक्षम न्यायिक या सरकारी एजेंसी द्वारा इस स्थल की ऐतिहासिक स्थिति को लेकर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है.
क्या बोले मौलाना सुफियान निजामी?
वहीं इस मामले पर मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना सुफियान निजामी ने कहा कि देश में मस्जिदों को निशाना बनाने का एक नया ट्रेंड शुरू हो गया है, जिसके तहत ऐतिहासिक मस्जिदों, मजारों और कब्रिस्तानों में मंदिर तलाशने की कोशिश की जा रही है. मौलाना सुफियान निजामी ने कहा कि कसमंडा का धार्मिक स्थल सदियों पुराना और ऐतिहासिक महत्व का स्थान है. उन्होंने दावा किया कि इस स्थल से जुड़े हजारों साल पुराने रिकॉर्ड आज भी उपलब्ध हैं, जो इसकी ऐतिहासिक पहचान को प्रमाणित करते हैं.





