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सड़कों से कमाई करेगी सरकार, 20 हजार करोड़ का मास्टर प्लान हुआ तैयार!​

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय अपने मॉनेटाइज़ेशन प्रोग्राम में ‘बिल्डऑपरेटट्रांसफर’ प्रोजेक्ट्स के जरिए जुटाए गए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को शामिल करने का फैसला करने के बाद, वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने हाईवे मॉनेटाइजेशन टारगेट को 15,00020,000 करोड़ रुपए तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है. इस कदम से वित्त वर्ष 27 में हाईवे मॉनेटाइज़ेशन से […]

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय अपने मॉनेटाइज़ेशन प्रोग्राम में ‘बिल्डऑपरेटट्रांसफर’ प्रोजेक्ट्स के जरिए जुटाए गए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को शामिल करने का फैसला करने के बाद, वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने हाईवे मॉनेटाइजेशन टारगेट को 15,00020,000 करोड़ रुपए तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है. इस कदम से वित्त वर्ष 27 में हाईवे मॉनेटाइज़ेशन से होने वाली कमाई 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा हो सकती है, जो मंत्रालय के मौजूदा 35,000 करोड़ रुपए के टारगेट से कहीं ज्यादा होगी और सरकार के ‘नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन’ 2.0 फ्रेमवर्क के साथ बेहतर ढंग से मेल खाएगी.

नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन 2.0 में FY30 तक पांच साल की अवधि में कुल 16.72 लाख करोड़ रुपए की मॉनेटाइज़ेशन क्षमता का अनुमान लगाया गया है, जिसमें केंद्रीय मंत्रालयों और पब्लिक सेक्टर की संस्थाओं की एसेट मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन के तहत प्राइवेट सेक्टर का 5.8 लाख करोड़ रुपए का इन्वेस्टमेंट शामिल है. इसमें BoT रूट के तहत हाईवे प्रोजेक्ट्स जैसे ग्रीनफील्ड एसेट्स का मॉनेटाइजेशन भी शामिल है.

नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन का पहला फेज अगस्त 2021 में नीति आयोग द्वारा शुरू किया गया था, जिसका मकसद कम इस्तेमाल होने वाले ब्राउनफील्ड पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स को प्राइवेट कंपनियों को लीज पर देना था. इसने अपने टारगेट का लगभग 90 फीसदी हासिल किया और नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए फ़ंड जुटाने के लिए लगभग 5.3 लाख करोड़ की राशि जुटाई. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने FY26 में मॉनेटाइजेशन से लगभग 29,000 करोड़ रुपए की कमाई की.

यह फैसला हाईवे मॉनेटाइजेशन के प्रति सरकार के पारंपरिक नजरिए में बदलाव का संकेत देगा, जो मुख्य रूप से ‘टोलऑपरेटट्रांसफर’ बंडलों और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स के जरिए चालू एसेट्स के मॉनेटाइजेशन पर निर्भर रहा है. 2018 में हाईवे मॉनेटाइज़ेशन शुरू होने के बाद से, कमाई मुख्य रूप से पहले से बनी सड़कों के रेवेन्यू अधिकार ट्रांसफर करके हुई है, न कि नए प्रोजेक्ट्स में इन्वेस्टमेंट को गिनकर.

मिंट की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले के अनुसार BoT मॉडल के तहत हाईवे बनाने के लिए प्राइवेट सेक्टर द्वारा लाए गए इन्वेस्टमेंट को अब मॉनेटाइज़ेशन के एक रूप के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि इससे सरकार का कैपिटल बोझ कम होता है और साथ ही पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में प्राइवेट कैपिटल भी आता है.

ये रहा प्लान

मंत्रालय का प्लान है कि FY27 में लगभग 10,000 किलोमीटर के नेशनल हाईवे के प्रोजेक्ट्स दिए जाएं, जिनमें से लगभग एकचौथाई BoT मॉडल के तहत बोली के लिए रखे जाने की उम्मीद है. हालांकि इन प्रोजेक्ट्स की कुल वैल्यू लगभग 2 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है, लेकिन FY27 के दौरान केवल 15,00020,000 करोड़ रुपए का निवेश होने और उसे मॉनेटाइजेशन से होने वाली कमाई में गिने जाने की उम्मीद है.

हालांकि, साल के दौरान असल निवेश इस बात पर निर्भर करेगा कि फाइनेंशियल ईयर में प्रोजेक्ट्स में कितनी तेजी से निवेश किया जाता है. मिंट की ​रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि चूंकि BoT प्रोजेक्ट्स में आमतौर पर कंस्ट्रक्शन के समय अलगअलग चरणों में कैपिटल लगाया जाता है, इसलिए उस खास साल में मॉनेटाइजेशन से होने वाली कमाई के तौर पर केवल उसी साल में किए गए निवेश को ही गिने जाने की उम्मीद है.

BoT प्रोजेक्ट्स पर फिर से जोर क्यों?

BoT प्रोजेक्ट्स पर फिर से जोर इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि सरकार हाईवे डेवलपमेंट में प्राइवेट कैपिटल की हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है और बजट सपोर्ट पर निर्भरता कम करना चाहती है. अधिकारियों को उम्मीद है कि जैसेजैसे इन्वेस्टर्स का भरोसा बढ़ेगा और प्रोजेक्ट से जुड़े रिस्क को संभालना आसान होगा, सालाना दिए जाने वाले प्रोजेक्ट्स में BoT प्रोजेक्ट्स की हिस्सेदारी और बढ़ेगी.

भारत का नेशनल हाईवे नेटवर्क अब 146,000 किलोमी​टर से ज्यादा हो गया है, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े रोड नेटवर्क्स में से एक बनाता है. पिछले दशक में, सरकार ने हाईवे कंस्ट्रक्शन में तेजी लाने के लिए इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन और हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल प्रोजेक्ट्स पर काफी हद तक भरोसा किया है. हालांकि, पॉलिसी बनाने वाले अब BoT मॉडल को फिर से शुरू करने की ज्यादा गुंजाइश देख रहे हैं, जो ट्रैफिक और रेवेन्यू से जुड़े रिस्क को प्राइवेट कंपनियों पर डाल देता है.

क्या कह रहे हैं जानकार?

EY इंडिया में पार्टनर और नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर लीडर कुलजीत सिंह के अनुसार, BoT प्रोजेक्ट्स सरकार के लिए आकर्षक बने हुए हैं क्योंकि इनसे फिस्कल एक्सपोजर खत्म हो जाता है. सिंह ने कहा कि सरकार के नजरिए से BoT प्रोजेक्ट्स आदर्श हैं, क्योंकि इन प्रोजेक्ट्स से सरकार पर कोई कैपिटल एक्सपेंडिचर या सब्सिडी का रिस्क नहीं आता है.

हालांकि, मार्केट की सोच अलग है क्योंकि ऐसे प्रोजेक्ट्स में बेस ट्रैफिक का रिस्क ज्यादा माना जाता है और इनमें काफी ज्यादा इक्विटी की भी जरूरत होती है, जो EPC मार्जिन से कहीं ज्यादा है. उन्होंने कहा कि नतीजतन, HAM या TOT प्रोजेक्ट्स की तुलना में BoT टोल प्रोजेक्ट्स में इन्वेस्टर्स की दिलचस्पी ऐतिहासिक रूप से कम रही है, और भविष्य में भी यह ट्रेंड जारी रह सकता है.

मंत्रालय ने कंसेशन एग्रीमेंट्स में हालिया बदलावों के जरिए इनमें से कुछ चिंताओं को दूर करने की कोशिश की है, जिसमें रिस्क के बंटवारे को बेहतर बनाने और बैंक से लोन मिलने की संभावना को बढ़ाने के प्रावधान शामिल हैं. डेलॉइट इंडिया के पार्टनर कुशल कुमार सिंह के अनुसार, मॉनेटाइजेशन कैलकुलेशन में BoT प्रोजेक्ट्स को शामिल करना, अपडेटेड मॉनेटाइजेशन फ्रेमवर्क के तहत एक बड़े पॉलिसी बदलाव को दिखाता है.

उन्होंने कहा कि NMP 2.0 में प्राइवेट सेक्टर द्वारा किए गए निवेश की सीमा तक, मॉनेटाइजेशन के तरीके के तौर पर BoT मॉडल के तहत विकसित प्रोजेक्ट्स को शामिल किया गया है. इसलिए, मंत्रालय का BoT को मॉनेटाइजेशन के जरिया के तौर पर शामिल करना मौजूदा पॉलिसी के अनुरूप है.

BoT की वापसी

भारत में हाईवे बनाने के लिए BoT एक समय सबसे मुख्य मॉडल था. 2007 और 2014 के बीच, लगभग सभी नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट BoT मॉडल के तहत दिए गए थे. 201112 में तो कुल प्रोजेक्ट्स में से 96% इसी मॉडल के तहत दिए गए थे. बाद में यह मॉडल कम लोकप्रिय हो गया क्योंकि आक्रामक बोली, फंड की कमी और उम्मीद से कम ट्रैफिक के कारण डेवलपर्स को कम रिटर्न मिला.

FY19 और FY20 में BoT रूट के तहत कोई प्रोजेक्ट नहीं दिया गया. हालांकि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने 2020 में इस मॉडल को फिर से शुरू करने की कोशिश की, लेकिन लंबी देरी के बाद 2021 में ही प्रोजेक्ट दिया जा सका.

BoT से जुड़े निवेश के साथसाथ, उम्मीद है कि मंत्रालय FY27 में भी ToT बंडल्स और InvITs के जरिए चालू एसेट्स से कमाई जारी रखेगा. अधिकारियों का कहना है कि इन प्रोग्राम्स का दायरा FY26 के स्तर के बराबर या उससे ज़्यादा हो सकता है, जिससे लंबे समय के लिए घरेलू और ग्लोबल कैपिटल को आकर्षित करने में मदद मिलेगी.

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संपादकीय टीम

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