बांग्लादेश में कपड़ा उद्योग से जुड़े 10 लाख मजदूरों ने प्रदर्शन किया. कपड़ा फैक्ट्रियों में काम ठप रहा. कई जगह प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़, सड़क जाम और पुलिस के साथ झड़प की खबरें भी आईं. पुलिस ने इन्हें रोकने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े. प्रदर्शनकारी 30 हजार टका तक अपना मासिक वेतन बढ़ाने में की मांग कर रहे हैं. फिलहाल उनका वेतन 12,500 टका है. उनका कहना है कि खाने से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक बढ़ती लागत के बीच इतनी कम तनख्वाह उनके लिए नाकाफी साबित हो रही है.

बांग्लादेश की करंसी का नाम टका है. इसका सांकेतिक नाम BDT लिखा जाता है और संकेत ৳ से दिखाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे भारतीय करंसी के लिए INR कोड नाम और ₹ चिन्ह का इस्तेमाल किया जाता है. भारत और बांग्लादेश की करंसी में बड़ा अंतर है. जानिए, बांग्लादेश के 100 टका भारत में आकर कितने हो जाते हैं.
बांग्लादेश के 100 टका Vs भारत के 100 रुपए
भारत में बांग्लादेश के टका की कीमत रुपए से कम आंकी जाती है. भारत और बांग्लादेश की करंसी में बड़ा अंतर है. इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. जैसे बांग्लादेश के 10 टका की भारतीय करंसी में में वैल्यू मात्र 7.62 रुपए हैं. वहीं 100 बांग्लादेश टका भारत आकर भारतीय करंसी में महज 76.20 रुपए रह जाता है. इस तरह बांग्लादेश के 100 रुपए और भारत के 100 रुपए में करीब 24 रुपए का अंतर है.
बांग्लादेशी करंसी टका.
इसका मतलब यह नहीं कि पैसे की असली ताकत घट गई. टका की वैल्यू बांग्लादेश में वही रहती है, बस दूसरी करंसी में बदलते समय उसकी गिनती कम इकाइयों में होती है. इसका उलटा देखें तो 100 रुपए के बदले करीब 131 टका मिलते हैं. दो मुद्राओं की आपसी कीमत उनकी मांग और आपूर्ति, महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार जैसी चीज़ों से तय होती है, इसलिए यह रेट रोज ऊपरनीचे होता रहता है. कम कीमत की करेंसी का एकमात्र मतलब यह भी नहीं कि वह देश कमजोर या गरीब है, क्योंकि लोगों की असली क्रयशक्ति और अर्थव्यवस्था का आकार इससे अलग चीजे हैं.
भारतीय करंसी.
बांग्लादेश की करंसी ‘टका’ की कहानी
1947 के बंटवारे के बाद पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना और वहां पाकिस्तानी रुपया चलता रहा, लेकिन नोटों और सिक्कों पर बांग्ला में ‘टका’ शब्द भी छपा होता था. 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान कुछ बंगाली राष्ट्रवादी विरोध में नोटों पर “बांग्ला देश” की मुहर लगा देते थे.
16 दिसंबर 1971 को युद्ध खत्म होने के बाद बांग्लादेश बैंक का गठन हुआ. आजादी के बाद करीब तीन महीने तक पाकिस्तानी रुपया चलता रहा. फिर 4 मार्च 1972 को टका ने पाकिस्तानी रुपए की जगह बराबर मूल्य पर ले ली. पहले ৳1 और ৳100 के नोट आए, बाद में ৳5 और ৳10 जुड़े. इस पहली सीरीज को ‘मैप सीरीज़’ कहा जाता है और इसे आपातकालीन माना जाता है.
आगे नए मूल्यवर्ग जुड़ते गए
1977 में ৳50, 1979 में ৳500, 1982 में ৳20 और 2008 में पहली बार ৳1000 का नोट आया. पोइशा सिक्कों की ढलाई 2013 से बंद है. 1972 से अब तक नोटों की 11 सीरीज आ चुकी हैं. इनके डिज़ाइन में सत्ता बदलने का असर भी दिखता रहा. 2001 में BNP के सत्ता में आने के बाद 200203 की सीरीज़ में शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर नहीं थी, जबकि 2009 में अवामी लीग की वापसी के बाद एक टका को छोड़ बाकी नोटों पर उनकी तस्वीर लौट आई.