दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित रेस कोर्स मस्जिद को खाली कराने के नोटिस ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. मस्जिद की जमीन किसकी है, उसका इतिहास कितना पुराना है और क्या उसे हटाया जा सकता है, इन सवालों पर अलगअलग पक्षों के दावे सामने आए हैं. मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इसमें सरकारी जमीन, धार्मिक स्थल, विरासत और सुरक्षा जैसे मुद्दे एक साथ जुड़े हैं. फिलहाल, अदालत के आदेश पर मस्जिद गिराए जाने का फैसला फौरी तौर पर रोक दिया गया है. देखना रोचक होगा कि आगे यह मामला किस ओर जाता है.

आइए, ताजे संदर्भों में समझते हैं कि प्रधानमंत्री के सरकारी आवास के पास बनी मस्जिद की कहानी क्या है, जिसे गिराने पर अदालत ने फिलहाल रोक लगा दी है.
मस्जिद कहां बनी है?
यह मस्जिद नई दिल्ली के रेस कोर्स इलाके में है. यह प्रधानमंत्री के सरकारी आवास के पास स्थित है. इसे आम तौर पर रेस कोर्स मस्जिद कहा जाता है. इसके साथ एक कब्रिस्तान भी है. मस्जिद और कब्रिस्तान की जमीन को लेकर प्रशासन और मस्जिद से जुड़े लोगों के दावे अलगअलग हैं.
कुछ स्थानीय कहानियां रेसकोर्स मस्जिद को दरवेश शाह नाम के सूफी संत से जोड़ती हैं.
मस्जिद कब बनी थी?
मस्जिद की सही उम्र और इसे किसने बनवाया, इसकी पक्की जानकारी उपलब्ध नहीं है. मीडिया रिपोर्टस में अलगअलग अनुमान दिए गए हैं. कुछ रिकॉर्ड और स्थानीय दावों के आधार पर इसे करीब 125 से 150 साल पुराना बताया गया है. दिल्ली वक्फ बोर्ड ने अदालत में इसे लगभग 300 साल पुराना बताया है. इन दावों की पुष्टि को लेकर विवाद है. इतना जरूर कहा जा रहा है कि नई दिल्ली को योजनाबद्ध तरीके से बसाने के समय, यानी 1920 और 1930 के दशक में, यह मस्जिद वहां मौजूद थी.
कुछ स्थानीय कहानियां इसे दरवेश शाह नाम के सूफी संत से जोड़ती हैं. लेकिन इस संबंध में प्रमाणित लिखित रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है. इसलिए मस्जिद के निर्माण की सही तारीख और उसके संस्थापक के बारे में निश्चित बताना कठिन है.
जमीन पर किसका दावा है?
सरकारी भूमि एवं विकास कार्यालय का कहना है कि यह जमीन केंद्र सरकार की है. उसके अनुसार मस्जिद का निर्माण सरकारी जमीन पर बिना जरूरी अनुमति के हुआ है. इसी आधार पर प्रशासन ने परिसर खाली करने का नोटिस जारी किया है. दूसरी ओर, मस्जिद से जुड़े लोगों और दिल्ली वक्फ बोर्ड का कहना है कि यह वक्फ संपत्ति है. उनके पक्ष में 8 सितंबर 1977 के दिल्ली गजट का हवाला दिया जाता है. दावा है कि मस्जिद और उससे जुड़ी जमीन को उस अधिसूचना में वक्फ संपत्ति के तौर पर दर्ज किया गया था.
मस्जिद को एनडीएमसी की विरासत सूची में शामिल किए जाने का भी उल्लेख है. यहां एक जरूरी फर्क समझना जरूरी है. किसी इमारत का विरासत सूची में होना और जमीन का कानूनी मालिक होना एक ही बात नहीं है. इसी तरह, किसी संपत्ति का वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज होना अपने आप में सभी भूमि और निर्माण संबंधी सवालों का अंतिम जवाब नहीं है. दस्तावेजों की जांच और उनका कानूनी महत्व भी है.
प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि हाल ही में सरकारी भूमि एवं विकास कार्यालय यानी एलएंडडीओ ने मस्जिद परिसर खाली करने के लिए नोटिस जारी किया है. यह लगभग 53 एकड़ में फैला हुआ है. नोटिस में छह दिन के भीतर जगह खाली करने को कहा गया था. मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति भी काट दी गई. आसपास के इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई और यहां नमाज पढ़ने पर भी पाबंदी की सूचना आम है. यह कार्रवाई केवल मस्जिद तक सीमित नहीं है.
रिपोर्ट्स के अनुसार, रेस कोर्स क्षेत्र में सरकारी जमीन वापस लेने और आसपास के आवासीय हिस्सों को खाली कराने की कार्रवाई भी चल रही है. अधिकारियों ने इसे जमीन पर अवैध कब्जे से जुड़ी कार्रवाई बताया. आसपास रहने वाले परिवार भी इससे प्रभावित हुए.
सरकार जगह खाली क्यों करवाना चाहती है?
प्रशासन का मुख्य तर्क जमीन के स्वामित्व और कथित अनधिकृत निर्माण से जुड़ा है. एलएंडडीओ के अनुसार, जमीन केंद्र सरकार की है और परिसर को खाली कराया जाना चाहिए. सरकार ने सुरक्षा पहलुओं की ओर भी ध्यान दिलाया है. प्रधानमंत्री आवास के पास होने के कारण इस इलाके को संवेदनशील माना जाता है. इसका अर्थ यह नहीं कि मस्जिद को हटाने का कारण केवल सुरक्षा है. प्रशासन की कार्रवाई का आधार सरकारी जमीन और कथित अतिक्रमण भी बताया गया है.
मस्जिद को गिराने पर रोक क्यों लगी?
मस्जिद से जुड़े पक्षों ने कार्रवाई का विरोध किया और कानूनी रास्ता अपनाया. मस्जिद के संरक्षण की मांग उठी. दिल्ली हाईकोर्ट में मामले से जुड़ी अर्जी पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया कि वक्फ बोर्ड की अर्जी पर फैसला होने तक मस्जिद को नहीं गिराया जाएगा. इस आश्वासन के बाद फिलहाल ध्वस्तीकरण पर रोक लगा दी गई है. इसका मतलब यह नहीं है कि जमीन के मालिकाना हक या मस्जिद की कानूनी स्थिति पर अंतिम फैसला हो चुका है. रोक का मतलब है कि अदालत में उठे सवालों और संबंधित अर्जी पर विचार होने तक इमारत गिराने की कार्रवाई नहीं होगी. आगे का फैसला दस्तावेजों, दलीलों और अदालत की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा.
यह मामला बेहद संवेदनशील क्यों है?
- यह एक धार्मिक स्थल है. मस्जिद में नमाज पढ़ने और लोगों के आनेजाने पर रोक की खबरों से धार्मिक स्वतंत्रता और पूजा के अधिकार को लेकर चिंता बढ़ी. बिजलीपानी काटे जाने की खबर ने भी विवाद को और गंभीर बनाया.
- मस्जिद को ऐतिहासिक और विरासत स्थल बताया जा रहा है. यदि किसी इमारत को विरासत सूची में रखा गया है, तो उसे बदलने या गिराने के नियमों पर सवाल उठते हैं. मस्जिद पक्ष का कहना है कि इस दर्जे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. प्रशासन का पक्ष है कि जमीन पर अधिकार और निर्माण की अनुमति की जांच जरूरी है.
- प्रधानमंत्री आवास की निकटता के चलते सुरक्षा का मुद्दा सीधे जुड़ जाता है.
- वक्फ संपत्ति और सरकारी भूमि के दावों में टकराव है. दोनों पक्ष अपनेअपने दस्तावेजों और नियमों के आधार पर बात कर रहे हैं.
अभी क्या समझना चाहिए?
फिलहाल इस विवाद का अंतिम समाधान होना बाकी है. मस्जिद के इतिहास, जमीन के अधिकार और निर्माण की अनुमति से जुड़े दावे जांच के विषय हैं. सरकार का कहना है कि जमीन सरकारी है और परिसर खाली कराया जाना चाहिए. मस्जिद पक्ष वक्फ गजट और विरासत सूची का हवाला देता है. हाईकोर्ट को दिए गए सरकारी आश्वासन के मुताबिक, संबंधित अर्जी पर फैसला होने तक मस्जिद को नहीं गिराया जाएगा. इसलिए इस मामले को केवल मस्जिद बनाम सरकार कहकर समझना अधूरा होगा. यह जमीन के रिकॉर्ड, धार्मिक उपयोग, विरासत संरक्षण और सुरक्षा से जुड़ा विवाद है. आगे अदालत और संबंधित अधिकारियों के फैसले से ही स्पष्ट होगा कि मस्जिद की कानूनी स्थिति क्या है और परिसर के भविष्य पर क्या निर्णय लिया जाता है?